पीठ ने गौर किया कि 30 जनवरी 2013 की वारदात में आरोपी को 4 फरवरी को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद निचली अदालत ने 26 फरवरी तक सात तारीखों में 13 गवाहों के बयान दर्ज किए और अगली पांच तारीखों में सुनवाई के बाद 4 मार्च 2013 को फांसी की सजा सुना दी। पीठ ने कहा, निचली अदालत का रवैया इस केस में सही नहीं था। जून 2013 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को कायम रखने का आदेश दिया।
कहां हुई गड़बड़ी
आरोपी की ओर से पेश वकील सिद्धार्थ लूथरा ने पीठ को बताया कि आरोपी का बचाव करने के लिए ट्रायल कोर्ट द्वारा नियुक्त अमाइकस क्यूरी को मामले का अध्ययन करने और उचित निर्देश प्राप्त करने का वक्त नहीं दिया गया। उसे अभियुक्त से बातचीत करने का भी पर्याप्त अवसर नहीं मिला। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी प्रोबेशन अधिकारी से कोई रिपोर्ट प्राप्त नहीं की गई थी, जो इस बात के लिए मूल्यवान इनपुट दे सकते थे कि क्या मामले में किसी तरह की छूट दी जा सकती है।
अमाइकस क्यूरी की नियुक्ति के भी दिए दिशा निर्देश
पीठ ने आजीवन कारावास या मौत की सजा के मामले में अमाइकस क्यूरी नियुक्त करने को लेकर भी कुछ दिशा निर्देश जारी किए। पीठ ने कहा, कम से कम 10 साल के अभ्यास वाले वकील को ही अमाइकस क्यूरी नियुक्त किया जाना चाहिए। इसके अलावा मौत की सजा की पुष्टि के संबंध में हाईकोर्ट द्वारा निपटाये गए मामलों में कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं को पहले अमाइकस क्यूरी के तौर पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही यह भी जरूरी है कि अमाइकस क्यूरी को मामले का अध्ययन करने के लिए कम से कम 7 दिन का समय दिया जाए।