2013 से 2018 तक कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे सिद्धरमैया ने 1983 में पहली बार चामुंडेश्वरी सीट से विधानसभा में कदम रखा था। वह पांच बार इस सीट से जीते और तीन बार हार का स्वाद भी चख चुके हैं। वह राज्य में 13 बार बजट पेश कर चुके हैं। वह ‘कन्नड़ कवलू समिति’ के पहले अध्यक्ष थे, जिस निगरानी समिति का गठन रामकृष्ण हेगड़े के मुख्यमंत्रित्वकाल में कन्नड को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के संबंध में किया गया था। कर्नाटक में हालिया सर्वेक्षणों में सिद्धरमैया मतदाताओं की पहली पसंद रहे हैं...सी-वोटर एग्जिट पोल में 40.1 फीसदी मतदाताओं ने मुख्यमंत्री के तौर पर सिद्धरमैया को अपनी पसंद बताया था। जबकि शिवकुमार को केवल 4.2% मतदाताओं ने पसंद बताया था।
कांग्रेस की जीत से पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के हौसले बुलंद हैं। शनिवार दोपहर वह मैसूरु में एक प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करने पहुंचे तो जीत का उत्साह साफ नजर आ रहा था। सिद्धरमैया प्रचार अभियान के दौरान राज्य के लोगों को बार-बार यह बताते रहे थे कि यह उनका आखिरी चुनाव और इसके बाद वह सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लेंगे सीएम पद को लेकर उनकी महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है। स्पष्टवादी दलित नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के सियासी सफर पर एक नजर...
ढाई दशक तक ‘जनता परिवार’ में
कुरुबा समुदाय से तात्लुक रखने वाले सिद्धरमैया 2006 में कांग्रेस में शामिल होने से पहले ढाई दशक तक जनता दल का हिस्सा रहे हैं। उन्हें देवगौड़ा का करीब माना जाता था। 2004 में कांग्रेस-जदएस गठबंधन सरकार में सिद्धरमैया को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। 2005 में उन्होंने खुद को पिछड़े वर्ग के नेता के तौर पर स्थापित करना शुरू कर दिया। अंतत: देवगौड़ा के साथ मतभेदों के चलते जदएस से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
तब लेना चाहते थे संन्यास
जदएस से बर्खास्त किए जाने से पहले उन्हें पार्टी के कद्दावर नेता का रुतबा हासिल था। वह पार्टी की राज्य इकाई के प्रमुख के तौर पर भी कार्य कर चुके थे। विश्लेषकों का कहना है कि उन्हें हटाए जाने की प्रमुख वजह यह थी कि देवगौड़ा अपने बेटे कुमारस्वामी को पार्टी नेता के तौर पर स्थापित करना चाहते थे। पेशे से वकील रहे सिद्धरमैया ने उस समय ‘राजनीतिक संन्यास’ की बात कही थी। उन्होंने अलग पार्टी बनाने से साफ इंकार करते हुए कहा था कि धन-बल नहीं जुटा सकते। इसलिए बेहतर होगा कि राजनीति छोड़कर बतौर वकील फिर से अभ्यास करने लगें।
कांग्रेस का हाथ थाम शिखर छुआ
जदएस से बाहर किए जाने के बाद कांग्रेस और भाजपा दोनों ने उन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने कांग्रेस का हाथ थाम लिया। 2006 में इस पार्टी में आने के बाद ही उन्होंने शिखर को छुआ और 2013 में सीएम बने। उस समय उन्होंने कुर्सी की रेस में मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को पीछे छोड़ दिया था।