भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का पहला छोटा उपग्रह प्रक्षेपण यान SSLV-D1 अंतिम चरण में ‘डाटा लॉस’का शिकार हो गया। इसरो के अध्यक्ष एस सोमनाथ ने जानकारी देते हुए बताया कि कक्षा में स्थापित किए गए सैटेलाइट अब प्रयोग करने योग्य नहीं हैं। समस्या की यथोचित पहचान की गई है। विश्लेषण के लिए एक समिति गठित की गई है। इसरो अध्यक्ष एस सोमनाथ ने बताया है कि SSLV-D1 ने सभी चरणों में अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन किया और सैटेलाइट को कक्षा में भी पहुंचा दिया। लेकिन मिशन के अंतिम चरण में, कुछ डाटा की क्षति हो गई जिससे सैटेलाइट से संपर्क टूट गया।
SSLV-D1 देश का सबसे छोटा रॉकेट
बता दें कि SSLV-D1 देश का सबसे छोटा रॉकेट है। 110 किलो वजनी SSLV तीन स्टेज का रॉकेट है जिसके सभी हिस्से सॉलिड स्टेज के हैं। इसे महज 72 घंटों में असेंबल किया जा सकता है। जबकि बाकी लॉन्च व्हीकल को करीब दो महीने लग जाते हैं।
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EOS-02 और आजादी सैटेलाइट की खासियत
माइक्रो श्रेणी के EOS-02 उपग्रह में इंफ्रारेड बैंड में चलने वाले और हाई स्पेशियल रेजोल्यूशन के साथ आने वाले आधुनिक ऑप्टिकल रिमोट सेंसिंग दिए गए हैं और इसका वजन 142 किलोग्राम है। EOS-02 10 महीने के लिए अंतरिक्ष में काम करेगा। वहीं आजादी सैट आठ किलो का क्यूबसैट है, इसमें 50 ग्राम औसत वजन के 75 उपकरण हैं। इन्हें ग्रामीण भारत के सरकारी स्कूलों की छात्राओं ने आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर इसरो के वैज्ञानिकों की मदद से बनाया। वहीं स्पेस किड्स इंडिया के विद्यार्थियों की टीम ने धरती पर प्रणाली तैयार की जो उपग्रह से डाटा रिसीव करेगी। यह सैटेलाइट नई तकनीक से लैस है जो कि फॉरेस्ट्री, एग्रीकल्चर, जियोलॉजी और हाइड्रोलॉजी जैसे क्षेत्रों में काम करेगा।
इस रॉकेट की लॉन्चिंग से PSLV का लोड होगा कम
SSLV रॉकेट की लॉन्चिंग से PSLV छोटे सैटेलाइट्स के लोड से मुक्त हो जायेगा क्योंकि वह सारा काम अब एसएसएलवी करेगा। ऐसे में पीएसएलवी को बड़े मिशन के लिए तैयार किया जाएगा।
भविष्य में बढ़ते स्माल सैटेलाइट मार्केट के लिए उपयोगी
भविष्य में बढ़ते स्माल सैटेलाइट मार्केट और लॉन्चिंग को देखते हुए SSLV-D1 कारगर साबित होने वाला है। इसकी लॉन्चिंग के बाद से विदेशों में भी इसकी मांग बढ़ जाएगी। एसएसएलवी अपने साथ 500 किलोग्राम वजनी पेलोड ले जाने में सक्षम है, जो कि 500 किलोमीटर की ऊंचाई की कक्षा में सैटेलाइट स्थापित करेगा। जबकि इसकी तुलना में पीएसएलवी 1750 वजनी पेलोड को सन सिंक्रोनस ऑर्बिट यानी 600 किलोमीटर ऊपर कक्षा में स्थापित कर सकता है।
एसएसएलवी के फायदे
- सस्ता और कम समय में तैयार होने वाला।
- 34 मीटर ऊंचे एसएसएलवी का व्यास 2 मीटर है, 2.8 मीटर व्यास का पीएसएलवी इससे 10 मीटर ऊंचा है।
- यह SSLV छोटे सैटेलाइट को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित करने में सक्षम होगा।
- एसएसएलवी (SSLV) की लॉन्चिंग से पावरफुल पीएसएलवी छोटे सेटेलाइट्स के लोड से मुक्त हो जायेगा। क्योंकि वह सारा काम अब SSLV ही करेगा।