उदयपुर के कन्हैयालाल हत्याकांड ने पूरे देश के जनमानस को झिंझोड़कर रख दिया है। लोग बेहद आतंकित और सशंकित नजरों से यह महसूस करने लगे हैं कि देश में मजहबी कट्टरता अब उस स्तर में प्रवेश कर गई है जहां एक सोशल मीडिया पोस्ट किसी के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। यह किसी एक घटना के कारण पैदा हुई ‘समझ’ नहीं है। कानपुर में सड़कों पर उतरी भीड़, मध्यप्रदेश में पुलिस के ऊपर हुई हिंसा के साथ महाराष्ट्र के अमरावती में उमेश कोल्हे हत्याकांड ने कन्हैयालाल हत्याकांड से उपजे विचार को समाज में स्थापित करने का काम किया है। क्या ये घटनाएं भारत में ‘तालिबानी विचारधारा’ के उभार के संकेत दे रही हैं? इस संकट से निबटने के लिए क्या उपाय हो सकते हैं?
देश में घट रही इन्हीं घटनाओं के बीच राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक स्तर की बैठक राजस्थान के झुंझनू में हुई। माना जा रहा है कि इस बैठक में इन ज्वलंत मुद्दों पर भी चर्चा हुई। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) इन घटनाओं को किस तरह देखता है और इनके समाधान के लिए वह किस विकल्प को उचित मानता है?
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि पूर्व में हिंदुस्तान का हिस्सा होने और देश में मुसलमानों की भारी आबादी के कारण हमारे यहां अफगानिस्तान और पाकिस्तान की घटनाओं का सीधा असर पड़ता है। वहां कट्टर इस्लामिक विचारधारा के उभार से भारत में भी इस्लामिक कट्टरवादी सोच रखने वालों को बल मिलता है। अफगानिस्तान में तालिबानी शासन स्थापित होने के बाद कुछ लोगों के इसके समर्थन में आए बयान को इसी कड़ी से जोड़कर देखा जा सकता है, लेकिन यदि देश को इस तरह की तालिबानी सोच से बचाना है तो इसके लिए आवश्यक है कि हम देश में हिंदू-मुसलमान के बीच की खाई न बढ़ने दें।
ध्यान से देखें तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ लगातार इस दिशा में काम करता रहा है। वह भारत के मुसलमानों को अलग संप्रदाय का व्यक्ति तो अवश्य मानता है, लेकिन वह यह भी मानता है कि उनके पूर्वज और हिंदुओं के पूर्वज एक थे, इसलिए उसकी दृष्टि में हिंदू-मुसलमानों में कोई भेद नहीं है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने स्पष्ट कह दिया है कि मुसलमान किसी दूसरे देश से आए लोग नहीं हैं, वे यहीं के हैं और उनके पूर्वज हमारे पूर्वज एक थे। लिहाजा दोनों में कोई टकराव नहीं हो सकता।
गोलवलकर अब ज्यादा प्रासंगिक
अपने कठोर हिंदूवादी विचारों के लिए जाने जाने वाले गोलवलकर भी इसी विचार के पोषक थे। वे मानते थे कि मुस्लिम अपनी पूजा-पद्धति बनाए रखते हुए हिंदुस्तानी संस्कृति के वाहक हो सकते हैं और इसमें उन्हें कभी कोई विरोध नजर नहीं आता था। हालांकि, संघ का आरोप है कि राजनीतिक कारणों से गोलवलकर के कठोर विचारों को ही ज्यादा प्रमुखता दी गई। लेकिन समय के साथ प्रासंगिकता बढ़ने के कारण उनके ये विचार सामने आ रहे हैं।
पूजा पद्धति अलग, लेकिन राष्ट्र एक
संघ बार-बार उदाहरण देता है कि मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे देश अलग-अलग पूजा पद्धति अपनाने के बाद भी अपनी हिंदू सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखे हुए हैं। इसी प्रकार देश के मुसलमानों को भी अपनी मूल सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए। वे अपनी पूजा पद्धति बनाए रखें, इससे हिंदुओं को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। इस विचार से समाज में एकता स्थापित की जा सकती है और इससे तालिबानी सोच से मुकाबला किया जा सकता है।
भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी दिखी झलक
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को भाजपा का मातृ संगठन माना जाता है। कहा जाता है कि संघ अपने विचारों को राजनीतिक अमलीजामा पहनाने के लिए भाजपा का उपयोग करता है। इसी दृष्टि में देखें तो संघ का यह विचार भाजपा की सोच में भी साफ दिखाई पड़ने लगा है। हैदराबाद की कार्यकारिणी की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की है कि भाजपा अल्पसंख्यक समुदाय का दिल जीतने के लिए पूरे देश में स्नेह यात्राएं निकालेगी। यह अल्पसंख्यक समुदाय का भरोसा जीतने की कोशिश है और संघ के साथ-साथ भाजपा नेता भी मानते हैं कि इसी रास्ते से उदयपुर-अमरावती जैसी घटनाओं को रोकने की सफल कोशिश की जा सकती है।
सरकारें कठोर कदम उठाएं: आरएसएस
आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने अमर उजाला से कहा कि इस तरह की घटनाएं किसी भी देश के लिए बड़ी चुनौती हैं, लेकिन यदि सरकार और समाज इनका मुकाबला करना चाहे तो इससे आसानी से निबटा जा सकता है। उन्होंने कहा कि ये समस्याएं कानून और समाज के दोहरे मोर्चे पर चुनौती पैदा करती हैं। सरकारों को चाहिए कि वे सभी कानूनी उपायों को लागू करते हुए इन घटनाओं को रोकने के लिए हर संभव कदम उठाएं।
समाज में न मिले छिपने की जगह
सुनील आंबेकर ने कहा कि इस तरह के अपराधी समाज में जाति-धर्म की दीवारों के पीछे छिपने का काम करते हैं। जब समाज के कुछ लोग अपने जाति-धर्म के नाम पर इन अपराधियों का बचाव करने लगते हैं तब इन्हें रोकना कठिन हो जाता है, लेकिन इन्हें जाति-धर्म की दीवारों के पीछे छिपने की जगह नहीं मिलनी चाहिए। इसके लिए समाज को खुलकर इनका विरोध करना चाहिए।
मुस्लिम समुदाय करे विरोध
उन्होंने कहा कि उदयपुर जैसी हिंसा का हिंदू समुदाय ने जोरदार विरोध किया है। मुस्लिम समुदाय से कुछ आवाजें इसके विरोध में उठी हुई दिखाई पड़ती हैं, लेकिन समाज के स्तर पर इनका कठोर विरोध नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज से भी उदयपुर जैसी हिंसा करने वाले अपराधियों का कठोर विरोध होना चाहिए। इस तरह की घटनाओं पर तभी अंकुश लगाया जा सकेगा।