बता दें कि हरियाणा में इनेलो के पास एक ही मौजूदा विधायक अभय सिंह चौटाला हैं। 2019 के चुनाव में जजपा के दस विधायक थे। साढ़े चार साल तक जजपा, भाजपा सरकार में शामिल रही। चुनाव से पहले इन दोनों दलों का गठबंधन टूट गया था। हालांकि जजपा के अधिकांश विधायक अब दूसरे दलों में जा चुके हैं। इस बार इनेलो, बसपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। अभी तक 14 उम्मीदवार घोषित हो चुके हैं। 53 विधानसभा सीटों पर इनेलो और 37 पर बसपा चुनाव लड़ेगी।
जननायक जनता पार्टी और आजाद समाज पार्टी (एएसपी) ने चुनावी गठबंधन किया है। इनके 19 उम्मीदवारों के नाम घोषित हो चुके हैं। इनमें जजपा के 15 और एएसनी के 4 उम्मीदवारों के नाम शामिल हैं। जजपा के दुष्यंत चौटाला उचाना कलां से तो उनके भाई दिग्विजय चौटाला, डबवाली से चुनाव लड़ेंगे। गठबंधन के तहत जजपा 70 सीटों पर तो आजाद समाज पार्टी 20 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। जजपा और इनेलो ने सभी उम्मीदवार तय नहीं किए हैं। इनकी नजर, कांग्रेस और भाजपा में बगावत करने वाले नेताओं पर है। ऐसे नेताओं से संपर्क भी किया जा रहा है। अगर इनेलो और जजपा को बगावत करने वाले नेता मिलते हैं, तो कई सीटों पर उनकी स्थिति मजबूत हो सकती है। ऐसे में संभव है कि ये दल, नामांकन भरने की आखिरी तारीख तक बगावत करने वाले उम्मीदवारों के आने का इंतजार करें।
आम आदमी पार्टी भी चुनावी गठबंधन के लिए कांग्रेस के साथ बैठक कर रही है। ये अलग बात है कि प्रदेश का कांग्रेस नेतृत्व इसके पक्ष में नहीं है। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि इस बार के चुनाव में पार्टी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करेगी। कांग्रेस नेताओं में 'हाई कॉन्फिडेंस' है। प्रदेश की सभी 90 सीटों पर कांग्रेस के पास मजबूत उम्मीदवार हैं। एक दो सीटों को छोड़कर बाकी सीटों पर चार से पांच उम्मीदवार तगड़ी दावेदारी पेश कर रहे हैं। 90 सीटों के लिए 2500 से अधिक नेताओं ने आवेदन किया है। आम आदमी पार्टी चाहती है कि इस बार कांग्रेस के साथ उसका गठबंधन हो जाए। वजह, हरियाणा में फिलहाल 'आप' का खाता नहीं खुला है। कांग्रेस मजबूत स्थिति में है, ऐसे में 'आप' करीब दस सीटों पर दावेदारी कर रही है। उसे कांग्रेस की मजबूती का फायदा मिल सकता है, लेकिन कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व पांच से ज्यादा सीट नहीं देना चाहता। कांग्रेस नेताओं को मालूम है कि भविष्य में वे अपने लिए प्रदेश की सियासत में एक नया प्रतिद्वंदी खड़ा कर रहे हैं। अभी तक देश में 'आप' ने जहां भी सरकार बनाई है, वहां पर कांग्रेस के वोट बैंक में ही सेंध लगी है। कुछ माह बाद दिल्ली में विधानसभा चुनाव हैं। दिल्ली में कांग्रेस का खाता नहीं खुला है। ऐसे में कांग्रेस, दिल्ली को ध्यान में रखते हुए आप को कुछ सीटें दे सकती है। हालांकि कई बैठकों के बाद भी इन दलों के बीच गठबंधन पर सहमति नहीं बन सकी है। आम आदमी पार्टी के नेताओं ने कह दिया है कि अगर कांग्रेस के साथ उनका गठबंधन नहीं होता है तो वे पचास सीटों पर अकेले ही चुनाव लड़ेंगे।
राजनीतिक जानकारों का कहना है, अगर यह गठबंधन नहीं होता है, तो 'आप' को भी, दूसरे दलों में बगावत करने वाले नेताओं का इंतजार रहेगा। मौजूदा समय में 'आप' के पास किसी भी सीट के लिए मजबूत उम्मीदवार नहीं है। ऐसी स्थिति में बगावत करने वाले नेता उसके लिए भी फायदेमंद हो सकते हैं। लोकसभा चुनाव में प्रदेश की दस सीटों में से पांच कांग्रेस और पांच भाजपा के खाते में गई थीं। अन्य दलों का खाता नहीं खुल सका था। आम आदमी पार्टी को कांग्रेस के साथ गठबंधन में एक ही सीट मिली थी, लेकिन वह हार गई थी।
छोटे दलों को ऐसे उम्मीदवारों की तलाश है, जो प्रदेश में पूर्व मंत्री या विधायक रहे हों। यही वजह है कि ये दल, अभी 90 सीटों पर एक साथ उम्मीदवारों की सूची जारी नहीं कर रहे। भाजपा में चार सितंबर के बाद से ही बगावत हो रही है। नाराज नेताओं को मनाने का दौर शुरू हुआ है। शुक्रवार तक भाजपा के 70 से ज्यादा नेताओं और पदाधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया है। जिन नेताओं की टिकट कट गई है, उनके रोते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने कई नेताओं को दिल्ली बुलाया है। केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर, धमेंद्र प्रधान, मुख्यमंत्री नायब सैनी, पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान प्रदेश प्रभारी डॉ. सतीश पूनिया, हरियाणा भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली और प्रदेश संगठन महामंत्री फणींद्र नाथ शर्मा, नाराज हुए नेताओं को समझा रहे हैं। शुक्रवार देर रात तक, ऐसे नेताओं को मनाने का दौर जारी रहा।
भाजपा, यह बात जानती है कि इस चुनाव में कांटे की टक्कर है। ऐसे में बग़ावत करने वाले नेता अगर दो-चार हजार वोट का नुकसान भी करते हैं तो वह बड़ा नुक़सान पहुंचा सकता है। कांग्रेस पार्टी की पहली सूची के बाद कई नेता नाराज बताए जा रहे हैं। पार्टी ने बगावत के डर से पहली सूची में नए चेहरों पर दांव नहीं लगाया। 31 में से 28 मौजूदा विधायकों को टिकट दे दिया। हालांकि कांग्रेस पार्टी की मुसीबत, अब शुरु हो सकती है। आगे जिन उम्मीदवारों की सूची जारी होंगी, उन सभी पर सहमति बन जाए, ऐसे आसार कम ही नजर आ रहे हैं।