संविधान मामलों के जानकार सुभाष कश्यप कहते हैं, "संविधान के अनुसार मुख्यमंत्री की नियुक्ति के सवाल पर फैसला पूर्णतया राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में आता है।" वो कहते हैं, "राज्यपाल किसी को भी मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकते हैं। लेकिन ऐसा करते समय वो इस बात का ध्यान रखेंगे कि वो अपने विवेक का प्रयोग ऐसे व्यक्ति के पक्ष में करें जिसे उनके विचार में सदन का बहुमत हासिल होने की आशा हो। ऐसा इसलिए क्योंकि जो सरकार बनेगी वो विधानसभा के प्रति जिम्मेदार होगी और वहां बहुमत होना जरूरी होगा।"
"जहां तक पिछले उदाहरण को देखें तो आपको कई तरह के वाकये दिखेंगे। कहीं
राज्यपाल ने सबसे बड़े दल के नेता को सरकार बनाने के लिए न्योता दिया है तो कहीं चुनाव के बाद हुए गठबंधन के नेता को भी बुलाया है और कभी चुनाव से पहले हुए गठबंधन के नेता को बहुमत सिद्ध करने के लिए कहा है।" "ये उदाहरण भी इसी बात को साबित करते हैं कि ये पूरी तरह से राज्यपाल का फैसला होता है।" सुभाष कश्यप कहते हैं कि फिलहाल यहां सबसे बड़ा सवाल बहुमत का है, लेकिन इसका निर्णय केवल विधानसभा के भीतर ही हो सकता है।
इसके लिए सबसे पहले विधानसभा का गठन किया जाना जरूरी होगा। वो कहते हैं, "राजभवन में विधायकों की परेड करवा कर, सरकार बनाने का दावा पेश कर, लिस्टें बना कर बहुमत सिद्ध नहीं किया जा सकता।" "सुप्रीम कोर्ट ने बोम्मई मामले में दिए फैसले में और वेंकटचेलैया कमीशन रिपोर्ट और सरकारिया कमीशन रिपोर्ट में इस बात को कहा है कि बहुमत सिद्ध करने का काम सदन में ही होना चाहिए।"
सुभाष कश्यप कहते हैं ऐसा हो सकता है, लेकिन "वो तभी होता है जब कोई भी पक्ष बहुमत साबित ना कर सके। मुझे नहीं लगता कि ऐसी स्थिति आने की आशंका है कि कोई भी सरकार बन ना सके।'' "वो पहले एक पक्ष को सरकार बनाने का न्योता देंगे। अगर वो सरकार बनाने में नाकाम रही तो दूसरे पक्ष को न्योता दिया जाएगा। फिर भी सरकार ना बन पाई तो राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने की सिफारिश की जा सकती है। इसके बाद ही दोबारा चुनाव की स्थिति बन सकती है।"
सुभाष कश्यप कहते हैं कि केंद्र सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति ही राज्यपाल की नियुक्ति करते हैं और माना जाता है कि राज्यपाल केंद्र सरकार के नजदीक होते हैं। वो कहते हैं "ऐसे में ये संभावना जताई जाती है कि वो (राज्य की सत्ताधारी) विपक्षी पार्टी के खिलाफ फैसला ले सकते हैं, लेकिन ऐसा होता नहीं है।" "ये संवैधानिक पद है और ऐसा होना मुश्किल ही है क्योंकि यहां प्राथमिकता इस बात की होती है स्थिर सरकार बने।"
जिस समय देश के मौजूदा प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी, गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तब वजुभाई गुजरात के वित्तमंत्री थे। बतौर मुख्यमंत्री मोदी के 13 साल के कार्यकाल में वजुभाई 9 साल तक इस महत्वपूर्ण पद पर रहे। साल 2005-2006 के बीच वजुभाई राज्य में बीजेपी प्रमुख भी रहे। वजुभाई के नाम एक रिकॉर्ड ये भी है कि वो एक अकेले ऐसे वित्तमंत्री रहे जिन्होंने 18 बार राज्य का बजट पेश किया। उनकी गिनती उन कुछ नेताओं में भी की जाती है जो गुजरात में सत्ता हस्तांतरण (केशुभाई पटेल से नरेंद्र मोदी) होने के बाद भी वजूद में बने रहे। इसकी एक बड़ी वजह ये भी रही कि वजुभाई उस वक्त वित्तमंत्री थे, जिन्होंने 2001 में मोदी के पहले विधानसभा चुनाव के लिए अपनी राजकोट की सीट छोड़ दी थी।
वजुभाई राजकोट के एक व्यापारी परिवार से ताल्लुक रखते हैं। स्कूल के समय में ही वो आरएसएस से जुड़ गए थे। 26 साल की उम्र में वो जनसंघ से जुड़े और उसके बाद बहुत जल्द ही वे केशुबाई के करीबी हो गए। वे राजकोट के मेयर भी रहे। 1985 में पहली बार उन्होंने विधानसभा चुनावों के लिए नामांकन दाखिल किया। इस सीट से वो सात बार जीते। समय-समय पर वजुभाई पर आरोप भी लगते रहे। उन पर आरोप लगे कि राजकोट में बड़े बिल्डरों से संपर्क के चलते उनकी भी रियल-स्टेट संपत्ति बढ़ रही है, लेकिन इन आरोपों का उनके व्यक्तित्व पर कोई असर नहीं पड़ा।
वजुभाई को उनके विधानसभा क्षेत्र में मजेदार और जादुई भाषणों के लिए जाना जाता है। उन्हें लोगों की भीड़ जुटाने में माहिर समझा जाता है। उनकी छवि एक बेहद सामाजिक व्यक्ति के तौर पर है जो दोस्तों-रिश्तेदारों और दूसरे सामाजिक समारोहों में शिरकत करना पसंद करते हैं। इन सबसे इतर वजुभाई अपने कुछ बयानों के चलते विवादों में भी रहे। मैसूर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने लड़कियों को फैशन से दूर रहने की सलाह दी थी और कहा था कि कॉलेज फैशन करके आने की जगह नहीं है। उनके इस बयान पर काफी हंगामा बरपा था।