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Global Ties: देखना है ट्रंप बनाम पुतिन को कैसे साधेगा भारत? राष्ट्रपति बनने के बाद रूस पर अमेरिका की पैनी नजर

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पुतिन, ट्रंप - फोटो : अमर उजाला
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अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से कच्चे तेल और रक्षा सौदों की निर्भरता को घटाए। भारत हमेशा से भू-राजनीतिक स्थिति में संतुलन का पक्षधर रहा है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने पहले ही कह चुके हैं कि हमें जहां से कच्चा  तेल मिलेगा, लेंगे। जबकि भारत पेट्रोलियम के वरिष्ठ सूत्र का कहना है कि रूस से तेल लाने के लिए कार्गो नहीं मिल पा रहे हैं। ऐसे में देखना है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बनाम राष्ट्रपति पुतिन को कैसे साधता है भारत?

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अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने वादा किया था कि राष्ट्रपति बनने के बाद वह रूस यूक्रेन युद्ध बंद करा देंगे। इस्राइल-हमास का युद्ध भी बंद हो जाएगा। रूस के राष्ट्रपति पुतिन लगातार यूक्रेन के साथ शांति पर राष्ट्रपति ट्रंप से वार्ता का संदेश दे रहे हैं। पुतिन प्रशासन इस टकराव को बाइडेन प्रशासन का फेल्योर मानता है। पुतिन यहां तक कहते हैं कि यदि ट्रंप राष्ट्रपति होते तो यूक्रेन-रूस में युद्ध की नौबत ही नहीं आती। शपथ लेने के साथ ट्रंप ने इस्राइल और मिस्र को छोड़कर अन्य सभी देशों के आर्थिक सहायता पर रोक लगा दी है। ऐसे में सभी निगाह रूस-यूक्रेन पर टिकी है। माना जा रहा है कि राष्ट्रपति ट्रंप रूस से इस विषय पर वार्ता की पहल से पहले चीन को संदेश देना चाहते हैं और अमेरिकी हितों को सुरक्षित रखने के बहाने  रूस की आर्थिक चुनौती बढ़ा देना चाहते हैं। इसमें उन्हें भारत भी अपने शतरंज की बिसात का एक मोहरा दिखाई दे रहा है।  

अमेरिकी प्रतिबंध से कितनी बिगड़ी रूस की सेहत?
भारत का अक्तूबर-दिसंबर 2024 की तिमाही में रूस से तेल का आयात 17 लाख बैरल प्रतिदिन के आंकड़े को पार कर गया था। यह आंकड़ा भारत के कुल तेल आयात का 41 फीसदी के करीब है। 2022 में रूस से तेल आयात की तुलना में यह 157 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि है। भारत और चीन के रूस से बढ़े तेल आयात ने यूक्रेन से  युद्ध के दौरान उसकी अर्थव्यवस्था और राष्ट्रपति पुतिन को बड़ा आक्सीजन दे दिया था। इसे लेकर अमेरिका, यूरोप के थिंक टैंक और सरकारी एजेंसियां भारत को आड़े हाथों ले रही थी और विदेश मंत्री जयशंकर भारत के हित की बात कहकर फ्री स्टाइल जवाब दे रहे थे। वैश्विक अर्थ व्यवस्था पर नजर रखने वाले बताते हैं कि कच्चे तेल के निर्यात और रक्षा उद्योग ने मास्को को अमेरिका के कड़े आर्थिक प्रतिबंधों से बेअसर रखा। रूस की आर्थिक वृद्धि दर 3.6 प्रतिशत की दर से रही और बेरोजगारी दर भी 2020 में 5.8 से घटकर 2024 में 2.6 पर आ गई थी। यानी रूस की अर्थ व्यवस्था पर कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा। बल्कि उल्टा हो गया। अमेरिका को इसकी चिंता ने इतना सताया कि जाते-जाते जो बाइडेन प्रशासन ने रूस से कच्चे तेल के आयात पर प्रतिबंध को और कड़ा कर दिया। 10 जनवरी 2025 से रूस की दो तेल उत्पादक कंपनियां और 183 तेल वाहक जहाज अमेरिकी प्रतिबंध के दायरे में आ गए हैं।
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अमेरिका क्यों बना रहा है भारत पर कच्चा तेल लेने का दबाव
भारत के कच्चे तेल के आयात के पांच मुख्य स्रेत हैं। इसमें इराक, सऊदी अरब, रूस,संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका है। अमेरिका से कच्चे तेल का आयात मंहगा भी है और इस समय भारत सबसे कम तेल का आयात भी वहीं से करता है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के पहले भारत का रूस से तेल का आयात सबसे कम था, लेकिन 2024 में  शीर्ष पर आ गया था। भारत ने बिना अमेरिका की नाराजगी की परवाह किए इसे जारी रखा। वाणिज्य मंत्रालय के एक प्रमुख अधिकारी का कहना है कि अमेरिका को यह शुरू से नागवार लग रहा था। अमेरिका रूस की आर्थिक लाइन को कमजोर करना चाहता है। कच्चा तेल ही नहीं वह चाहता है कि भारत रूस पर रक्षा निर्भरता को भी कम करे। ऐसा दबाव वह चीन पर नहीं बना सकता। चीन अमेरिका के दबाव की परवाह नहीं करता। सूत्र का कहना है कि यूक्रेन युद्ध के बाद से रूस के बाजार चीन के इलेक्ट्रानिक सामान(टीवी, कंप्यूटर, गजेट, मोबाइल) से भरे पड़े हैं। पेइकिंग लगातार रूस से बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात कर रहा है, लेकिन भारत अमेरिका के लिए सॉफ्ट कार्नर नजर आता है। इसलिए उसके दबाव से इनकार नहीं किया जा सकता।

....तो क्या ऑयल डिप्लोमेसी में आएगा बड़ा बदलाव?
रक्षा क्षेत्र के साथ-साथ ऑयल डिप्लोमेसी भारत के लिए बड़ी चुनौती है। अमेरिका जैसे देश के सामने भारत की अर्थव्यवस्था बहुत छोटी है। अमेरिका  की अर्थ व्यवस्था 28.78 खरब डालर के आंकड़े को पार कर रही है। भारत 3.9 खरब डालर से 4 तक पहुंचने के लिए कसरत कर रही है। अमेरिका में प्रति व्यक्ति आय 85.37 हजार डॉलर जबकि भारत में 13.14 हजार डालर के  करीब है। अमेरिका के शेयर बाजार से दुनिया के बाजार प्रभावित हो रहे हैं और वाशिंगटन दुनिया की अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण की क्षमता रखता है। इसलिए भारतीय अर्थशास्त्री दो बिन्दुओं पर गंभीर हैं। पहला तो यह कि अमेरिका में जो बाइडेन के समय के उदारवाद का अंत हो चुका है। राष्ट्रपति ट्रंप अवैध प्रवासियों को बाहर करने, डब्ल्यूएचओ और जलवायु परिवर्तन के पेरिस समझौते से हाथ खींचने तथा अमेरिका और अमेरिकियों के लिए अवसर का संरक्षण वाद चलाकर सख्त संदेश दे रहे हैं। ऐसे दौर में भारत अमेरिका को अधिक नाराज नहीं रख सकता। ऐसे में माना जा रहा है कि भारत अमेरिका से कच्चे तेल का आयात बढ़ा सकता है। रूस से यह आयात घट सकता है। अमेरिका से रक्षा क्षेत्र में प्रेडेटर ड्रोन सौदे के अलावा अन्य बड़े सौदे हो सकते हैं। अमेरिका की कोशिश भारतीय सैन्य बलों में अपने लड़ाकू विमान और मिसाइल प्रतिरक्षी प्रणाली, निगरानी के उपकरण समेत अन्य शामिल करने की है। इसके अलावा वह अमेरिका के लिए भारत के बड़े उपभोक्ता वर्ग को भी देख रहा है। देखना है इसको लेकर भारत का रुख क्या रहता है।

दो घोड़ों की सवारी, अमेरिका और रूस से यारी
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर तक रूस भारत का विश्वसनीय सामरिक साझीदार देश रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहा राव और अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में भारत ने दो नए दरवाजे को मजबूती के साथ खोले। इस्राइल से रिश्ते बढ़ाने की शुरुआत हुई और अमेरिका के साथ रूटनीतिक पहल के नए आयाम गढ़े गए। इसी दौर में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे के दौरान रिश्तों में तेजी आई। एडमिरल गोर्सकोव, ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल प्रणाली के संयुक्त विकास जैसी पहल ने विश्वास बढ़ाया। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समय में अमेरिका और रूस के साथ रक्षा सौदे आगे बढ़े। यूरोपीय देशों को भी भारत ने साधे रखा। अमेरिका के साथ परमाणु करार तो रूस के साथ कोंडनकुलम में परमाणु संयंत्र स्थापना की सहमति और आगे बढ़ने के निर्णय ने सबकुछ साधे रखा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इसे और आगे बढ़ाया। भारत ने रूस और इस्राइल का संकट के समय साथ दिया है। इसके लिए अमेरिका को मिर्ची लगने की बहुत परवाह नहीं की, लेकिन अमेरिका को भी साधे रखा। यूरोप और खासकर फ्रांस से रक्षा सौदे किए। कूटनीति के जानकार कहते हैं कि एक बार फिर भारत के कूटनीति की परीक्षा है। देखना है कि अमेरिका और रूस के संतुलन को हमारे रणनीतिकार साधते हैं।

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