क्या है द्वि-राष्ट्र समाधान?
दो- राष्ट्र समाधान उन क्षेत्रों में दो देशों इस्राइल और फलस्तीन के वजूद की बात करता है जो कभी ब्रिटिश शासन के अधीन फलस्तीन क्षेत्र था। फलस्तीन के शासन क्षेत्र को दो राज्यों में विभाजित करने का प्रस्ताव पहली बार 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने दिया था, जब इसने यूएनजीए प्रस्ताव 181 (II) पारित किया था। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावित बंटवारे में, कहा गया था कि ब्रिटिश शासन वाले क्षेत्र को भविष्य में यहूदी राज्य (इस्राइल) के तौर पर लगभग 55 प्रतिशत भूमि दी जाएगी, जबकि बाकी 45 प्रतिशत अरब राज्य (फलस्तीन) को देने की बात कही गई थी। हालांकि, 1948 में इस्राइल की स्थापना के 75 साल बाद भी इस मुद्दे पर संघर्ष जारी है।
इस्राइली फलस्तीन संघर्ष
- फोटो : अमर उजाला
फ्रांस, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों ने अब क्यों दी मान्यता?
ब्रिटेन के पीएम ने फलस्तीन को आजाद राष्ट्र की मान्यता देते हुए कहा कि यह फैसला इस्राइल का विरोध करने के लिए नहीं लिया गया है, लेकिन इस्राइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू गाजा पर हिंसक तरीके से सैन्य हमला कर रहे हैं। वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन नहीं कर रहे हैं, इसलिए यह कदम उठाना जरूरी है।
द गार्डियन ने लिखा यह फैसला द्वि-राज्य समाधान के समर्थन करने के लिए लिया जा रहा है। इस्राइल लगातार गाजा पर हिंसक हमले कर रहा है। इसका मकसद पश्चिमी तट पर कब्जा करने की आपत्ति के लिए इस्राइल और अमेरिका का विरोध करना भी है। दुनिया को यह संदेह है कि इस्राइल पश्चिमी तट पर कब्जा करने वाला है या वह गाजा के लोगों को इतना मजबूर कर देगा कि फलस्तीनियों को सीमा पार करके जॉर्डन या मिस्र जाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। इससे फलस्तीनी मातृभूमि की संभावना ही खत्म हो जाएगी।
कनाडा के पीएम मार्क कार्नी ने कहा कि यह कदम मध्य पूर्व चल रह अशांति को रोकने का यह एक अच्छा तरीका है। यह टू-स्टेट सॉल्यूशन को बचाने के लिए भी एक अच्छा कदम है। मान्यता देने से फलस्तीन एक आजाद और लोकतांत्रिक देश बनेगा।
वहीं, ऑस्ट्रेलिया के पीएम एंथनी अल्बानीज ने कहा कि हम फलस्तीनी लोगों की आजाद होने की इच्छा का सम्मान करते हैं। यह टू-स्टेट सॉल्यूशन को बनाए रखने की कोशिश में एक अच्छा निर्णय है। यह दोनों राष्ट्रों का शांति के लिए एक बेहतरीन तरीका है।
क्या इससे पहले भी किसी देश ने फलस्तीन को इस तरह की मान्यता दी है?
यह पहली बार नहीं है जब फलस्तीन को किसी देश के द्वारा आजाद राष्ट्र की मान्यता दी है। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र के 193 में से 140 देश इसे पहले से मान्यता दे चुके हैं। इसमें भारत भी शामिल है। भारत उन दोशों में से एक है जिसने सबसे पहले फलस्तीन को मान्यता दी थी। भारत ने 1988 में फलस्तीन को एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता दी।
द गार्डियन के अनुसार जल्द ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से चार फलस्तीन को मान्यता दे देंगे। लेकिन इसका पांचवां सदस्य अमेरिका इसके विरोध में ही रहेगा। वह फलस्तीन को संयुक्त राष्ट्र में मतदान का अधिकार दिलाने के लिए वीटो जारी रख सकता है। हालांकि, अमेरिका ने फलस्तीनी अथॉरिटी को मान्यता दी है। इसका गठन 1994 में आस्लो समझौते के तहत किया गया था, ताकि फलस्तीन के पास एक स्थानीय सरकार जैसी व्यवस्था हो।
संयुक्त राष्ट्र के 75% देश फलस्तीन को मान्यता दे चुके हैं। इसे यूएन में ‘परमानेंट ऑब्जर्वर स्टेट’ का दर्जा हासिल है। इसका मतलब है कि फलस्तीन को यूएन के कार्यक्रमों में शामिल होने की अनुमति तो है लेकिन वोट का अधिकार नहीं है।
अमेरिका और इस्राइल का इस मामले में क्या रुख है?
ब्रिटेन और अन्य देशों ने जैसे ही फलस्तीन को मान्यता दी तो कुछ घंटो में इस्राइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्वीर का बयान आया। उनकी तरफ से कहा गया कि वह कब्जे वाले वेस्ट बैंक के तत्काल विलय के लिए दबाव डालेंगे। उन्होंने इस मान्यता को हमास के लिए एक पुरस्कार बताया। हमास ने 7 अक्तूबर 2023 को दक्षिणी इस्राइल में हमले का नेतृत्व किया था।
अमेरिका ने इस मान्यता के बाद अपना रुख साफ करते हुए बताया कि वह हमास जैसे संगठन को बढ़ावा देने का विरोध करता है। वह इस्राइल की सुरक्षा के लिए हमेशा खड़ा रहेगा। एएफपी ने अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता के हवाले से सोमवार को कहा, "हमारा ध्यान गंभीर कूटनीति पर है, न कि दिखावटी इशारों पर। हमारी प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं- बंधकों की रिहाई, इस्राइल की सुरक्षा और पूरे क्षेत्र के लिए शांति और समृद्धि, जो केवल हमास से मुक्ति पर ही संभव है।"
इस्राइल-फलस्तीन के बीच संघर्ष कितना पुराना है?
इस्राइल और फलस्तीन के बीच के मतभेद की शुरुआत ओटोमन साम्राज्य के खत्म होने के साथ होती है। 19वीं शताब्दी में यहूदियों की यह पवित्र भूमि फलस्तीन के नाम से जानी जाती थी। उस दौर में यहूदी लोग पूरे यूरोप में फैले थे। पहले विश्वयुद्ध में ब्रिटेन ने ओटोमन को जीत लिया। 1917 में ब्रिटेन ने एक घोषणा की जिसमें कहा गया कि ब्रिटेन फलस्तीन को यहूदियों की मातृभूमि बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसे बाल्फोर डिक्लेरेशन कहा जाता है। कई लोगों का मानना है कि बेलफोर डिक्लेरेशन ही वह प्रमुख वजह थी, जिसने इस्राइल और फलस्तीन मतभेद को जन्म दिया।
उस दौर में इटली और जर्मनी जैसे देश राष्ट्रवाद के नाम पर एक हो रहे थे। इसी दौर में जियोनिष्ट आंदोलन की शुरुआत हुई। इसी बीच आए बाल्फोर डिक्लेरेशन ने यहूदियों का फलस्तीन में आकर बसना तेज हुआ। 1945 तक यह इलाका अंग्रेजों के कब्जे में रहा और पूरे यूरोप से यहूदी आकर यहां बसते रहे। इस दौरान फलस्तीनियों और यहूदियों में कई संघर्ष होते रहे। ब्रिटेन के ऊपर यहूदियों के पुनर्वास का दबाव बढ़ने लगा। दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन ने ये मामला संयुक्त राष्ट्र को सौंप दिया।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिटलर ने यहूदियों का बड़े पैमाने पर नरसंहार कराया। करीब 42 लाख यहूदियों को गैस चैंबर में डालकर मार दिया गया। यूरोप में रह रहे यहूदियों को महसूस हुआ कि फलस्तीन के अलावा कहीं कोई दूसरी जगह नहीं, जहां यहूदी सुरक्षित रह सकें। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ अस्तित्व में आया। वहीं, दूसरी तरफ यहूदी और अरब के लोगों के बीच का मतभेद काफी ज्यादा बढ़ गया था। ब्रिटेन इस मसले को हल करने में सक्षम नहीं था, इसलिए उसने यह मसला संयुक्त राष्ट्र संघ में भेज दिया।
इस मसले पर संयुक्त राष्ट्र संघ में वोटिंग हुई और नतीजा निकला कि जहां यहूदियों की संख्या ज्यादा है ,उन्हें इस्राइलदिया जाएगा। वहीं जिस जगह पर अरब बहुसंख्यक हैं, उन्हें फलस्तीन दिया जाएगा। तीसरा था यरूशलम, इसे लेकर काफी मतभेद थे। यहां आधी आबादी यहूदी थी और आधी आबादी मुस्लिम। इसे लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने फैसले में कहा कि इस क्षेत्र पर अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण लागू होगा।