कश्मीर में धारा 370 हटाने के बाद पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की धार कुंद हो गई है। पाकिस्तान के चहेते घाटी के जो अलगाववादी सीमापार से मिलने वाले आदेशों के बाद यहां माहौल बिगड़ते थे, अब वह अपने रास्ते बदलने लगे हैं। इसी कड़ी में पाकिस्तान के करीबी रहे घाटी के एक बड़े अलगाववादी अब कश्मीर में अलगाववाद का राग अलापना छोड़ने वाले हैं। सूत्रों के मुताबिक जल्द ही उत्तरी कश्मीर के एक बड़े अलगाववादी और हुर्रियत से नाता रखने वाले अलगाववादी कश्मीर में होने वाले चुनावों से पहले राजनीतिक जमीन पर आकर चुनाव में दो-दो हाथ करने की तैयारी कर रहे हैं।
नजर आगामी विधानसभा चुनावों पर
कश्मीर में जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं ठीक उसी तरीके से कश्मीर की राजनीति का मिजाज भी बदलने लगा है। कश्मीर में धारा 370 हटने के बाद जिस तरीके से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की कमर टूटनी शुरू हुई, उससे बड़े-बड़े अलगाववादियों ने अपने न सिर्फ ठिकाने बदलने शुरू किए बल्कि प्रायोजित प्रोपेगेंडा से दूर हटकर नई पारियों को अंजाम देना शुरू कर दिया। सूत्रों के मुताबिक इस कड़ी में नॉर्थ कश्मीर से ताल्लुक रखने वाले एक बड़े अलगाववादी ने भी अपना नया ठिकाना तलाशना शुरू कर दिया। खुफिया और रक्षा मामलों से जुड़े सूत्रों का कहना है कि प्रमुख अलगाववादी नेता के परिवार से ताल्लुक रखने वाले अलगाववादी ने आने वाले विधानसभा के चुनावों में राजनीतिक जमीन तलाश कर चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी है।
सूत्रों का कहना है कि कश्मीर में धारा 370 हटने के साथ ही उक्त अलगाववादी ने कश्मीर में अपने अलगाववाद के सुर को खत्म करने का प्लान बनाया है। इसको लेकर के अलगाववादी नेता ने अपने वर्तमान संगठन के कई बड़े ओहदेदारों से न सिर्फ बात की है, बल्कि उनको भरोसे में लेकर आगे का प्लान बनाना शुरू कर दिया है। जानकारों का कहना है कि उक्त अलगाववादी की पैरोकारी करने वालों ने भी अपने रास्ते बदलने की पूरी योजना बना ली है।
भाजपा के प्रति नरम रुख
कश्मीर की तमाम राजनीतिक गतिविधियों पर नजर रखने वाले खुफिया सूत्रों का कहना है कि जिस अलगाववादी ने राजनीति में आने के लिए अपना कदम आगे बढ़ाया है, कभी उसके परिवार के मुखिया घाटी में अलगाववाद की राह पर सबसे आगे थे। हालांकि हुर्रियत से ताल्लुक रखने वाले इस परिवार के एक सदस्य ने तो पहले ही राजनीति की ओर अपना कदम बढ़ा दिया था। अब उसी परिवार के दूसरे सदस्य ने अलगाववाद का रास्ता छोड़कर राजनीति की ओर जाने की योजना बनाई है। सूत्रों का कहना है कि इस अलगाववादी परिवार का एक सदस्य भाजपा के प्रति पहले से ही बहुत नरम रुख रखता है। वह कहते हैं कि अब जो अलगाववाद का रास्ता छोड़कर राजनीतिक पारी का आगाज करने वाले हैं फिलहाल उनकी पार्टी कौन सी होगी और वह किससे चुनावी मैदान में उतरेंगे, इसका अभी खुलासा नहीं हुआ है। लेकिन यह तय माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में घाटी में होने वाले विधानसभा के चुनावों में कश्मीर घाटी का यह अलगाववादी नेता चुनावी मैदान में उतरेगा।
रक्षा मामलों के जानकार लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) एसएन सूद कहते हैं कि जिस अलगाववादी के राजनीति में आने चर्चा हो रही है दरअसल वह कभी पाकिस्तान का बहुत करीबी हुआ करता था। इसी अलगाववादी नेता को पाकिस्तान के उच्चायुक्त ने दिल्ली में आयोजित एक बड़े सरकारी कार्यक्रम में आमंत्रित भी किया था। इसके अलावा वह अकसर दिल्ली में पाकिस्तान के उच्चायुक्त का मेहमान भी हुआ करता था। सूद कहते हैं कि पाकिस्तान हमेशा से घाटी में अलगाववादियों को शह और दिशा निर्देश देकर घाटी के हालात बिगाड़ने के लिए आगे करता रहता था। लेकिन धारा-370 खत्म होने के बाद से घाटी में हालात पूरी तरीके से बदलने लगे। वह कहते हैं कि इस बदलाव से सीमा पार से होने वाले पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की पूरी तरीके से कमर टूट गई। जो अलगाववादी स्थानीय युवाओं को पाकिस्तान के टुकड़ों पर पालकर देश का माहौल बिगड़ते थे अब उनके पास कोई भी रास्ता नहीं बचा है। वहीं कई और अलगाववादी भी बदले हालात में अपनी दशा और दिशा बदलने की सोच रहे हैं।
घाटी में टूट रही अलगाववाद की कमर
कश्मीर मामलों पर नजर रखने वाले प्रोफेसर एसएन मलिक बताते हैं कि घाटी में अलगाववाद की पूरी तरीके से कमर टूट रही है। वह कहते हैं कि ऐसे में किसी भी अलगाववादी के पास अब कोई भी रास्ता नहीं बचा है कि वह पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को घाटी में आगे बढ़ा सकें। प्रोफ़ेसर मलिक कहते हैं कि अगर बीते उदाहरण ही देख लिए जाएं, तो स्पष्ट हो जाता है कि सैयद अली शाह गिलानी ही कश्मीर में पाकिस्तान के इशारे पर आतंकवाद को बढ़ावा देते थे। उनकी मौत के बाद कश्मीर में पाकिस्तान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाला कोई भी आदमी नहीं बचा। गिलानी की मौत के बाद चर्चा थी कि उनके दामाद अल्ताफ फंटूश उनकी गद्दी संभाल लेंगे, लेकिन वह जेल में है। कभी गिलानी का दाहिना हाथ रहा और सबसे भरोसेमंद आतंकी मसर्रत आलम का भी नाम गिलानी के उत्तराधिकारी के तौर पर सामने आया, लेकिन उसके भी जेल में बंद होने से हुर्रियत की गद्दी संभालने वाला दूसरा नाम भी खत्म हो गया। बीते कुछ सालों से घाटी में यही चर्चा थी कि गिलानी के बाद उनका उत्तराधिकारी अशरफ सहराई होगा। लेकिन इसी साल मई में अशरफ सहराई की जेल में बीमार होने के बाद मौत हो गई। जबकि मीरवाइज और यासीन मलिक समेत एक या दो अलगाववादी बचे भी हैं, तो आज के बदले हालातों के चलते उनके अंदर दमखम ही नहीं बचा है। यही वजह है कि आने वाले दिनों में और भी कई अलगाववादी अपना पुराना रास्ता छोड़कर नए रास्ते पर बढ़ेंगे।