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जम्मू कश्मीर: महबूबा मुफ्ती को दिख रहा अपना दबदबा कम होने का खतरा, बात- बात में केंद्र के विरोध के क्या हैं मायने

Sat, 21 Aug 2021 07:23 PM IST
प्रतिभा ज्योति प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती केंद्र सरकार पर हमले का एक भी मौका नहीं चूकना चाहती हैं। बात भले ही अफगानिस्तान के तालिबान की हो वह तब भी केंद्र सरकार को घेरे में ले आती हैं। उनका ताजा विवादस्पद बयान भी इसी की एक कड़ी है। उनकी नाराजगी की एक और वजह यह है कि बुधवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने उनकी मां गुलशन नजीर से मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में श्रीनगर में पूछताछ की थी।
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महबूबा मुफ्ती - फोटो : PTI
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विस्तार
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जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने तालिबान के बहाने केंद्र सरकार पर फिर निशाना साधा है। महबूबा ने कहा कि तालिबान ने अमेरिका को भागने पर मजबूर किया, इसी तरह हमारे सब्र की परीक्षा मत लो। उन्होंने कहा कि जिस दिन सब्र टूटेगा, आप भी नहीं रहोगे। उन्होंने केंद्र सरकार से जम्मू कश्मीर के लोगों से बातचीत शुरू करने और जम्मू कश्मीर के विशेष राज्य का दर्जा दोबारा दिया जाने का मांग की है।
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दरअसल बात-बात में केंद्र सरकार को धमकाने और लेकर भड़काऊ बयान देने के पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि महबूबा मुफ्ती को सबसे ज्यादा खतरा भारतीय जनता पार्टी से नजर आ रहा है। वे जानती हैं कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में उन्हें भाजपा से ही तगड़ी चुनौती मिलने वाली है और भाजपा से उनकी सीधी टक्कर होने वाली है। जानकारों का कहना है कि इसी वजह से महबूबा के लिए इस बार चुनाव की नैया पार करना एक टेढ़ी खीर साबित होने वाली है। इसलिए केंद्र सरकार के रूख के खिलाफ वे बार-बार जम्मू-कश्मीर के विशेष राज्य का दर्जा दोबारा बहाल करने की बात करती हैं ताकि कश्मीरियों को यह भरोसा दिलाया जा सके कि असल में वे हीं उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ रही हैं। 

अब तक के चुनावों में ऐसा देखा गया था कि घाटी में बेहतरीन प्रदर्शन कर के भी जम्मू-कश्मीर में सरकार बन जाती थी, अकेले जम्मू का योगदान कम रहता था। लेकिन इस बार परिसीमन के बाद सात सीटें जम्मू के साथ जुड़ने की संभावना है जिससे राज्य का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल जाएगा, क्योंकि जम्मू में भाजपा खुद को मजबूत कर रही है।
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पिछले साल जिला विकास परिषद के चुनाव में भाजपा ने जम्मू इलाके की छह परिषदों पर कब्जा जमाया था, जबकि सात पार्टियों वाली पीएजीडी ने नौ परिषदों पर जीत हासिल की। यानी भाजपा ने अकेले अपने दम पर छह सीटें जीत लीं जिससे सबसे ज्यादा चिंता महबूबा मुफ्ती और फारुक अबदुल्ला जैसे नेताओं को होने लगी, क्योंकि इससे उन्हें अपना दबदबा खत्म होने का डर सता रहा है। इसलिए महबूबा ने शुरू में परिसीमन का विरोध भी किया था। 

सियासत गहरे संकट में पड़ने का डर

महबूबा कहती रही हैं कि वे कश्मीर मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान के लिए अपना संघर्ष जारी रखेंगी लेकिन जानकारों का कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्री का डर और संघर्ष इस बात को लेकर है कि नए सिरे से परिसीमन होने से उनकी सियासत गहरे संकट में पड़ सकती है और उनके लिए अपना वजूद बचाए रखना मुश्किल हो सकता है।

61 वर्षीय महबूबा मुफ्ती, 5 अगस्त, 2019 से पहले जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री थीं, जब केंद्र ने विशेष दर्जा समाप्त कर दिया और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बदल दिया। जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा छीन जाने के बाद भाजपा की पूर्व सहयोगी रहीं पीडीपी की अध्यक्ष को नजरबंद रखा गया। वे अक्टूबर 2020 में मुक्त हुईं।

गुपकार गठबंधन की भावना और उद्देश्य जमीनी कार्यकर्ताओं तक पहुंचने में मुश्किल

सात क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर पीपुल्स अलायंस फॉर गुप्कर डिक्लेरेशन (पीएजीडी) का गठन कर भाजपा के खिलाफ एक बड़ा मोर्चा तैयार हो चुका है। गुपकार गठबंधन मिलकर जिला विकास परिषद का चुनाव भी लड़ चुका है, लेकिन अभी तक इस बात पर सहमति नहीं बन पाई है कि पीएजीडी विधानसभा चुनाव अलग-अलग लड़ेगी या एक साथ। महबूबा का कहना है कि ऐसा करना एक सामूहिक निर्णय होगा और अभी समूह किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाया है, क्योंकि परंपरागत रूप से सभी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे हैं।

इस गठबंधन के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी आ रही है कि गठबंधन की भावना और व्यापक उद्देश्य अभी जमीनी कार्यकर्ताओं तक नहीं पहुंच पाया है। पीएजीडी को सज्जाद लोन के जाने से भी नुकसान हुआ है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव संगठन बीएल संतोष के बयान ने भी गुपकार गठबंधन में खलबली मचा दी है। बी एल संतोष ने पिछले महीने कहा था कि केंद्र सरकार के शानदार कार्यों व कश्मीर में तीव्र विकास और खुशहाली का मार्ग प्रशस्त होने से इस बार विधानसभा चुनाव में भाजपा को ज्यादा सीटें मिलेंगी।

इसलिए माना जा रहा है कि विधानसभा चुनाव के लिए पर्याप्त तैयारी करने के लिए ही गुपकार गठबंधन जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल होने के बाद ही विधानसभा चुनाव कराने की बात कर रहा है। जबकि गुपकार गठबंधन के सभी नेता अच्छी तरह जानते हैं कि यह फैसला अब बदलने वाला नहीं है। खासतौर पर महबूबा के इस मुद्दे को बार-बार उठाने के पीछे की एक मात्र बड़ी वजह अपने अस्तित्व को बचाने की एक कवायद के तौर पर देखा जाने लगा है।    
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