जानकारी के अनुसार इस मिशन के लिए बनाए जाने वाले अंतरिक्षयान को सोलन रेडिएशन (सौर विकिरण) और सोलर विंड (सौर हवाएं) के बीच इसरो के अबसे आधुनिक जीएसएलवी मार्क-3 के साथ लॉन्च किया जाएगा। इस पर भारत के 16 और अन्य देशों के सात पेलोड होंगे जो शुक्र की परिक्रमा करेंगे और चार साल तक उसका अध्ययन करेंगे।
उल्लेखनीय है कि शुक्र ग्रह से संबंधित एक खोज के रूप में वैज्ञानिकों को इसी साल अच्छी खबर मिली थी। सितंबर में अंतरराष्ट्रीय खगोल विज्ञानियों के एक दल को शुक्र ग्रह के वायुमंडल में फॉस्फीन गैस के प्रमाण मिले थे। इससे पहले यूरोपीय अंतरीक्ष एजेंसी ने अपने मिशन 'वीनस एक्सप्रेस' में शुक्र के ऊपरी वायुमंडल में ओजोन के निशान मिले थे।
इस मिशन में रूस की सरकारी अंतरिक्ष एजेंसी रोस्कोसोमोस और रूस के वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र लेटमोस एटमॉस्फियर्स के भी सहयोग कर रहा है। वहीं, स्वीडन ने भी इससे जुड़ने का निर्णय किया है। रूस जहां वीनस इन्फ्रारेड एटमॉस्फेरिक गैसेज लिंकर बनाने में में मदद कर रहा है। वहीं, स्वीडन ग्रह पर खोज करने के लिए एक विशेष उपकरण उपलब्ध कराएगा।