फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'कारगिल का नतीजा पाकिस्तान के लिए शर्मनाक था'

Wed, 25 Jul 2018 07:37 PM IST
बीबीसी
विज्ञापन
विज्ञापन
जगह- गारकॉन गांव, कारगिल का बटालिक सेक्टर। साल 1999, मई के शुरुआती दिन थे।
विज्ञापन


ताशि नामग्याल अपने घर से थोड़ी दूर गुम हो गई याक को ढूंढने निकले थे कि उनकी नजर काले कपड़े पहने हुए छह बंदूकधारियों पर पड़ी जो पत्थरों को हटा कर रहने की जगह बना रहे थे। उन्होंने ये बात स्थानीय भारतीय सैनिकों तक पहुंचाई। जल्द ही सेना की ओर से एक दल को जांच के लिए भेजा गया। और इस तरह कारगिल में घुसपैठ का पता चला।

भारतीय सेना को घुसपैठियों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और शुरुआत में भारत की ओर से कहा गया कि चरमपंथियों को जल्द ही निकाल दिया जाएगा। लेकिन जल्द साफ हो गया कि भारतीय सेना का सामना पाकिस्तानी सैनिकों से था।
विज्ञापन


भारतीय टेलीविजन के इतिहास में कारगिल भारत-पाकिस्तान के संघर्ष की पहली लड़ाई थी जिसकी तस्वीरें देश के घर-घर में पहुंचीं। इस बारे में पत्रकार बरखा दत्त ने कुछ साल पहले बीबीसी से बातचीत में याद दिलाया था कि उस जमाने में ओबी वैंस नहीं हुआ करती थीं।

उन्होंने कहा था, “जो हेलीकॉप्टर सैनिकों के शव वापस ले जाते थे, उनसे हम कहते थे कि हमारे टेप्स ले जाइए।” घुसपैठियों ने उन भारतीय चौकियों पर कब्जा किया था जिन्हें भारतीय सेना सर्दियों में खाली कर देती थी। पाकिस्तान की ओर से घुसपैठ की ख़बर भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की फरवरी 1999 की लाहौर यात्रा के चंद महीनों के बाद ही आई थी।

पाकिस्तान आखिर क्या हासिल करना चाहता था?

पाकिस्तानी सेना के पूर्व चीफ ऑफ जनरल स्टॉफ लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) शाहिद अजीज ने अपनी किताब 'ये खामोशी कहां तक' में कारगिल में पाकिस्तानी सेना की भूमिका के बारे में विस्तार से लिखा है। लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) शाहिद अजीज ने बीबीसी से बातचीत करने से मना कर दिया।

लेकिन पाकिस्तान के जियो टीवी से बातचीत में उन्होंने कहा था, “जनरल मुशर्रफ ने जो मकसद ऐलान किया था, वो ये था कि कारगिल की वजह से सियाचिन की सप्लाई लाइन कट जाएगी और हिंदुस्तान की फौज को हम सियाचिन से निकलने पर मजबूर कर देंगे। फिर इसकी वजह से उस पर इतना अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ेगा कि इस किस्म की जंग दो परमाणु शक्ति देशों में फैल सकती है। उस दबाव की वजह से भारत कश्मीर पर बात करने के लिए राजी हो जाएगा।”

हमले के वक्त लेफ्टिनेंट जनरल शाहिद अजीज पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई में ऊंचे पद पर थे। लेकिन उन्हें भी लाइन ऑफ कंट्रोल पर चल रही घुसपैठ पर कोई जानकारी नहीं थी।

उनके मुताबिक, भारतीय चौकियों पर कब्जा करने की योजना में मुख्य रूप से चार लोग शामिल थे- तब के सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ, चीफ ऑफ जनरल स्टॉफ लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद अजीज, लेफ्टिनेंट जनरल जावेद हसन और लेफ्टिनेंट जनरल महमूद अहमद।

उनके अनुसार ज्यादातर कोर कमांडरों को भी इसके बारे में कुछ पता नहीं था।

हवाई बमबारी

लेफ्टिनेंट जनरल शाहिद अजीज कहते हैं, "मुझे नहीं लगता कि आईएसआई को इस बारे में पता नहीं था। मेरा अंदाजा है कि गिलगित में इतनी फौज की हरकत, इतने सिपाहियों को लाना, ले जाना, आईएसआई की नजरों से छिपा नहीं रह सकता था। मैं खुद हैरान हूं कि भारतीय इंटेलिजेंस की ये इतना बड़ी विफलता थी कि उन्हें कैसे पता नहीं चला।"

भारतीय जवानों के लिए स्थिति कठिन थी। घुसपैठिए ऊंची पहाड़ियों पर भारी हथियार, गोला बारूद लेकर बैठे थे और भारतीय जवानों के लिए गोलियों की बौछार के बीच में पहाड़ियों की चोटियों पर पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण था।

उस वक्त के भारतीय सेना के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री इंटेलीजेंस लेफ्टिनेंट जनरल आरके साहनी बताते हैं, “अगर आज भी आप किसी को वहां लेकर जाएं तो वो अचंभा करते हैं कि क्या इतनी ऊंची पहाड़ियों पर हमला करना मुमकिन था? इस ऑपरेशन में बहुत जवान मारे गए। आप सोचिए कि एक कंपनी चल रही है जिसके अंदर 70 या 80 आदमी हों, उनमें से 30 या 40 लोग या तो मारे जाएं या घायल हो जाएं, ये संख्या बहुत ज्यादा है। घायलों और मृत जवानों की जगह नए लोगों ने ली। उनमें ऐसा जोश था कि उन्होंने दिमाग में ठान ली है कि ऊपर जाकर रहेंगे।”

लड़ाई का दायरा फैलना शुरू हो गया था। मृत भारतीय सैनिकों की बढ़ती संख्या ने सरकार को कोई ठोस निर्णय लेने पर विवश किया। 25 मई को दिल्ली में सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति में 30 साल में पहली बार पाकिस्तान समर्थित घुसपैठियों के खिलाफ हवाई हमले का निर्णय लिया।

लेफ्टिनेंट जनरल साहनी याद करते हैं, “विमानों की बमबारी अचूक थी। जिस तरह उन्होंने पहाड़ों पर लॉजिस्टिक बेसों को बरबाद किया उससे भारतीय सेना को बहुत फायदा पहुंचा। अटल बिहारी वाजपेयी का राजनीति नेतृत्व अपने आप में बेमिसाल है। मैंने उनके चेहरे पर कभी कोई शिकन नहीं देखी। मैंने उनके साथ कई मीटिंगें अटेंड की थीं। मैंने ऐसा दृढ़ विचार का नेता नहीं देखा।”

पाकिस्तान ने भारतीय हवाई हमलों को बेहद गंभीर बताया। इस दौरान दो भारतीय सैन्य विमानों को गिराया गया। परमाणु हथियारों से लैस दो देशों के बीच चल रही गोलाबारी के कारण अंतरराष्ट्रीय चिंताएं बढ़ने लगीं।

मुशर्रफ की महत्वाकांक्षाएं

पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफेसर इश्तियाक अहमद कहते हैं, “चिंता उस वक्त ये थी कि कहीं ये इलाका न्यूक्लियर फ्लैशप्वाइंट न बन जाए। पाकिस्तान में लोकतंत्र को देखने वाले तबके में चिंता थी। उन्हें लगता था कि अगर पाकिस्तान की तरफ से इस लड़ाई की शुरुआत की गई है तो ये बहुत गैर-जिम्मेदाराना कदम है।”

प्रोफेसर अहमद के अनुसार, “जनरल मुशर्रफ की अपनी महत्वाकांक्षाएं थीं। उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा 1999 के तख्तापलट में पूरी की। नौ साल उन्होंने पाकिस्तान में शासन किया। ऐसा व्यक्ति जो ऐसे वाकये को अंजाम देता है, जिसके कारण पाकिस्तान को सैनिकों, संसाधनों का और कूटनीतिक नुकसान पहुंचा, वही व्यक्ति जब सत्ता में आता है तो शांति वार्ता के लिए आगरा पहुंच जाता है।”

आखिरकार भारत और पाकिस्तान बिगड़ती स्थिति को संभालने के लिए बातचीत पर सहमत हुए। भारतीय सेना के हमलों के कारण उसकी स्थिति मजबूत होनी शुरू हुई। भारतीय सैनिकों ने जबरदस्त लड़ाई के बाद घुसपैठियों को भगाते हुए तोलोलिंग, टाइगर हिल जैसी महत्वपूर्ण चोटियों पर कब्जा किया।

भारतीय सैनिकों के लौटते शवों ने कारगिल की लड़ाई को देश के कोने-कोने में पहुंचा दिया। जुलाई में पाकिस्तानी घुसपैठियों ने वापस जाना शुरू किया। इस दौरान भारत की ओर से चीन में मौजूद जनरल परवेज मुशर्रफ और लेफ्टिनेंट जनरल अजीज खान की बातचीत के क्लिप को सबूत के तौर पर पेश किया कि पाकिस्तानी सेना इस लड़ाई में शामिल थी।

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से मदद की उम्मीद थी, लेकिन ऐसा न हुआ।
विज्ञापन

युद्ध का अंत

आखिरकार 26 जुलाई को कारगिल युद्ध का अंत हुआ। कारगिल युद्ध का पाकिस्तान की राजनीति पर क्या असर हुआ।

प्रोफेसर इश्तियाक अहमद बताते हैं, “कारगिल का नतीजा पाकिस्तान के लिए शर्मनाक था। नवाज शरीफ सरकार ने भारत के साथ बेहद महत्वपूर्ण बातचीत शुरू की थी। विदेश सचिवों की बात हो रही थी। अटल बिहारी वाजपेयी लाहौर आए। मीनार-ए-पाकिस्तान पर खड़े होकर उन्होंने पाकिस्तान के साथ दोस्ती की बात की। अब हम चाहते हैं कि जो उस वक्त हुआ, अब भी वही हो। अगर जनरल मुशर्रफ की कोई भूमिका बनती है तो कोई जवाबदेही होनी चाहिए।”

भारत में भी कारगिल रिव्यू कमेटी बनी और कई सुझाव दिए गए।

लेफ्टिनेंट जनरल साहनी कहते हैं, “समिति में सीडीएस (चीफ आफ डिफेंस स्टॉफ) की बात बोली गई थी। उसके ऊपर किसी किस्म का काम नहीं किया गया। सीडीएस की कमी का खामियाजा भारत को भुगतना पड़ेगा।”

कारगिल में मारे गए जवानों की प्रतिमाएं, उनके नाम पर पार्क आपको भारत के कोने-कोने में मिलेंगे। जब कारगिल युद्ध चरम पर था तो हजारों गोले रोज दागे जाते थे। रेड क्रॉस के मुताबिक, इस युद्ध के कारण पाकिस्तान प्रशासित इलाकों में करीब 30,000 लोगों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा और भारत प्रशासित इलाकों में करीब 20,000 लोगों पर असर पड़ा।

उनमें से कई लोग आज भी कारगिल युद्ध को भय और दहशत के साथ याद करते हैं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें