अजब अन्तर्विरोध है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और यशवंत सिन्हा जैसे अपने बुजुर्ग नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में भेजकर निष्प्रभावी या शोभा की वस्तु सरीखा बनाया हुआ है। वहीं दूसरी तरफ एस. एम. कृष्णा जैसे बुजुर्ग कांग्रेसी नेताओं को उनके राजनीतिक अनुभव और वरिष्ठता का आदर करने के आश्वासन के साथ पार्टी में शामिल किया जा रहा है।
अगर नारायण दत्त तिवारी जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेता बुढ़ापे में आंध्र प्रदेश के राजभवन से जुड़े विवादों के कारण बेदखल होकर सार्वजनिक 'थू-थू' के शिकार न हुए होते तो भारतीय जनता पार्टी हाल ही के उत्तराखंड चुनावों से पहले उन्हें भी पार्टी में शामिल कर लेती।
मगर पार्टी ने उनके बेटे रोहित शेखर को ही पार्टी में शामिल किया जो विधानसभा की सीट के लिए टिकट चाहते थे और नारायण दत्त तिवारी से चुनावों में सहयोग का आश्वासन लेकर उन्हें बैरंग ही विदा किया।
हरीश रावत सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री भी पाला बदल कर बीजेपी में शामिल हुए
अब करीब 91 वर्ष का आदमी, जो वैसे भी तभी-तभी अस्पताल रहकर लौटा था चुनावों में किस काम का था। हरीश रावत सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री यों भी थोक के भाव से पाला बदल कर बीजेपी में शामिल हो गए और तिवारी की प्रासंगिकता किसी काम की नहीं रही, लेकिन एस एम कृष्णा की प्रासंगिकता है।
उनकी राजनीतिक छवि काफी हद तक साफ-सुथरी है। वे वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं, जिसकी कर्नाटक में आबादी करीब 13 प्रतिशत है। अगले साल कर्नाटक विधानसभा के चुनाव होने है और 2013 में कर्नाटक की सत्ता खोने वाली भाजपा 2018 में उसे वापस हथियाना चाहती है।
दिक्कत यह है कि बीजेपी के पूर्व मुख्यमंत्री बी एस येदुरप्पा की भ्रष्टाचार के आरोपों से बरी होने के बाद पार्टी में फिर से पैठ तो जरूर हो गई है, लेकिन लिंगायत समुदाय के भारी समर्थन के बावजूद चुनाव जीतने के लिए उसे दूसरे प्रभावशाली समुदाय बोक्कालिगा के समर्थन की भी सख्त जरूरत है।
सक्रिय राजनीति ऐसी चीज है जो मुर्दे के मुँह में भी जान डाल देती है
इस समर्थन को दिलाने की कोशिश के बदले एस एम कृष्णा को क्या हासिल होगा, यह तो समय ही बताएगा। पर इतना तो साफ है कि जिस कांग्रेस ने उन्हें मुख्यमंत्री, राज्यपाल और विदेश मंत्री जैसे पद दिए, उसमें उनकी कोई पूछ नहीं रह गई थी। सक्रिय राजनीति ऐसी चीज है जो मुर्दे के मुँह में भी जान डाल देती है।
यही कारण है कि जहां करीब 84 वर्षीय एस एम कृष्णा के पार्टी में शामिल होने पर बीजेपी अपने मनोबल बढ़ाने का दावा कर रही है, वहीं एस एम कृष्णा को लग रहा होगा कि अभी मैं चुका नहीं हूं और हो सकता है कि कोई सिम-सिम दरवाजा खुल जाए। उधर कांग्रेस इतनी बार बिखरी और टूटी है कि उसका होना ही अपने आप में किसी आश्चर्य से कम नहीं है।
1967 में राम मनोहर लोहिया के गैर कांग्रेसवाद के नारे के परिणाम स्वरूप कई प्रदेशों में संयुक्त सरकारें बनीं। बाद में कांग्रेस के भी इंडिकेट-सिंडिकेट में दो टुकड़े हो गए। मगर अपने अपूर्व साहस, कल्पनाशीलता और समाजवादी आग्रहों से इन्दिरा गांधी ने कांग्रेस को फिर से नया करना शुरू कर दिया।
जब कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार की बनी
इन्दिरा गांधी ने प्रादेशिक छत्रपों को उभरने नहीं दिया और सत्ता को काफी हद तक केन्द्रीकृत रखा। धीरे-धीरे कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार की बन गई। नेहरू-गांधी परिवार का नेतृत्व ही वह गोंद साबित हुआ जो कांग्रेसियों को आपस में जोड़कर रखता है।
राजीव गांधी के जमाने तक यह पैटर्न करीब-करीब निरापद ढंग से चलता रहा। प्रधानमंत्री नरसिंह राव को निरीह मानकर 10, जनपथ ने उन्हें सत्ता सौंपी थी, मगर वे उस्तादों के भी उस्ताद साबित हुए और अर्जुन सिंह और नारायण दत्त तिवारी के संयुक्त नेतृत्व में कांग्रेस फिर से टूट गई।
मगर आगे चलकर नेहरू-गांधी परिवार के नेतृत्व में वह फिर एक बार एकजुट हो गई। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के सामान्य मगर 'अच्छे शासन' के बावजूद उसे 2004 में दोबारा जनादेश प्राप्त नहीं हुआ और सोनिया गांधी ने लगभग रिमोट कंट्रोल से 10 सालों तक मनमोहन सिंह सरकार चलाई।
राहुल गांधी कांग्रेस के लगातार क्षय का कारण
इसे कांग्रेस का गुण कहें या अवगुण, उसे बांधकर रखने वाली रस्सी नेहरू-गांधी परिवार ही है। यह रस्सी आजादी के संघर्ष में नेहरू परिवार के अपूर्व योगदान, नेहरू के भारत स्वप्न, इन्दिरा गांधी के इस्पाती संकल्प और राजीव गांधी की कल्पनाशीलता का परिणाम है, जिसे सोनिया गांधी के त्याग ने किसी तरह बनाए रखा है। लेकिन राहुल गांधी इस मामले में कहीं नहीं ठहरते।
दुर्भाग्य से उनका नेतृत्व कांग्रेस के लगातार क्षय का कारण बनता जा रहा है। कांग्रेस इस बार गोवा और मणिपुर तक में जीती बाजी हार गई जबकि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड मे उसका सूपड़ा ही साफ हो गया है। सिर्फ पंजाब और कर्नाटक को छोड़कर किस बड़े राज्य में उसका वजूद नहीं है।
इसलिए कांग्रेस में और भी टूट-फूट होनी है। लोग और भी हैं जो आने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी में शामिल होंगे और बीजेपी विशुद्ध चुनाव जीतने के उनके आसार के आधार पर उन्हें पार्टी में शामिल करेगी। लेकिन कांग्रेसियों को अपने में शामिल करने को तत्पर बीजेपी फिर चाल, चरित्र और चेहरे में अपने को दूसरों से अलग कैसे साबित करेगी?
मोदी और अमित शाह देश-प्रदेश में उनकी सरकार
क्या बीजेपी अपने कांग्रेसीकरण को रोकने के लिए तैयार नहीं है? उसमें और कांग्रेस में उग्र हिन्दुत्व के अलावा नीतियों कार्यक्रमों और शैली में कहां अंतर है? मोदी और अमित शाह की जोड़ी का एक ही मंत्र है और वह यह कि चाहे जो भी करो बीजेपी को एक ऐसी मशीन में तब्दील कर दो कि देश में और हर प्रदेश में उसी की सरकार बने।
किसी भी पार्टी का कोई भी असन्तुष्ट हो, भ्रष्ट हो, आपराधिक छवि का हो, अगर चुनाव जितवा सकता हो तो उसे तत्काल पार्टी में शामिल कर लो। पार्टी के भीतर भी किसी को असहमति का अधिकार न हो और किसी भी नेता का कद या प्रभाव ऐसा न हो जो आगे चलकर चुनौती बन जाए।
जाहिर है इन्हीं दुर्गुणों के कारण कांग्रेस का यह हश्र हुआ और ये ही दुर्गुण दूसरों से अलग और विशिष्ट होने का दावा करने वाली बीजेपी मे घर करते जा रहे हैं। साफ है कि क्यों आडवाणी को एक तरफ बैठाया हुआ है और क्यों कृष्णा को गले लगाया जा रहा है।