जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ चलाए जा रहे ऑपरेशनों में भारतीय सेना की राष्ट्रीय राइफल्स 'आरआर' की संख्या में कुछ कटौती की जा सकती है। वहां 'राष्ट्रीय राइफल' की मारक क्षमता में 'सीआरपीएफ' को लाने के बारे में सोचा जा रहा है। पिछले कुछ समय से 'सीआरपीएफ' को सेना के ऑपरेशन पैटर्न पर आगे बढ़ाया जा रहा है। देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' को सीएसआरवी और जेसीबी जैसे बुलेट प्रूफ वाहन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। व्हील्ड आर्मर्ड एम्फीबियस (WHAP) भी सीआरपीएफ को मुहैया कराया गया है।
सूत्रों का कहना है कि ये एक लंबी प्रक्रिया है। एकाएक भारतीय सेना की 'राष्ट्रीय राइफल' को नहीं हटाया जाएगा। विभिन्न चरणों में यह प्रक्रिया पूरी होगी। संभव है कि शुरुआत में 'राष्ट्रीय राइफल' की एक बटालियन को चार कंपनियों तक सीमित किया जाए। हालांकि इस मामले में सीआरपीएफ के मूलभूत ढांचे और पॉलिसी में भी कुछ बदलाव संभावित हैं।
'एरिया ऑफ रिस्पांसिबिलिटी' पर चल रहा काम
जम्मू कश्मीर में 'राष्ट्रीय राइफल' के जवानों की संख्या को एक चरणबद्ध तरीके से कम किया जा सकता है। केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ', जो लंबे समय से आतंकियों और माओवादियों के खिलाफ जारी अभियानों में बढ़ चढ़कर भाग ले रहा है, उसे 'आरआर' जैसी भूमिका में आगे लाए जाने पर विचार हो रहा है। जम्मू-कश्मीर में तैनात सीआरपीएफ की बटालियनों को 'राष्ट्रीय राइफल्स' के पैटर्न पर 'एरिया ऑफ रिस्पांसिबिलिटी' (एओआर) यानी जिम्मेदारी का क्षेत्र तय करने के लिए कहा गया है।
इस तरह की एक्सरसाइज के लिए श्रीनगर से कुछ बटालियनों को 'आरआर' की तैनाती वाले स्थानों पर भेजने की बात कही जा रही है। इस बदलाव का मकसद, सीआरपीएफ की मूल जिम्मेदारी यानी 'आंतरिक सुरक्षा ग्रिड' को मजबूती प्रदान करना है। कई बार वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में इस विषय को लेकर बातचीत होती है। अगर 'राष्ट्रीय राइफल्स' की कंपनियों में कटौती होती है तो उस स्थिति में सीआरपीएफ की भूमिका बढ़ जाएगी। चीन से लगते बॉर्डर पर लगातार जारी तनाव के मद्देनजर 'आरआर' की कुछ यूनिटों को जम्मू कश्मीर से बाहर भेजा जा सकता है।
इंटेलिजेंस रिफॉर्म करने की जरुरत
सूत्रों के मुताबिक, 'राष्ट्रीय राइफल' की ऑपरेशनल एवं मारक क्षमता में सीआरपीएफ को लाने के लिए मुख्य तौर से बल के इंटेलिजेंस नेटवर्क में बड़े स्तर पर सुधार करने होंगे। यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि हर बटालियन में जवानों की संख्या पूरी रहे। जम्मू कश्मीर में आर्मी के पास खुद का प्रभावशाली इंटेलिजेंस नेटवर्क होने के अलावा पावर भी अधिक है। सेना, किसी भी आतंकी ऑपरेशन को अपने दम पर लीड कर सकती है। इंटरनेट या फोन की बातचीत पर नजर रखना, इसके लिए आर्मी के पास पर्याप्त उपकरण मौजूद हैं।
दूसरी तरफ सीआरपीएफ को हर मामले में एक आदेश लेने की जरुरत रहती है। साथ ही उसे कोई इनपुट मिलता है तो उसे जेकेपी के साथ साझा करना होता है। किसी मोबाइल की लोकेशन देखनी है या कोई टेपिंग का मामला है तो उसमें जेकेपी की मदद लेनी पड़ती है। सेना के 'सीओ' और सीआरपीएफ कमांडेंट को अलॉट होने वाले 'इंटेल' बजट में भी बहुत ज्यादा अंतर है। इस बल के पास अभी खुद का इंटेलिजेंस नेटवर्क तो है, लेकिन वह जम्मू कश्मीर पुलिस या आर्मी की तरह मजबूत नहीं है। यही वजह है कि सीआरपीएफ को ज्यादातर मौकों पर एक सहयोगी की भूमिका में रखने का प्रयास होता है। इन सबके बावजूद सीआरपीएफ ने आतंकी ऑपरेशनों में अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया है। इसके अनेक जांबाजों को वीरता के विभिन्न पदकों से नवाजा गया है।
सीआरपीएफ को अतिरिक्त बटालियन के सृजन की जरुरत
मौजूदा समय में जेएंडके में सीआरपीएफ की लगभग 70-80 बटालियन तैनात हैं। इन्हें कई तरह की जिम्मेदारी प्रदान की गई है। कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा में ही करीब 40 कंपनी तैनात हैं। राजौरी क्षेत्र में ही कई बटालियन ड्यूटी पर हैं। सीआरपीएफ को आंतरिक सुरक्षा ग्रिड को मजबूती प्रदान करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इस बल ने आतंकियों एवं नक्सलियों के खिलाफ अभियान, कानून व्यवस्था, उत्तर पूर्व के उग्रवाद प्रभावित कई हिस्सों में सफल टास्क और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के अंतर्गत भारत की आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए सीआरपीएफ को ही नामित किया गया है। विशेषज्ञों का कहना है, जेएंडके में अगर सीआरपीएफ को 'आरआर' के स्थान पर लाया जाता है तो वहां बल को अतिरिक्त बटालियन के सृजन की जरुरत पड़ेगी। इस संबंध में त्वरित निर्णय लिया जाना चाहिए। सीआरपीएफ को अन्य ड्यूटी की बजाए पूरी तरह से आंतरिक सुरक्षा की तरफ शिफ्ट करना होगा। अपनी नई जिम्मेदारी के निर्वहन के लिए सीआरपीएफ को कम से कम आठ नई बटालियन खड़ी करनी होंगी।
आतंकियों से निपटने के लिए बल को मजबूती
सीआरपीएफ को बुलेट प्रूफ वाहन मुहैया कराए गए हैं। किसी मुठभेड़ के दौरान कोई आतंकी घर में छिपा है तो उसे नए वाहनों की मदद से निपटाने में बड़ी मदद मिलती है। बुलेट-प्रूफ जेसीबी ने यह काम और भी ज्यादा आसान कर दिया है। सीएसआरवी और जेसीबी में एक 'फोर्कलिफ्ट' पर बुलेट-प्रूफ केबिन लगा होता है। इसकी मदद से सुरक्षाकर्मी, आतंकियों के खिलाफ एक ऊंचाई वाले प्लेटफार्म से ऑपरेशन को अंजाम दे सकते हैं। सीआरपीएफ ने अपने ड्रोन सिस्टम के जरिए भी आतंकवाद रोधी अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। व्हील्ड आर्मर्ड एम्फीबियस में मॉड्यूलर बैलिस्टिक शील्ड और ऑटोमैटिक ग्रेनेड लॉन्चर भी है। इसका वजन लगभग 24 टन है। इसकी लंबाई आठ मीटर और चौड़ाई तीन मीटर है। यह 10 जवानों और एक ड्राइवर को ले जाने में सक्षम है। व्हील्ड आर्मर्ड एम्फीबियस, यह वाहन पूरी तरह से बुलेटप्रूफ और बारूदी सुरंग से सुरक्षित है। इसमें एक स्वचालित टायर-इन्फ्लेशन प्रणाली और एमएमजी (मध्यम मशीनगन) को फायर करने के लिए एक रिमोट-कंट्रोल हथियार प्रणाली (आरसीडब्ल्यूएस) लगा है। इस वाहन के अंदर बैठकर आतंकियों पर सटीक फायर किया जा सकता है।