भारत में महिलाओं की इच्छा और योग्यता होने के वावजूद कई क्षेत्र में उन्हें काम करने से रोक कर रखा गया है। विश्व बैंक के अनुसार, इस वजह से औपचारिक अर्थव्यवस्था में भारतीय महिलाओं की भागीदारी सबसे कम है और उनसे आगे बढ़ने के मौके छीने जा रहे हैं।
पैरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) 2020 के अनुसार, भारत में केवल 18.6 फीसदी कामकाजी उम्र की महिलाएं श्रम शक्ति में भाग लेती हैं, जो पुरुषों की तुलना में तीन गुना कम है। हालांकि जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था बढ़ी है, महिलाओं की शैक्षिक हैसियत बढ़ी है, प्रजनन दर में कमी आई है, लेकिन महिलाएं औपचारिक अर्थव्यवस्था में भाग नहीं ले रही हैं। वास्तव में उनकी भागीदारी घट रही है।
महिलाएं पीछे कहां?
आर्थिक सर्वेक्षण 2018 से पता चलता है कि भारतीय महिलाएं आमतौर पर अत्यधिक असुरक्षित नौकरियां करती हैं जहां उन्हें कम वेतन मिलता है। 2015 में भारत में पूर्णकालिक कर्मचारियों की औसत आय में जेंडर गैप पाया गया।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की 2018 के एक रिपोर्ट के मुताबिक उद्योगों में 88 फीसदी महिलाएं काम कर रही हैं वहीं सर्विस सेक्टर में 71 फीसदी महिलाएं कार्यरत हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक काम में बेहतर प्रदर्शन करने के बावजूद महिलाओं का ओहदा नहीं बढ़ता है।
कामकाजी महिला
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श्रम शक्ति में जेंडर गैप क्या बताता है?
मिंट में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक अध्ययनों से पता चलता है कि पारिवारिक आय, विवाह, बच्चों की देखभाल, सार्वजनिक सुरक्षा और राजनीतिक अक्षमता महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को प्रभावित करती है। लेकिन इन सभी कारकों में लिंग भेदभाव पर सबसे कम अध्ययन किया गया है।
ट्राइस एक नियामक अनुसंधान और नीति सलाहकार कंपनी ने 23 राज्यों की तुलना 48 अधिनियमों, 169 नियमों और 20 अधिसूचनाओं/आदेशों की तुलना करते हुए एक सूचकांक बनाया है जिसमें यह देखा जा सकता है महिलाओं को कितनी आर्थिक स्वतंत्रता मिली हुई है। सूचकांक में महिलाओं के साथ भेदभाव की स्थिति का साफ पता चलता है।
इसके मुताबिक यदि भारतीय महिलाएं श्रम बाजार में पुरुषों के समान ही भाग लें, तो 200 मिलियन से अधिक अतिरिक्त महिला श्रमिकों को काम मिल सकता है। मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि 2025 तक यदि भारत में महिलाओं को काम का समान अवसर मिले तो इससे अर्थव्यवस्था में 700 अरब डॉलर का योगदान हो सकता है।
महिलाओं के खिलाफ कहां कैसा भेदभाव?
रिपोर्ट के मुताबिक केरल, तमिलनाडु और गोवा महिलाओं को काम चुनने की सबसे बड़ी आजादी मिली हुई है। जबकि ओडिशा, मेघालय, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक प्रतिबंध है।
राज्य महिलाओं को कठिन कामों में और रात में कारखानों में कम से कम रोजगार देता है। नाइट शिफ्ट में काम करना कानूनी विषय है और फैक्ट्रीज़ एक्ट, 1948 से संबंधित राज्य के नियमों में इस पर सबसे अधिक प्रतिबंध हैं।
कई राज्यों में महिलाओं के कारखानों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और बागानों में अनुबंध और प्रवासी श्रमिकों के रूप में काम करने की मनाही है। महिलाओं की सुरक्षा, शोषण से उनकी रक्षा करने के इरादे से ये प्रतिबंध लगाए गए हैं।
कामकाजी महिला
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कहां रात की पाली में काम करने की छूट?
रिपोर्ट के मुताबिक विश्व बैंक के शोधकर्ता बताते हैं कि महिलाओं को रात में काम करने की अनुमति देना सकारात्मक रूप से महिलाओं के शीर्ष पर होने की संभावना से संबंधित है। कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में महिलाओं को विभिन्न प्रतिष्ठानों में रात में काम करने की सबसे अधिक स्वतंत्रता है, जबकि ओडिशा और तेलंगाना में इस पर कड़ा प्रतिबंध हैं।
जबकि एक भी राज्य में महिलाओं को कारखानों में रात में काम करने की स्वतंत्रता नहीं है। आठ विशेष शर्तों के तहत उद्योगों को कुछ छूट मिली हुई है। उदाहरण के लिए कुछ राज्य मछली से बने खाद्य पदार्थों की पैकिंग वगैरह जैसे कामों के लिए इसकी छूट देते हैं, हालांकि रात की पाली और भोजन खराब होने के बीच का संबंध स्पष्ट नहीं है।
रात में काम की मंजूरी के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया
रात की पाली में काम करने से रोकने को लेकर कारखाना अधिनियम के इस विशेष प्रावधान के खिलाफ कई याचिकाकर्ताओं ने अदालतों का दरवाजा खटखटाया है। तमिलनाडु में एक कपड़ा मिल कार्यकर्ता वसंता आर को उनकी इच्छा के बावजूद रात की पाली में काम करने की मंजूरी नहीं मिल रही थी। वे राज्य की इस नीति के खिलाफ मद्रास उच्च न्यायालय पहुंच गई थीं।
खतरनाक मानी जाने वाली नौकरियों में काम के मौके नहीं
औद्योगिक क्रांति के बाद, महिलाओं को असुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों से बचाने के लिए उनके लिए कुछ खास तरह की नौकरियों पर प्रतिबंध लगा दिया। बॉम्बे फैक्ट्री कमीशन और फैक्ट्री लेबर कमीशन ने 1881 में भारत में पहला फैक्ट्री एक्ट पारित किया।
महिलाओं का चलती मशीन के साथ काम करने को जोखिम वाला काम माना गया जिसमें दुर्घटनाओं की अधिक संभावना थी। यहां तक कि सुरक्षित मशीनों के आने के बाद भी महिलाओं के लिए पूर्वाग्रह जारी रहा।
महिला श्रमिक
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कई राज्यों ने महिलाओं को कारखानों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और बागानों में कई नौकरियों में काम करने से रोक कर रखा है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ही ऐसे दो राज्य हैं जो महिलाओं को सभी प्रतिष्ठानों में सभी प्रक्रियाओं में काम करने की अनुमति देते हैं।
मध्य प्रदेश में जोखिम वाले कामों में महिलाओं की नौकरी पर रखने पर सबसे अधिक प्रतिबंध है। यह एकमात्र राज्य है जो महिलाओं को कारखानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों दोनों में खतरनाक प्रक्रियाओं में काम करने से रोकता है।
इतिहासकार और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर समिता सेन के बयान के मुताबिक इस तरह के प्रतिबंधों के जरिए नियोक्ताओं ने कामों के लिए मशीने रख ली हैं और ऐसा करके महिला श्रमिकों को दूर कर दिया है।
कठिन मानी जाने वाली नौकरियों में भी प्रतिबंध
महिलाओं को शारीरिक बनावट की सीमाओं का हवाला देते हुए उन्हें व्यवस्थित रूप से नौकरियों से बाहर रखा जाता है। विश्व बैंक के अनुसार, 46 देशों में महिला श्रमिकों के लिए भार उठाने जैसे प्रतिबंध लागू हैं।
देश के 22 राज्यों में महिलाओं के भारी सामान उठाने पर पाबंदी है। बिहार और झारखंड में कठिन माने जाने वाले नौकरियों में महिलाओं को काम करने की अधिकतम स्वतंत्रता मिली हुई है।
महिला मजदूर
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कुछ राज्यों में पुरुषों के वजन उठाने पर कोई प्रतिबंध नहीं है, लेकिन महिलाओं के लिए है। रिपोर्ट के मुताबिक कार्यस्थल में महिलाओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए वजन प्रतिबंध लागू किए गए हो सकते हैं, लेकिन ऐसे नियम इसलिए भी बनाते हैं ताकि सभी महिलाएं, व्यक्तिगत क्षमता या इच्छा की परवाह किए बिना, बेड़ियों से बंधी हों।
नैतिक रूप से अनुचित कामों को करने की मनाही
रिपोर्ट में कहा गया है अधिकांश राज्यों के आबकारी अधिनियम विशेष सुरक्षा दृष्टिकोण से महिलाओं को शराब की खरीद- बिक्री के केंद्र से बाहर रखते हैं ताकि 'महिलाओं को नशे की लत से बचाया जा सके और यौन अपराधों की संभावना को टाला जा सके।
गोवा, हिमाचल प्रदेश, केरल और तमिलनाडु में महिलाओं को लाइसेंस प्राप्त शराब प्रतिष्ठानों में काम करने की सबसे अधिक स्वतंत्रता मिली हुई है। जबकि छत्तीसगढ़, हरियाणा, ओडिशा, पंजाब, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल सबसे अधिक प्रतिबंध है।
प्रत्यक्ष रूप से, ये प्रतिबंध सार्वजनिक स्वास्थ्य, सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता को बनाए रखने के लिए लगाए गए हैं। लेकिन इस सेक्टर और प्रतिष्ठानों में कार्यरत महिलाएं इसका विरोध करती हैं। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इन रूढ़ियों को पुराना माना है।