गुजरात के कांडला बंदरगाह के पास दीनदयाल बंदरगाह प्राधिकरण द्वारा अवैध बस्तियों को ध्वस्त करने की यूरोपीय यूनियन इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट वर्कर्स फेडरेशन (आईटीएफ) ने निंदा की। फेडरेशन ने कहा कि इस कार्रवाई से हजारों बंदरगाह कर्मी और मछुआरे बेघर हो गए। आईटीएफ ने पीएम नरेंद्र मोदी, राज्य सरकार और दीनदयाल बंदरगाह प्राधिकरण को पत्र लिखकर निराश्रित हुए श्रमिकों की मदद का आह्वान किया है।
दरअसल, पांच सितंबर को दीनदयाल बंदरगाह प्राधिकरण (डीएपी) ने बन्ना बस्ती और कांडला बंदरगाह के पास 250 एकड़ से ज्यादा जमीन से अतिक्रमण हटाते हुए 600 से अधिक झोपड़ियां ध्वस्त कर दी थीं। डीपीए का कहना था कि बंदरगाह के पास बसी ये बस्तियां जेटी और अमोनिया रसायनों की पाइपलाइन और टैंक के बीच में थीं। शिकायत थी कि कुछ लोग चोरी के इरादे से पाइपलाइनों में छेद कर देते हैं। इससे गैस लीक होती हैं और भोपाल जैसी गैस त्रासदी हो सकती है। सुरक्षा को देखते हुए यह कार्रवाई की गई।
इस कार्रवाई को लेकर आईटीएफ के महासचिव स्टीफन कॉटन ने कहा कि डीपीए ने सुरक्षा चिंताओं के फर्जी दावों को उचित मानते हुए हजारों लोगों को बेघर कर दिया। हम विस्थापित निवासियों की भलाई के बारे में चिंतित हैं। ये बंदरगाह श्रमिक एक ऐसी भूमिका निभाते हैं जो तेजी से बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है। उनकी गरिमा और मौलिक मानवाधिकारों की रक्षा करना दीनदयाल बंदरगाह प्राधिकरण और भारत सरकार का कर्तव्य है।
आईटीएफ ने कहा कि कच्छ जनरल मजदूर संघ (एसकेजीएमएस) कांडला बंदरगाह के पास जमीन की स्थिति की बारीकी से निगरानी कर रहा है। हमें बंदरगाह क्षेत्र में श्रमिकों के बीच डर के बारे में बताया गया है कि इसी तरह की अन्य बस्तियों को भी ध्वस्त करने की योजना है।
आईटीएफ ने कहा कि कांडला में देखी गई बेदखली की संदिग्ध वैधता और मानवाधिकारों के हनन और उनसे उत्पन्न होने वाले सामाजिक संकटों को देखते हुए हम आग्रह करते हैं कि ऐसी किसी भी योजना को क्रियान्वित करने से बचें। आईटीएफ ने भारत सरकार से विस्थापित श्रमिकों के लिए मुआवजा और पुनर्वास प्रदान करने की मांग की है। आईटीएफ ने कहा कि डीपीए और स्थानीय सरकार श्रमिक बस्तियों को और अधिक ध्वस्त करने की सभी योजनाओं को रोके और इसके बजाय श्रमिकों के पुनर्वास के लिए योजना बनाए।
आईटीएफ के अध्यक्ष पैडी क्रूमलिन ने कहा कि यह कांडला के नाव चालकों और मछुआरों के अधिकारों पर हमला है। जिनका जीवन अधिकारियों की क्रूरता के कारण बर्बाद हो गया है। यह कल्पना करना कठिन है कि अपने ही घर को टूटते हुए देखना कितना दर्दनाक है। आईटीएफ और दुनिया भर में हमारे भाई-बहन तब तक आराम नहीं करेंगे जब तक इन श्रमिकों को न्याय नहीं मिल जाता।