केंद्र के प्रयासों ने बदली हमारी जिंदगी
जम्मू-कश्मीर की अदालतों में वकालत की प्रैक्टिस कर रहे अधिवक्ता भानू सिंह जसरोटिया ने अमर उजाला से कहा कि केंद्र सरकार के प्रयासों से जम्मू-कश्मीर के उन लोगों की जिंदगी में बड़ा बदलाव आया है, जिसे आज तक राज्य का निवासी माना ही नहीं जाता था। 1962 और 1972 के युद्धों के पाक अधिकृत कश्मीरी विस्थापितों को यहां की सरकारें इंसान के रूप में देखती ही नहीं थीं, उनके कोई अधिकार नहीं थे।
लेकिन अनुच्छेद 370 के विवादित प्रावधानों की समाप्ति के बाद इन शरणार्थियों के परिवार यहां के नागरिक बन गए हैं। इन परिवारों के बच्चे अब सरकारी नौकरियों में आवेदन कर रहे हैं और चयनित भी हो रहे हैं। जम्मू-कश्मीर क्षेत्र के लिए यह बड़ा बदलाव है। जसरोटिया के अनुसार, इसी प्रकार अनुच्छेद 370 और 35ए की समाप्ति के कारण यहां की महिलाओं के अधिकारों में भी बढ़ोतरी हुई है। अब राज्य के बाहर के पुरूषों से विवाह करने के बाद उनके राज्य के अधिकार निरस्त नहीं होते। यह बड़ा बदलाव है और राज्य की महिलाएं इस अधिकार को पाकर काफी खुश हैं।
उन्होंने कहा कि अगर जम्मू और कश्मीर को राज्य का दर्जा दिया जाता है तो यह क्षेत्र के विकास के लिए और अधिक प्रभावी कदम होगा, लेकिन केंद्र को यह ध्यान रखना होगा कि इस कदम के बाद कश्मीर क्षेत्र एक बार फिर अशांति के दौर में न चला जाए।
लाखों लोगों की जिंदगी-मौत का सवाल
मुख्य कश्मीर के हवाकदल, जिसे अब डाउन टाउन भी कहा जाता है, के रहने वाले डॉक्टर मैक्सन टिक्कू ने कहा कि आम कश्मीरी, वह हिंदू हो या मुसलमान, घाटी में कश्मीरी पंडितों की वापसी चाहता है। केंद्र सरकार के प्रयासों से लगता है कि वह इसके लिए प्रयत्नशील भी है, लेकिन पाकिस्तान से आए आतंकी और कुछ राजनीतिक दल ऐसा नहीं चाहते हैं। वे अलग-अलग कारणों से इस प्रयास को बाधित कर यहां की शांति को प्रभावित करते रहे हैं।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर के सभी राजनीतिक दलों को मिलजुल कर इसका समाधान निकालना चाहिए क्योंकि यह लाखों लोगों की जिंदगी और मौत का विषय है, यह राजनीतिक मामला नहीं है, राजनीतिक दलों को इस मुद्दे पर राजनीति करने से बाज आना चाहिए।