पासवान के व्यक्तित्व की यह खास बात रही कि उन्हें चाहे किसी भी पार्टी और गठबंधन के साथ काम करना पड़ा हो, मगर वे सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ते रहे। प्रो. आनंद कुमार ने कहा, यह बहुत कम लोगों के वश में होता है कि वह विभिन्न विचारधाराओं वाली पार्टियों के साथ रहते हुए अपने मूल मकसद को न केवल सजीव बनाए रखे, अपितु उसे आगे भी बढ़ाता रहे। पासवान में ये खूबी थी और उन्होंने सामाजिक न्याय की लड़ाई को अंतिम समय तक जारी रखा।
चाहे वाजपेयी का शासनकाल रहा हो या मौजूदा समय में नरेंद्र मोदी का, वे सामाजिक न्याय से नहीं हटे। जब कभी इस्तीफा देने की बात सामने आई, तो वे तुरंत आगे आ गए। विधानसभा हो या लोकसभा, उन्होंने पद छोड़ने में देरी नहीं की। वे कई बार ऐसी स्थिति में रहे कि लोगों ने उन्हें किंग मेकर तक कह दिया। आजादी के बाद उन्होंने एक महत्वपूर्ण दलित नेता और सामाजिक आंदोलन के अग्रणी व्यक्तित्व के रूप में खुद को भारतीय राजनीति के शिखर नेतृत्व में स्थापित करने की जगह बना ली थी।