जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर मुद्दे को इटली ने स्कूली बच्चों के पाठ्यक्रम में अनिवार्य रूप से शामिल कर लिया है और ऐसा करने वाला वह दुनिया का पहला देश बन गया है। वहां के शिक्षा मंत्री लॉरेंजो फिओरामोंटी ने बताया कि अगले साल सितंबर से शुरू होने वाले सत्र में देश के सभी स्कूल जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर सप्ताह में कम से कम एक घंटा जरूर देंगे। स्थिरता और जलवायु को अपने शिक्षा मॉडल का केंद्र बनाने के लिए मंत्रालय को भी बदला जा रहा है। इसके अलावा बाकी विषयों भूगोल, गणित और भौतिकी की पढ़ाई को पहले की तरह जारी रखा जाएगा।
भारत में जलवायु परिवर्तन को लेकर स्कूलों में अलग से कोई विषय नहीं है, इसे केवल एकीकृत शैली में पढ़ाया जाता है। माना जाता है विज्ञान, भूगोल जैसे विषयों के साथ ही जलवायु विषय समाहित है। इस बारे में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के निदेशक ऋषिकेश सेनापति ने बताया कि साल 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा को लेकर आदेश दिया था, जिसमें स्कूलों में पर्यावरण को अनिवार्य रूप से पढ़ाने की बात कही गई थी। साथ ही बताया कि सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में इस दिशा में काम शुरू हो चुका है।
वन और पर्यावरण मंत्रालय देशभर में प्राइमरी स्कूल के बच्चों के लिए अगले सत्र से 'स्कूल नर्सरी' प्रोग्राम शुरू करने जा रहा है। जिसमें बच्चों को स्कूल नर्सरी से जोड़ा जाएगा, जिसमें बच्चे खुद ही पौधे रोपेंगे और उनमी देखभाल भी करेंगे। साल के अंत में परीक्षा पास करने पर बच्चों को एक ट्रॉफी के साथ उनका उगाया पौधा भी दिया जाएगा।
इसके अलावा भारत के नेशनल एनवॉयरन्मेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी) ने दुनिया का पहला वेब रिपॉजिटरी (कोष) शुरू किया है। इसमें इंडियन एयर क्वालिटी इंटरैक्टिव रिपॉजिटरी ने 1950-1999 के दौर के करीब 700 स्कैन किए हुए दस्तावेज, 1215 शोध लेख, 170 मामलों के अध्धयन, 100 अन्य मामले और 2000 से ज्यादा स्टैच्यू को संजोया है। ताकि देश में वायु प्रदूषण संबंधी अनुसंधान और इससे संबंधित कानूनों के इतिहास की जानकारी मुहैया कराई जा सके। यह वायु प्रदूषण को लेकर बनाया गया दुनिया का पहला कोष है।