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कानों देखी: राजनाथ सिंह मुस्कराए....सियासी गलियारों की दिलचस्प खबरें

Fri, 08 Feb 2019 08:05 PM IST
शशिधर पाठक शशिधर पाठक, नई दिल्ली
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Rajnath Singh
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केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के चेहरे पर मुस्कराहट फिर लौट आई है। केंद्रीय गृहमंत्री के करीबी इस मुस्कराहट के पीछे उनका कद और दिखाई दे रहा अवसर मान रहे हैं। भाजपा के संकल्प पत्र को तैयार करने की जिम्मेदारी ने भी खुश रहने पर मजबूर कर दिया है। 2019 में लोकसभा चुनाव को लेकर जैसे-जैसे भाजपा की चुनौती बढ़ रही है, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के लिए अवसर के दरवाजे खुल रहे हैं। नितिन गड़करी को लेकर जहां अफवाहों का बाजार चढ़ा हुआ है, वहीं जेपी नड्डा की टीम को अवसर ब्राइट नजर आ रहा है। यहां तक गठबंधन की मंत्री अनुप्रिया पटेल भी खुश नजर आ रही हैं। उन्हें अपना दल खड़ा दिखाई देने लगा है। 

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राम विलास पासवान को भी बिहार में छह में पांच मनमाफिक सीटों पर जीत मिलने की उम्मीद दिखाई देने लग गई है। राजीव प्रताप रुडी की पूछ बढ़ रही है। जबकि कभी हालत यह थी कि आधे खामोश थे और आधे सरकार के साथ थे। कभी जम्मू-कश्मीर और आतंकवाद को लेकर गृहमंत्री को भी लग रहा था कि पैसा और पॉवर उनके पास हो तो सब ठीक कर दें। क्योंकि तब तमाम निर्णय बिना उनकी जानकारी में आए हो जाया करते थे। इस चर्चा के छिड़ने पर केन्द्र सरकार के एक एमओएस ने कहा कि पुराने दिन भूल जाया कीजिए। जब गरीबी होती है तभी आटा गीला रहने का खतरा भी रहता है।

प्रियंका गांधी आई और बैठ गई

आपका एक तरीका, आपके बारे में राय बदल देता है। यही हुआ। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को लेकर लोगों को उम्मीद थी भाई और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ पार्टी मुख्यालय आएंगी। महासचिवों, पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में हिस्सा लेंगी। दमदारी से पक्ष रखेंगी और फिर.....। लेकिन हुआ उल्टा। प्रियंका गांधी मीटिंग शुरू होने के काफी पहले हर महासचिव की तरह आईं। अपने दफ्तर में बैठ गईं। ज्योतिरादित्य समेत अन्य से चर्चा करती रहीं। 
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प्रियंका के आने के काफी समय बाद राहुल गांधी दस जनपथ के छोटे से गेट से 24 अकबर रोड, कांग्रेस मुख्यालय में दाखिल हुए। अन्य महासचिवों की तरह प्रियंका ने भी कांग्रेस अध्यक्ष के आने और बैठक के अनुशासन का पालन करते हुए मीडिया हाल की तरफ का रुख किया और भंवर जितेन्द्र सिंह के बगल में चुपचाप जाकर बैठ गई। बताते हैं इस बैठक में चुनाव पर चर्चा हुई। उत्तर प्रदेश में राजनीतिक तैयारी पर चर्चा हुई और प्रियंका की लगातार सक्रियता बनी रही। 

फाइल के लिए टॉप रही है मंत्री जी की टेबल

बागपत के सांसद हैं। पूर्व पुलिस कमिश्नर मुंबई रहे हैं। रसूखदार पर्सनालिटी लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्री ने अपने राज्यमंत्री को कठपुतली बना रखा है। वैसे यह कोई नई बात नहीं है। उपेन्द्र कुशवाहा भी इसी तरह मंत्रालय में बैठकर मक्खी मारते थे। प्रकाश जावड़ेकर के एक दफ्तरी का कहना है कि डा. सत्यपाल सिंह आफिस आते हैं, चाय पीते हैं, घर चले जाते हैं। चाहे जब जाइए उनकी टेबल खाली ही मिलेगी। कारण पूछने पर सूत्र का कहना है कि उनके पास कोई फाइल ही नहीं जाती। बताते हैं मंत्री जी को नेशनल बुक ट्रस्ट के नए चेयरमैन की नियुक्ति को लेकर फाइल का इंतजार था। 

वर्तमान चेयरमैन बलदेव भाई शर्मा की नियुक्ति हिमाचल प्रदेश के एक विश्वविद्यालय में बतौर प्रोफेसर हो चुकी है इसलिए इस कुर्सी पर कई लोगों की नजर थी। एनबीटी की निदेशक रीता चौधरी भी बलदेव भाई शर्मा के संपर्क जादू से परेशान हैं। आरएसएस के अशोक बेरी और डा. कृष्ण गोपाल की छत्रछाया उन पर है। बताते हैं डा. सत्यपाल एनबीटी से जुड़ी इस फाइल का इंतजार करते रह गए और प्रकाश जावड़ेकर ने बिना उन्हें फाइल का मुंह दिखाए बलदेव भाई शर्मा के अगले महीने खत्म हो रहे कार्यकाल को फिर आगे बढ़ा दिया। पड़ताल करने पर पता चला कि वैसे भी डा. सत्यपाल के पास कोई फाइल आती ही नहीं। 

सचिव महोदय घास डालें तब न

पीएमओ और मंत्रालय के सेक्रेटरी सीधे संबंध साध लेते हैं, मंत्री जी बस चेहरा बने हुए हैं। पॉवर से लेकर टेलीकॉम तक कई मंत्रालयों का हाल यही है। थवर चंद गहलोत के मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है कि इससे मंत्री जी कोई गलत फाइल आगे नहीं बढ़वा पाते। उन्हें भी डर बना रहता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय की निगाह है। हालांकि सूत्र का कहना है कि कोई भी सरकार दूध की धुली होकर नहीं चल सकती। सूत्र का कहना है कि कई अहम मामलों में मंत्री जी को भी पता नहीं होता कि क्या हो गया? 

उन्हें भी मंत्रालय के सचिव से जानकारी लेनी पड़ती है। यह जानकारी तब आई, जब रक्षा मंत्रालय की राफेल से जुड़ी फाइल के दस्तावेज द हिन्दू अखबार में प्रकाशित हुए। इस पर चर्चा के दौरान एक नौकरशाह ने कहा कि उन्हें इस पर कोई आश्चर्य नहीं है। उनके मंत्री को भी बहुत कुछ पता नहीं होता, क्योंकि मंत्रालय पीएमओ चलाता है। ऐसे में कुछ मंत्रालय के सचिव ऐसे भी हैं जो अपने मंत्री पर बमुश्किल ही घास डालते हैं। 

केंद्र सरकार को  ममता दीदी ने सिखाया प्रशासनिक खेल

ममता दीदी की सरकार ने राज्यों में बैठा सीबीआई का खौफ खत्म कर दिया। बताते हैं ममता दीदी को काफी पहले पता चल गया था कि सीबीआई के अफसर उनके सुपर कॉप, कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार को गिरफ्तार करने आ रहे हैं। सीबीआई ने खुद इसे कोलकाता के अधिकारियों को सीक्रेट ऑपरेशन बताया था। अपने कई दशक के राजनीतिक करियर में ममता दीदी ने खूब संघर्ष किया है। लाठी भी खाई है और अधिकारियों के झमेले भी झेले हैं। 

लिहाजा ममता को सीबीआई का सीक्रेट ऑपरेशन और भाजपा नेतृत्व का हिडेन ऑपरेशन समझते देर न लगी। वह फौरन पुलिस कमिश्नर के घर पहुंच गई। कुछ दिग्गज वकील भी बुलाए गए। चीफ सेक्रेटरी भी पहुंचे। ममता ने बाकायदा विचार किया और सीबीआई के अफसरों को यह कहकर पुलिस थाने भिजवा दिया कि संघीय ढांचे का आदर करना केवल उनका ही काम नहीं है। इतना ही नहीं दीदी की पुलिस ने सीबीआई के अफसरों पर तोड़-फोड़ का आरोप लगाया है। 

ताकि यदि कोलकाता पुलिस के अफसर को केंद्रीय एजेंसी परेशान करे तो सीबीआई के अफसरों को भी कोलकाता पुलिस को झेलना पड़े। बताते हैं दीदी भी खिलाड़ी हैं। उन्हें पता है कि सीबीआई केंद्रीय एजेंसी है। गिरफ्तार करके रखना कितना बड़ा जुर्म है, लिहाजा उन्होंने अफसरों को बाद में छोडने का फरमान भी जारी करा दिया। जब से उन्होंने आयरन लेडी का यह कदम उठाया है केंद्र से लेकर पश्चिम बंगाल के सरकार के अफसर तक उनका लोहा मानने लगे हैं। 

वहीं मोदी सरकार के अफसरों को भी समझ में आ गया कि ममता को भले ही लोग मेंटल कहने की जुर्रत करें, लेकिन उनसे मोर्चा लेना भी आसान नहीं है। केंद्रीय गृहमंत्रालय भी अब इस मामले में किसी तरह से इज्जत बचाने में लगा है। उसे भी पता है कि कुछ दिन की बात, चुनाव की घोषणा होने ही वाली है।
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पहले तोडऩे में व्यस्त थे, अब बचाने में

खबर में दम है। मई 2014 के बाद से भाजपा ने जहां चाहा विरोधियों की पार्टी के नेताओं को तोड़ लिया। जगदंबिका पाल, नरेश अग्रवाल सरीखे जो चाहे भाजपा में चले गए। बताते हैं नरेश अग्रवाल को अब वहां बहुत अच्छा नहीं लग रहा है। जगदंबिका पाल 2019 की राजनीति का पारा नाप रहे हैं। इसके साथ-साथ भाजपा की दूसरी परेशानी शुरू हो गई है। 

बताते हैं पार्टी हर राज्य में अपने उन नेताओं को चिन्हित करने में लगी है, जो उसका साथ छोड़ सकते हैं। उत्तर प्रदेश संगठन से जुड़े एक नेता का कहना है कि टिकट की घोषणा होने के बाद राज्य में भाजपा के कई नेता विद्रोह कर सकते हैं। सूत्र का कहना है कि इसका खतरा बढ़ रहा है। पूर्वांचल (पूर्वी उ.प्र.) के एक सांसद का कहना है कि टिकट न मिलने का डर कई में है। जिसका कटेगा, वह तो अपना भला सोचेगा ही। बताते हैं इस बार यह खतरा म.प्र., छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पंजाब, उ.प्र. में सबसे ज्यादा है।

जिताऊ उम्मीदवार की तलाश

कांग्रेस और भाजपा दोनों को इसकी सख्त जरूरत है। दोनों ही दल उ.प्र. और बिहार में जिताऊ उम्मीदवार खोज रहे हैं। राज्यसभा सांसद राम कृपाल सिन्हा का कहना है कि हर बार वही लोग पटना साहिब से शत्रुघ्न सिन्हा को जिताते थे। इस बार बिहारी बाबू की खैर नहीं है, लेकिन भाजपा भी बिहारी बाबू की सीट से सही नाम तलाशने में खूब मशक्कत कर रही है। पार्टी के कई सिटिंग सांसदों का टिकट कटना तय है। 18 सीट पर ही चुनाव लड़ना है और तीन दर्जन नये चेहरे टिकट पाने की जोर अजमाइश में लगे हैं। यही हाल उ.प्र. में है। 69 सांसदों में से दर्जन भर को छोड़कर सब पर नये दावेदार तैयार हैं। ऐसे में भाजपा अध्यक्ष की टीम को काफी कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। 

कांग्रेस पार्टी की परेशानी दूसरी है। अभी तक उसके पास उ.प्र., बिहार में मजबूत टिकटार्थी ही नहीं थे। बिहार में जहां टिकटार्थी की लाइन लगने लगी है, वहीं उ.प्र. में भी लोग संपर्क अभियान तेज कर दिए है। कुछ बाहुबली भी टिकट मांग रहे हैं। उनके पैरोकारों ने भी जोर लगा दिया है। जबकि कांग्रेस पार्टी के पास प्रत्याशी को परख पाने का भी समय नहीं बचा है। इससे विकट स्थिति सपा-बसपा की है। वह अपने अपने कोटे में किसका टिकट काटे और किसकों दें? रस्साकसी जारी है।
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