करीब चार साल पहले एक मासूम बच्चा आगे से पूरी तरह झुका हुआ था। उम्र यही कोई एक साल 9 माह के आसपास थी। रीढ़ की हड्डी में टीबी थी और 110 डिग्री तक विकृति देखी गई। बच्चा दर्द से पीड़ित था ही साथ ही खड़ा भी नहीं हो पाता था। उस वक्त इतनी कम आयु के मरीज का ऑपरेशन किया गया।
समय रहते उपचार मिलने पर टीबी के दंश से मरीजों को मिली है आजादी
अभी कुछ ही दिन पहले बच्चे के परिजनों ने उसका चौथा जन्मदिन मनाया था। यह कहना है वसंतकुंज स्थित इंडियन स्पाइनल इंजरी सेंटर के डॉ. गुरुराज संगडुमथ का। टीबी संक्रमण को लेकर डॉ. गुरुराज का कहना है कि इस बीमारी को हराना इतना भी मुश्किल नहीं है जितना लोग समझते हैं। सही जानकारी और हिम्मत इसके लिए सबसे जरूरी है। अगर उस मासूम के परिवार ने उस वक्त हिम्मत और सही जानकारी पर भरोसा नहीं किया होता तो शायद जीवन दिक्कतों से भरा होता।
दिल्ली एम्स से लेकर प्राइवेट अस्पतालों तक में ऐसे कई मामले
टीबी का दंश मिटाने के लिए ऐसे कई मामले अब तक राजधानी के सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में देखने को मिल चुके हैं। टीबी एक संक्रामक रोग है जोकि हर साल लाखों लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है। दिल्ली की बात करें तो पिछले वर्ष 2020 में 86761 संक्रमित मरीजों का पता चला था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने साल 2025 तक टीबी मुक्त भारत का लक्ष्य निर्धारित किया है जिसके बाद से टीबी रोग को लेकर सरकारी अभियान में तेजी भी आई है। अस्पतालों पर इसका क्या असर हुआ? इसके बारे में देश के सबसे बड़े चिकित्सीय संस्थान दिल्ली एम्स के डॉ. करन मदान ने बताया कि टीबी रोग का उपचार और जांच सबकुछ आसानी से संभव है।
अब तक स्वस्थ्य हुए लोग औरों के लिए बन सकते हैं प्रेरणा
एक वक्त था जब इस बीमारी को लेकर तमाम तरह की चर्चाएं रहती थीं लेकिन पिछले कुछ दिनों में एक बदलाव दिखाई दिया है कि लोग जागरूक हुए हैं। उन्होंने बताया कि 18 वर्षीय किशोर को हाल ही में टीबी और कोविड संक्रमण होने के चलते एम्स में भर्ती किया था। उसके फेफड़ों में टीबी संक्रमण के विषाणु पाए गए लेकिन उसकी हिम्मत देखने लायक थी। ऐसे लोग दूसरे मरीजों के लिए प्रेरणा बन सकते हैं।
वहीं दिल्ली सरकार के लोकनायक अस्पताल के डॉ. विक्रम सिंह का कहना है कि टीबी को लेकर एक बदलाव जरूर दिखाई दे रहा है लेकिन अभी इसके लिए और भी ज्यादा मेहनत की जरूरत है। उनके यहां भी ऐसे कई मरीज स्वस्थ्य होकर वापस घर जा चुके हैं जिन्होंने ठीक होने के बाद दूसरे मरीजों के उपचार में भी मदद की है। नई दिल्ली स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल (आरएमएल) के डॉ. अमित सूरी का कहना है कि टीबी संक्रमण को लेकर उनके अलग ही अनुभव हैं।
किसी भी तरह का उपचार तभी असरदार है जब मरीज की आत्मशक्ति उसका साथ दे। पहले कई तरह की चुनौतियां देखने को मिलती थीं लेकिन अब न सिर्फ संक्रमित मरीज बल्कि उनके परिजनों में भी काफी हिम्मत देखने को मिलती है और उसी का नतीजा भी है कि मरीज जल्द ही रिकवर होते हैं।