देश में बाघों की कम होती संख्या काफी समय से चिंता का विषय बनी हुई है। कई बार तो जंगल में रहने वाले बाघों के लिए उनकी वही दुनिया खतरनाक साबित होती है। दहशत तो तब होती है जब कोई गोली से उनका शिकार करता है। लेकिन राजस्थान के सीहोर जिले के जंगलों में अब हालात बेहतर हुए हैं। चलिए आपको बताते हैं जंगलों की उस खतरनाक दुनिया के बारे में और बेहतर होते उन जंगलों के बारे में भी-
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कुछ ऐसी होती है वो खतरनाक दुनिया
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जंगल की वो दुनिया कुछ समय पहले तक खतरनाक हुआ करती थी। उस दुनिया में कोई भी शिकारी अपनी बंदूक को लेकर घुंस जाता था और वहां रहने वाले बाघों में दहशत समा जाती थी। वहां कई बार भूखे प्यासे बाघ अपनी मां के इंतजार में दुनिया से विदा हो जाते थे और मां बेचारी शिकारी के हाथों मारी जाती थी।
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2010 के बाद लोगों का ध्यान खिंचा
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लोगों ने साल 2010 के बाद जंगलों की उस खतरनाक दुनिया की तरफ ध्यान देना शुरू किया। जब सेव अवर टाइगर्स नाम से एक अभियान की शुरुआत हुई। इसके ऐड में गोली चलती है और एक बाघ की मौत हो जाती हैै। फिर टीवी पर दुखद संदेश उभरता है जिसमें लिखा होता है बस 1411 बचे।
आज इतनी है सीहोर के जंगलों में संख्या
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अब वहां हालात सुधर रहे हैं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 10 साल पहले तक यहां एक भी बाघ नहीं था लेकिन अब यहां उनकी दहाड़ें सुनाई देती हैं। हाल ही में की गई गिनती से पता चला कि यहां अब 19 बाघ रहते हैं।
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2008 के बाद आई जागरुकता
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वन विभाग द्वारा किए गए प्रयासों से साल 2008 के बाद से जागरुकता आई है। जिस कारण यहां बाघों की संख्या में वृद्धि हुई है। अब विभाग की 7 बीटों के करीब दो हजार हेक्टेयर क्षेत्र में ये बाघ विचरण कर रहे हैं।
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सरकारी स्तर पर की गई कई कोशिशें
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सीहोर जिले की सीमा में रातापानी अभयारण्य का कुछ हिस्सा आता है। साल 2010 के बाद से बाघों की संख्या में वृद्धि होनी शुरू हुई। वहीं से कुछ बाघों ने सीहोर के जंगलों की ओर कदम रखा। इन्हीं जंगलों में उन्होंने अपना परिवार बढ़ाया।
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1250 साक्ष्य किए गए एकत्रित
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सीहोर के जंगलों की बात करें तो इसके लिए मार्च 2018 में बाघों की गणना हुई। इसके लिए बाघों के 1250 साक्ष्यों को एकत्रित किया गया। गिनती में बाघों के पेनमार्क, मल, कैमरा ट्रैपिंग और पेंड़ों की खुचरन आदि के साक्ष्य शामिल हैं। इनमें 7 नर और 12 मादा हैं।
जंगल में किए गए ये बदलाव
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जंगलों में बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए बहुत से बदलाव किए गए हैं। उनके रहने के लिए वहां अनुकूल माहौल तैयार किया गया है। इसके लिए वहां घास के मैदान और तालाबों का निर्माण किया गया। साथ ही जंगलो में पेट्रोलिंग भी बढ़ाई गई। इसके अलावा स्कूलों में भी अनुभूति कैंप के माध्यम से बच्चों को भी इसके संरक्षण के लिए जागरुक किया गया।
देश में हैं इतने बाघ
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जैसा कि साल 2010 के बाद से लोगों के बीच बाघों के प्रति जागरुकता आई है। इसके बाद केवल सीरोह ही नहीं बल्कि पूरे देश में काम किया गया है। अब 8 सालों बाद ये संकट खत्म होता जा रहा है। वर्ष 2014 में जब आखिरी बार गणना की गई तो यह संख्या बढ़कर 2,226 हो गई थी।
खुद को दिलासा दे सकता है भारत
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आज रविवार को अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस के अवसर पर अपने सतत प्रयासों से भारत खुद को ये दिलासा दे सकता है वह अभी भी सबसे अधिक बाघों की संख्या वाला देश बना हुआ है।
इतने बदलाव होने के बाद भी विशेषज्ञों की ओर से कुछ चेतावनी दी गई है। उनका कहना है कि अवैध शिकार, घटते वन क्षेत्र और विकास परियोजनाओं से बाघों के निवास स्थान घटते जा रहे हैं। अगर इन समस्याओं से निपटा नहीं गया तो भारत के इस राष्ट्रीय पशु का भविष्य संकट में पड़ सकता है।