वायु प्रदूषण और कैंसर का बोझ झेल रहे फेफड़ों के इलाज को लेकर डॉक्टर एक मत नहीं है। इसका उपचार भी समान नही है। इसकी वजह से यह भयावह रूप ले रहा है। सरकार ने अब सख्त रुख अपनाते हुए वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित गाइडलाइन तैयार करने का निर्णय लिया है।
सरकार ने भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) को इसकी जिम्मेदारी सौंपी है, जिसने देश के 100 विशेषज्ञ चिकित्सकों का चयन कर 15 टीमें गठित की है। ये टीमें धूम्रपान-तंबाकू, वायु प्रदूषण, कम खुराक वाली कंप्यूटेड टोमोग्राफी, चेस्ट रेडियोग्राफ, कीमो, इम्यूनो और रेडियोथेरेपी के अलावा सर्जरी को लेकर वैज्ञानिक साक्ष्यों को एकत्रित करेंगे। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, भारत में सभी तरह के कैंसर में 5.9% योगदान फेफड़े के कैंसर का है। इसके अलावा हर साल कैंसर से मरने वालों में 8.1% हिस्सेदारी भी है। द लांसेट मेडिकल जर्नल में प्रकाशित वैश्विक रिपोर्ट 2021 के अनुसार, भारत में फेफड़ों के कैंसर की आयु-मानकीकृत घटना दर (एएसआईआर) 1990 में 6.62 प्रति एक लाख से बढ़कर 2019 में 7.7 तक पहुंची है।
इसलिए जरूरी राष्ट्रीय गाइडलाइन
आईसीएमआर के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि फेफड़ों के कैंसर के इलाज को लेकर मौजूदा समय में देश में राष्ट्रीय स्तर पर गाइडलाइन लागू नहीं है। अगर एक मरीज दिल्ली में किसी डॉक्टर से इलाज करा रहा है तो उसके तौर तरीके कर्नाटक या फिर तमिलनाडु में इलाज करने वाले डॉक्टर से भिन्न हो सकते हैं। इसके फायदे और नुकसान दोनों है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर गाइडलाइन की आवश्यकता है।
15 में से चार टीमें यूपी की
गाइडलाइन बनाने वाली 15 में से चार टीमें उत्तर प्रदेश से हैं। इनमें गोरखपुर एम्स, नोएडा स्थित आईसीएमआर का एनआईसीपीआर और लखनऊ के केजीएमयू व कल्याण सिंह सुपर स्पेशलिटी कैंसर इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञ शामिल हैं। वहीं हरियाणा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से एक एक संस्थान के डॉक्टरों को लिया है। पंजाब और चंडीगढ़ से दो-दो टीमें तैनात की हैं।
इसी साल पूरा होगा काम...
टीम में शामिल डॉ. आयुष लोहिया ने बताया कि गाइडलाइन में सर्जरी को लेकर उन्हें जिम्मेदारी सौंपी गई है। उनकी टीम इस पर काफी समय से काम कर रही है और अगले कुछ समय में वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर जानकारी उपलब्ध कराएगी। उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा कि इसी साल में गाइडलाइन तैयार होने के बाद लागू हो जानी चाहिए।
डॉ. लोहिया का मानना है कि विविधता युक्त इस देश में उपचार के तौर तरीके एक जैसा होना बहुत जरूरी है। इससे न सिर्फ मरीज का जीवन बचाया जा सकता है बल्कि समय रहते निदान के लक्ष्य को भी पूरा कर सकते हैं।