हाईकोर्ट ने कहा कि पेंशन का भुगतान न करना एक निरंतर जारी रहने वाली गलती है, इसलिए पेंशन का दावा विलंब के आधार पर ठुकराना अनुचित है। कोर्ट ने 1980 में मृत शिक्षक के परिजनों को भुगतान करने के लिए दाखिल याचिका एकल न्यायपीठ द्वारा अत्याधिक विलंब के आधार पर खारिज करने के निर्णय को अनुचित माना है।
खंडपीठ ने एकल न्यायपीठ के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि पेंशन का भुगतान न करना एक निरंतर जारी रहने वाली गलती है। सुप्रीमकोर्ट द्वारा यह कहा जा चुका है कि ऐसे मामलों में विलंब या समय सीमा के सिद्धांत लागू नहीं होंगे। खंडपीठ ने याची का दावा नए सिरे से तय करने के केस को वापस एकलपीठ के समक्ष भेज दिया है। अपीलार्थी रवींद्र नाथ शुक्ला की विशेष अपील पर मुख्य न्यायमूर्ति डॉ. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की पीठ ने यह आदेश दिया।
अपीलार्थी के पिता कानपुर नगर निगम की ओर से संचालित इंटर कालेज में सहायक अध्यापक थे। 1980 में उनकी मृत्यु हो गई। मृतक की पत्नी ने पारिवारिक पेंशन के लिए दावा पेश किया। मामला उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के लिए लंबे समय तक लटका रहा। मई 2015 में मृतक की पत्नी का भी देहांत हो गया। उसके पुत्र ने अपनी माता की पेंशन भुगतान के लिए दावा किया, जिसे खारिज कर दिया। एकल न्यायपीठ ने भी याचिका अत्याधिक विलंब के आधार पर खारिज कर दी थी। इसे विशेष अपील में चुनौती दी गई। खंडपीठ ने कहा कि जहां तीसरे पक्ष का कोई हित सृजित नहीं हो रहा और किसी अन्य को नुकसान नहीं है वहां विलंब के आधार पर दावा ठुकराना सही नहीं है।