छत्तीसगढ़ के बस्तर में पत्रकार डर के माहौल में काम कर रहे हैं। पत्रकारों को सच लिखने नहीं दिया जा रहा और जो सच लिखने की हिमाकत करते हुए ऐसे डरा दिया जाता है कि वो सच की तरफ देखने से पहले भी सोच रहे हैं।
बस्तर में कुछ पत्रकारों की गिरफ्तारी और कुछ पत्रकारों को मिली धमकियों के बाद एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की एक फैक्ट फाइंडिंग टीम ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि बस्तर में पत्रकार दोहरे दबाव में काम कर रहे हैं। एडिटर्स गिल्ड की रिपोर्ट में पत्रकारों के हवाले से कहा गया है कि पत्रकारों के मुताबिक नक्सली कहते है कि जो सच है उसे जस का तस लिखो तो दूसरी तरफ पुलिस कहती है जो वो कह रहे हैं, वो लिखो। ऐसे में दोनों तरफ से मार पत्रकारों पर ही पड़ रही है।
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की फैक्ट फाइडिंग टीम की रिपोर्ट में ऐसे ही तथ्य सामने आए हैं। एडिटर्स गिल्ड के मुताबिक बस्तर में गिरफ्तार किए गए संतोष यादव को पुलिस ने माओवादियों से संबंध होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है। छत्तीसगढ़ सरकार का मानना है कि संतोष यादव कोई पत्रकार नहीं है जबकि तथ्य यह है कि संतोष यादव दो समाचार पत्रों के लिए लिखते थे। दोनों ही समाचार पत्रों के मालिक वहीं हैं। छत्तीसगढ़ सरकार का कहना है कि संतोष यादव के खिलाफ उनके पास पर्याप्त सुबूत हैं जो साफ इशारा करते हैं कि उनके माओवादियों से संबंध हैं। अब कोर्ट में यह निर्णय होगा कि वह दोषी है कि नहीं। यह सारे सुबूत कोर्ट को दिए जाएंगे। लेकिन वहां काम करने वाले कुछ वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि संतोष यादव को परिस्थितियों का शिकार बने हैं, उन्हें संदेह का लाभ मिलना चाहिए।
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि राज्य प्रशासन स्क्रॉल डॉट इन की पत्रकार मालिनी सुब्रहमण्यम की रिपोर्ट से खुश नहीं थे। स्क्रॉल डॉट इन पर उनकी रिपोर्ट आने के बाद एक तथाकथित फोरम 'सामाजिक एकता मंच' के लोगों ने पत्रकार मलिनी के घर पर हमला कर दिया। साथ ही मलिनी को घर, शहर और राज्य छोड़ने तक पर मजबूर कर दिया।
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा ही कुछ वाकया बीबीसी के लिए काम करने वाले आलोक पुतुल के साथ भी हुआ था। बीबीसी के लिए जब वो छत्तीसगढ़ में कानून व्यवस्था के हालात पर वो तथ्य जुटा रहे थे। तो बस्तर के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने उनसे मिलने या बात करने के बजाय उनको मैसेज भेजकर राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रवाद को लेकर प्रश्न किया। बाद में उनको पता चला कि कुछ लोग उनको ढूंढ रहे हैं। तो उन्होंने खुद के बचाव में यह स्थान छोड़ने का फैसला किया। इस मुद्दे पर पुलिस वालों ने एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की फैक्ट फाइंडिंग टीम से मिलने से मना कर दिया। बाद में टीम से मिले बस्तर के डीएम ने भी पत्रकार को मिलने धमकी को 'कम्युनिकेशन गैप' बताया।
रिपोर्ट के मुताबिक बस्तर में काम करने वाले पत्रकारों में एक तरह का खौफ बैठा हुआ है। संपादक सुनील कुमार के साथ-साथ कई संपादकों ने इस बात की पुष्टि की है। सुनील कुमार ने बताया कि बस्तर में काम करने वाले पत्रकार दोनों तरफ से घिरे हुए हैं। एक तरफ माओवादी हैं जो चाहते हैं कि तो जैसा है वैसा ही प्रकाशित हो जाए। वहीं पुलिस चाहती है कि उसके हिसाब से मीडिया वहां की रिपोर्टिंग करें।
फैक्ट फाइंडिंग टीम को वरिष्ठ संपादक ललित सुरजन ने बताया कि अगर आप स्वतंत्र रूप से इस बात का अध्ययन करें तो पता चलेगा कि लोग आपको इस तरह से देखते है कि या तो आप सरकार के साथ हैं या फिर माओवादियों के साथ। पत्रकारिता के लिए लोकतंत्र में स्थान लगातार सिकुड़ता जा रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार के करीबी एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि यहां की सरकार को लगता है कि देश का राष्ट्रीय मीडिया माओवादियों के साथ खड़ा है।
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की फैक्ट फाइंडिंग टीम का मानना है कि जो भी समाचार संस्थान बस्तर में पत्रकारों को नियुक्त करने से पहले सावधानी बरते, साथ ही वहां नियुक्त पत्रकारों की सुरक्षा का भी ध्यान रखें।
छत्तीसगढ़ के बस्तर गई एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की फैक्ट फाइंडिंग टीम में गिल्ड के महासचिव प्रकाश दुबे, कार्यकारी समिति के सदस्य सीमा चिश्ती और विनोद वर्मा शामिल थे।