बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राजनीति में काफी मंझे हैं। राजनीति की हर नजाकत समझते हैं और दिल्ली में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का निर्णय लेकर उन्होंने भाजपा पर नैतिक दबाव बढ़ा दिया है। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी की जद(यू) में बने रहने, मिलकर चुनाव लड़ने की घोषणा ने गेंद भाजपा के पाले में डाल दी है। यह नीतीश कुमार का राम विलास पासवान को विश्वास में लेकर भाजपा पर बनाया गया दबाव है। भाजपा ने रखी लॉज तो ठीक, वरना जद(यू) के पास एनडीए का हिस्सा बने रहकर, भाजपा की केन्द्र सरकार को बाहर से समर्थन देकर अकेले लोकसभा चुनाव में जाने का विकल्प खुला है।
हालांकि पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी सीटों के बंटवारे को लेकर कुछ नहीं बोलते। उनका कहना है कि भाजपा ने इसके बाबत अभी कोई प्रस्ताव नहीं दिया है। इसलिए पहले उस तरफ से प्रस्ताव आने दीजिए। त्यागी ने अपने वक्तव्य में बिहार के अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव में पार्टी के अपने दम पर चुनाव लड़ने का विकल्प भी खुला रखा है। लोकसभा चुनाव में दूसरे राज्यों में भी जद(यू) इस रणनीति को अपना सकती है।
इस विकल्प को खुला रखने का सीधा सा मतलब भाजपा पर राजनीतिक दबाव बनाने का ही है। नीतीश के दिल्ली में आकर इस घोषणा का एकमात्र मकसद है कि यदि भाजपा ने बिहार में उनके चेहरे की लॉज नहीं रखी तो वह लोकसभा चुनाव में अकेले दम पर चुनाव लड़ लेंगे। कुमार के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि अकेले चुनाव लड़कर नीतीश कुमार राज्य में एक दर्जन के करीब लोकसभा सीटों को ला सकते हैं।
क्या हो कि बनेगी बात
जद(यू) चाहती है कि उसे भाजपा बिहार में कम से कम 15-18 सीटें दे दे। बिहार के बाहर झारखंड, म.प्र., उ.प्र. में भी जद(यू) को साथ रखे। झारखंड में पहले भी दोनों दल साथ-साथ चुनाव लड़े हैं। उ.प्र. में 7-8 प्रतिशत कुर्मी वोटों का तर्क है। इसी तरह से म.प्र. में भी जद(यू) के प्रभाव का हवाला दिया जा रहा है। इस तरह से कुल मिलाकर 20-25 सीटों का प्रस्ताव यदि भाजपा की तरफ से आता है तो जद(यू) को साथ मिलकर चुनाव लड़ने में कोई आपत्ति नहीं है। पार्टी के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी का कहना है कि ऐसा होने पर वह खुद नीतीश कुमार को मना लेंगे। त्यागी का साफ कहना है कि इस बारे में जद(यू) ने अपना रुख साफ कर दिया है। वह एनडीए के साथ है। भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के पक्ष में है। आगे की जिम्मेदारी भाजपा की है।
क्या है तर्क
2009 में जद(यू)-भाजपा साथ लोकसभा चुनाव लड़े थे। जद(यू) 25 और भाजपा 15 सीट पर मैदान में उतरी थी। तब नीतीश कुमार का बिहार में जलवा था। 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर चुनाव हुआ। भाजपा 29 सीट पर लड़ी, लोजपा सात और रालोसपा चार सीट पर। भाजपा को 22 सीटों पर सफलता मिली। लोजपा छह और रालोसपा तीन सीट पर। जद(यू) अकेले चुनाव में उतरी और मोदी लहर के कारण केवल दो सीटें आईं। 2015 में विधानसभा चुनाव हुए। भाजपा लोजपा, रालोसपा के साथ चुनाव लड़ी। दोनों सहयोगी दल दो-दो सीट पा सके और भजपा भी केवल 53 सीट जीत सकी। जद(यू)-राजद-कांग्रेस का महागठबंधन सफल रहा।
नीतीश कुमार के जद(यू) को 71 सीटें मिली। इन तमाम जटिल तर्कों पर नीतीश कुमार के रणनीतिकारों का कहना है कि इससे सीट का बंटवारा हल नहीं होगा। सूत्रों का कहना है कि यह भाजपा, जद(यू),लोजपा, रालोसपा के बीच में आपसी समझ से इसका समाधान निकलेगा। यदि भाजपा ने इसका सम्मान किया तो ठीक, वरना जद(यू) एनडीए की सरकार को बाहर से समर्थन देगी, बिहार की सरकार चलती रहेगी और बिहार के लोकसभा चुनाव में अकेले उतरने के लिए मजबूर हो जाएगी।