भाजपा झारखंड विधानसभा चुनाव में ऐसे समय में उतरी है जब उसने अनुच्छेद 370 के बाद दूसरे सबसे बड़े राष्ट्रवादी एजेंडे राम मंदिर निर्माण के रास्ते के सारे अवरोध हट गए हैं। जाहिर तौर पर झारखंड में सत्ता बरकरार रखने में नाकाम रहने पर दूसरे सहयोगी दल भी भाजपा पर दबाव बनाने से नहीं चूकेंगे। इसका प्रतिकूल असर भाजपा की अजेय छवि पर पड़ेगी।
बिहार में पार्टी की सहयोगी जदयू भाजपा पर दबाव बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी। जबकि इसके तत्काल बाद होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव में पंजाब में पार्टी की सहयोगी अकाली दल तेवर दिखाने से नहीं चूकेगी।
गौरतलब है कि हरियाणा में अपने इकलौते विधायक को भाजपा में शामिल करने से अकाली दल बेहद नाराज है। जबकि मनमाफिक सीटें नहीं मिलने से बिहार में पार्टी की सहयोगी झारखंड में अकेले चुनाव मैदान में उतर गई है।
रूठ-छूट रहे छोटे क्षेत्रीय दल
वर्ष 2014 में राज्यों के कुछ हिस्सों में प्रभाव रखने वाले छोटे-छोटे दलों को साध कर भाजपा ने बड़ी सफलता हासिल की थी। हालांकि अब यही दल या तो राजग से बाहर आ गए हैं या फिर रूठे हुए हैं। मसलन यूपी में पार्टी का एसबीएसपी से साथ छूटा तो झारखंड में आजसू का। बिहार के कुछ इलाकों में सीमित प्रभाव रखने वाली लोजपा रूठी हुई है तो लोकसभा चुनाव से पहले अपना दल का स्थानीय नेतृत्व से तीखा विवाद हुआ था।