भारतीय गोताखोर जल्द ही समुद्री गहराइयों में ‘पाताल लोक’ खोजने के लिए गोता लगाएंगे। केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने रविवार को कहा कि जल्द ही महत्वाकांक्षी ‘गहन महासागर खोज अभियान’ शुरू करेगा। इस अभियान का मकसद गहरे समुद्र के उस हिस्से में मौजूद मिनरल्स, ऊर्जा और सागरीय विविधिता की खोज करना है, जिसके बारे में अभी तक बहुत ज्यादा खोज नहीं हो सकी है।
मंत्रालय के सचिव एम. राजीवन ने कहा, इस अत्याधुनिक व गेम चेंजिंग अभियान के लिए सभी आवश्यक इजाजत जुटा ली गई हैं और इसे अगले 3-4 महीने में शुरू कर दिए जाने की उम्मीद है।
राजीवन ने कहा, अभियान में विभिन्न गहन समुद्री पहलों के लिए विकसित तकनीकों को भी शामिल किया जाएगा। इनमें से कुछ तकनीक भारतीय रक्षा अनुसंधान व विकास संगठन (डीआरडीओ) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) जैसे संस्थानों ने तैयार की है।
इस अभियान के लिए आवश्यक सभी काम मंत्रालय संचालित कर रहा है और अन्य सरकारी विभाग जैसे डीआरडीओ, बायोटेकभनोलॉजी विभाग, इसरो, वैज्ञानिक व औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) हितधारकों के तौर पर शामिल रहेंगे। बता दें कि भारत के पास मध्य हिंद महासागर में खोज के लिए करीब 1.5 लाख वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र मौजूद है।
4000 करोड़ रुपये की होगी लागत
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक, इस अभियान पर तकरीबन 4000 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है। अभियान से भारत के विशाल एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन और महाद्वीपीय किनारे के अन्वेषण के प्रयास को बढ़ावा मिलेगा।
उन्होंने कहा, इस अभियान का एक पहलू गहरे समुद्री अभियान में काम आने वाली मानवीय पनडुब्बी का डिजाइन तैयार करना, उसे विकसित करना और पेश करना रहेगा, जबकि दूसरा पहलू गहरे समुद्र में खनन की संभावनाओं को खोजना और उससे जुड़ी तकनीक विकसित करना होगा। गहरे समुद्र के लिए नया पोत खरीदना भी अभियान का हिस्सा रहेगा। भारत का वर्तमान पोत सागर कन्या करीब साढे़ तीन दशक पुराना हो चुका है।
यहां भी चीन के साथ होगी प्रतिद्वंद्विता
पिछले सप्ताह चीन ने मरियाना गर्त में खड़ी अपनी नई मानवीय खोजी पनडुब्बी की लाइव फुटेज पेश की थी। यह चीन की तरफ से पृथ्वी पर पानी के अंदर मौजूद सबसे गहरी घाटी की खोज के अभियान का हिस्सा है। इस लिहाज से भारत को गहन समुद्री खोज अभियान में भी चीनी प्रतिद्वंद्विता का सामना करना पड़ेगा। अधिकारी ने कहा, गहन समुद्र में खोज अभियान चलाने का निर्णय बेहद अहम है और यह हिंद महासागर में भारतीय उपस्थिति को मजबूत करेगा, जहां चीन, कोरिया और जर्मनी जैसे अन्य खिलाड़ी पहले से ही सक्रिय हैं।
15 साल का कांट्रेक्ट है भारत के पास हिंद महासागर में खोज का
भारत ने सितंबर, 2016 में इंटरनेशनल सीबेड अथॉरिटी (आईएसए) के साथ 15 साल का अनुबंध किया था। यह अनुबंधन हिंद महासागर में पॉली-मैटेलिक सल्फाइड्स (पीएमएस) की खोज करने के लिए है। इससे भारत को एक निश्चित क्षेत्र में समुद्री कानून के हिसाब से पीएमएस की खोज करने के एक्सक्लूसिव अधिकार मिल गए हैं। आईएसए ने भारत को 10 हजार किलोमीटर में 15 साल तक पीएमएस की खोज करने की मंजूरी दी है।
पूरी दुनिया की नजरें हैं समुद्री पीएमएस पर
पीएमएस यानी पॉली-मैटेलिक सल्फाइड्स में लोहा, तांबा, जस्ता, चांदी, सोना, प्लेटिनम की परिवर्तनशील उपस्थिति होती है। पीएमएस समुद्री की पपड़ी के नीचे गहराई में मौजूद लावा से निकलने वाले गर्म तरल पदार्थ की तलछट होती है। यह समुद्री गहराइयों से मिनरल्स की चिमनी के जरिये बाहर निकलता है। अपनी व्यवसायिक और सामरिक उपयोगिता के कारण यह लंबे समय से पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर रहा है।