कारगिल की लड़ाई के दौरान बीएसएफ को जो भी जिम्मेदारी दी गई, उसे इस बल ने अपने शौर्य से पूरा कर दिखाया। 'काली पहाड़ी' एक सामरिक महत्व वाली जगह थी। पाकिस्तान ने इसके रास्ते में जगह जगह पर बारूद बिछा रखा था। बीएसएफ को यह जिम्मेदारी दी गई कि उसे किसी भी हाल में सामरिक महत्व वाली 'काली पहाड़ी' पर कब्जा करना है। वहां पर पाकिस्तान की सेना ने ऐसी किलेबंदी कर रखी थी कि परिंदा भी पर न मार सके। इसके बावजूद बीएसएफ की अचूक रणनीति और असीम शौर्य के चलते 'काली पहाड़ी' पर दोबारा से कब्जा कर लिया गया।
कश्मीर को लद्दाख से काटने की थी साजिश
बीएसएफ के मुताबिक, काली पहाड़ी क्षेत्र में बटालियन के वे सैनिक तैनात थे, जो बटालियन मुख्यालय को सुरक्षा प्रदान करते थे। बटालियन मुख्यालय को निशाना बनाकर पाकिस्तान की तरफ से भरपूर गोले गिराए गए थे। 1965 के दौरान, पाकिस्तान ने लद्दाख को कश्मीर घाटी से जोड़ने वाली सड़क को काटकर इस पहाड़ी पर कब्जा कर लिया था। आकलन के आधार पर, ब्रिगेड मुख्यालय ने बीएसएफ को 'काली पहाड़ी' पर कब्जा करने का आदेश दिया। पाकिस्तान द्वारा इस पहाड़ी के आसपास, बारूदी सुरंगे बिछाई गई थी। वहां पर सैनिकों के लिए कोई आश्रय या कोई दूसरी ऐसी व्यवस्था नहीं थी। पानी और भोजन, खच्चरों से भेजा जाता था। सैनिकों को खुले में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता था।
बारूदी सुरंगों से घिरे क्षेत्र में बीएसएफ जवानों ने दिखाया अदम्य साहस
काली पहाड़ी के इस जोखिम भरे आपरेशन के दौरान बीएसएफ के सहायक कमांडेंट सुरेंद्र सिंह ने एक छोटी सी टीम का नेतृत्व किया। टीम को यह बात मालूम थी कि काली पहाड़ी, बारूदी सुरंगों से घिरा एक क्षेत्र है, फिर भी बीएसएफ को उस पर कब्जा करने का काम सौंपा गया। इस क्षेत्र को दुश्मन की घुसपैठ और कब्जे से मुक्त कराना जरुरी था। एंटी-पर्सनल बारूदी सुरंगों पर पैर रखने की उच्च संभावना के बावजूद, बीएसएफ के चंद जांबाजों ने तय समय योजना के अनुसार काली पहाड़ी पर कब्जा करने के लिए आगे बढ़ना जारी रखा।
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पाकिस्तान को हुआ था भारी नुकसान
दुर्भाग्य से, सहायक कमांडेंट सुरेंद्र सिंह एक बारूदी सुरंग पर पैर रख बैठे और अपना एक पैर खो बैठे। उनकी वीरता के लिए उन्हें पराक्रम पदक से सम्मानित किया गया। यूनिट मोर्टार प्लाटून के अलावा, यूनिट को एसएचक्यू और ब्रिगेड से अतिरिक्त मोर्टार प्रदान किए गए। उन्हें विभिन्न एफडीएल पर तैनात किया गया। इन मोर्टारों का बीएसएफ जवानों द्वारा अत्यंत प्रभावी ढंग से उपयोग किया गया। सहायक कमांडेंट प्रदीप कुमार के निर्देशन में, चोरबत ला में तैनात मोर्टार अत्यंत प्रभावी रहे। उन्होंने पाकिस्तानी चौकियों के कई पेट्रोल, तेल और स्नेहक (पीओएल) भंडार, गोला-बारूद भंडार आदि को नष्ट कर दिया। चूंकि सेना के तोपखाने का कई मोर्चों पर बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा था, इसलिए सेना को गोलाबारी का निर्देशन करना मुश्किल हो रहा था।
बीएसएफ की चौकियां अग्रिम रिज लाइन पर थीं, इसलिए डिप्टी कमांडेंट अजीत कुमार व अन्य बीएसएफ कंपनी कमांडरों ने आर्टिलरी ऑपरेशन ऑपरेटर के रूप में कार्य कर गोलाबारी का निर्देशन किया। युद्ध में लगी कई सैन्य इकाइयों के कारण, आदेशों के त्वरित प्रसार की आवश्यकता थी। दक्षिण भारतीय राज्यों से संबंधित बीएसएफ कर्मियों को रेडियो टेलीफोनी (आरटी) प्रसारण प्रदान किया गया। यह बहुत उपयोगी साबित हुआ, क्योंकि सेना द्वारा सूचना के उल्लंघन के खतरे के बिना यथासंभव शीघ्रता से सूचना साझा की गई। साथ ही, पाकिस्तानियों के इंटरसेप्ट किए गए संदेशों को समझने में भी कठिनाई हुई, क्योंकि सेना के कर्मियों को स्थानीय भाषाएं नहीं आती थीं। इसके लिए आर्मी इंटरसेप्शन सेंटर में तैनात बीएसएफ के स्थानीय लद्दाखी कर्मी बहुत उपयोगी साबित हुए। बीएसएफ द्वारा सेना के हताहतों को, विशेष रूप से काकसर के आसपास के इलाकों में, प्रभावी चिकित्सा और रसद कवर प्रदान किया गया।