Karnataka: कर्नाटक हाई कोर्ट ने इन्फोसिस के सह-संस्थापक क्रिस गोपालकृष्णन और अन्य के खिलाफ अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया, इसे कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग माना। शिकायत भारतीय विज्ञान संस्थान के पूर्व सदस्य दुर्गप्पा की ओर से दायर की गई थी, जो 2014 में यौन उत्पीड़न आरोपों के कारण बर्खास्त किए गए थे।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने इन्फोसिस के सह-संस्थापक क्रिस गोपालकृष्णन और अन्य के खिलाफ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत दर्ज प्राथमिकी रद्द कर दी है। कोर्ट ने शिकायत को 'कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग' करार दिया और शिकायतकर्ता के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की अनुमति दी।
जस्टिस हेमंत चंदनगौदर ने 16 अप्रैल को यह आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि यह शिकायत याचिकाकर्ताओं को परेशान करने का एक प्रयास है। प्राथमिकी भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के पूर्व संकाय सदस्य डी. सन्ना दुर्गप्पा की ओर से दायर की गई एख निजी शिकायत पर आधारित थी, जिन्हें 2014 में यौन उत्पीड़न के आरोपों पर एक आंतरिक जांच के बाद बर्खास्त कर दिया गया था।
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उन्होंने दावा किया कि 2014 में उन्हें हनी ट्रैप में झूठा फंसाया गया और बाद में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें जातिवादी अपमान और धमकियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने इस बर्खास्तगी को 2015 में हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसने इसे इस्तीफे में बदल दिया था। उस समय समझौते के तहत दुर्गप्पा ने संस्थान और इसके प्रतिनिधियों के खिलाफ सभी शिकायतें और कानूनी मुकदमे वापस लेने पर सहमति दी थी।
इसके बाद उन्होंने दो और प्राथमिकियां दर्ज कराईं, जिन्हें 2022 और 2023 में रद्द कर दिया गया था। वर्तमान प्राथमिकी में भी इसी तरह के आरोप थे। कोर्ट ने इन्हें न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना। गोपालकृष्णन ने कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, मुझे हमारे कोर्ट और न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है। यह फैसला इस बात की पुष्टि करता है कि कानूनी प्रावधानों के दुरुपयोग को एक निष्पक्ष और और न्यायपूर्ण प्रणाली में जगह नहीं मिलती। मैं आभारी हूं कि माननीय हाई कोर्ट ने झूठ को पहचानते हुए सच को कायम रखा।