रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते भारतीय चाय की गर्माहट खत्म हो रही है। चाय बागान से जुड़े सवा करोड़ लोगों के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई हैं। भारतीय चाय बागान मालिकों और निर्यातकों को इस युद्ध से भारी नुकसान हो रहा है। वजह, भारतीय बागानों से करीब 20 फीसदी चाय, रूस को निर्यात की जाती है। यूक्रेन में भी भारत की चाय के शौकीनों की एक बड़ी संख्या है। अब इन दोनों देशों में चाय का निर्यात बंद हो चुका है। यूक्रेन से नए ऑर्डर नहीं मिल रहे, क्योंकि वहां लड़ाई चल रही है। पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के चलते डॉलर के भुगतान में बाधा आ गई है। निर्यात बंद है, पेमेंट सिस्टम बंद है, ऐसे में भारतीय चाय बागान मालिकों के सामने बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई है।
भारतीय चाय बागान मालिक और निर्यातक, रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते संकट में आ गए हैं। रूस, जिसे भारतीय चाय का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार माना जाता है, अब वहां पर निर्यात बंद हो गया है। यूक्रेन पर हमले के बाद पश्चिमी देशों की तरफ से रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए हैं। कारोबारियों के समक्ष डॉलर के भुगतान में बाधा आ रही है। भारतीय चाय संघ की चेयरपर्सन नयनतारा पाल चौधरी तो पहले ही कह चुकी हैं कि भारतीय चाय उत्पादकों के लिए रूसी बाजार अहम है। युद्ध का असर, रूस और यूक्रेन को होने वाले निर्यात पर पड़ा है।
वैश्विक शिपिंग लाइनों ने रूस की तरफ आने जाने वाली शिपमेंट रद्द कर दी है। एयर कूरियर पूरी तरह बंद हैं। चाय बागान मालिकों को डर है कि उनका गत वर्ष के माल का भुगतान अटक जाएगा। पश्चिमी देशों ने रूसी बैंकों की 'सोसायटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनैंशियल टेलीकम्युनिकेशन' (स्विफ्ट) तक पहुंच को प्रतिबंधित कर दिया है। इससे भुगतान के रास्ते बंद हो गए हैं। ऐसे में भारत का चाय निर्यात मुश्किल में आ गया है। पेमेंट की नई प्रक्रिया से निर्यात शुरू हो सकता है।
कमलेश सिंह के मुताबिक, भारतीय चाय तो अनेक देशों में पहुंचती है। अच्छी क्वॉलिटी की चाय दूसरे देशों से महंगी है। भारत में 30 साल पहले चाय का जो निर्यात होता था, आज भी वैसा ही है। पहले वह मात्रा 220 मिलियल किलोग्राम थी, आज भी वही है। भारतीय चाय के कुल उत्पादन का लगभग 25 फीसदी निर्यात होता है। केंद्र सरकार को जल्द ही चाय बागान को लेकर कोई कदम उठाना होगा। दक्षिण असम में पावर स्थिति अच्छी नहीं है। इस वजह से चाय उत्पादन में 12 से 15 रुपये अतिरिक्त लागत वहन करनी पड़ती है। कोल सप्लाई प्रभावित है। अब रूस, जहां पर सबसे ज्यादा मात्रा में चाय का निर्यात होता है, वहां कामकाज बंद हो रहा है।
कृषि, फार्मा और ऊर्जा क्षेत्रों में रुपया-रूबल के जरिए कारोबार करना आसान है। यहां पर ये भी देखना होगा कि भारत, रूस पर लगाए विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिबंधों को कितना मानता है या नहीं। यूएस संसद में बहस चल रहा है कि S-400 मिसाइल सिस्टम रूस से लेने के कारण अमेरिका नाराज है। दूसरी तरफ चीन के खिलाफ भारत और यूएस के संबंध अच्छे हैं। सीनेट में बहुत से सदस्य चाहते हैं कि ये संबंध न बिगड़े। वे चाहते हैं कि भारत के निर्यात को नुकसान न पहुंचे।
ईरान पर जब प्रतिबंध लगे थे, तो यूको बैंक के जरिये लेनदेन संभव हो सका था। कुछ वैसी थ्योरी रूस व यूक्रेन युद्ध में इस्तेमाल करने की रणनीति पर काम हो रहा है। यहां पर भारतीय स्टेट बैंक, भुगतान की सुविधा के लिए किसी तीसरे पक्ष को नियुक्त करने पर विचार कर रहा है। चूंकि अब रूबल के मूल्य में लगातार गिरावट आ रही है, ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक, विनिमय दर तय करने के दौरान कोई निर्णय ले सकता है। प्रतिबंधों के चलते अमेरिका और नाटो देशों के द्वारा रूस के कई बैंकों को स्विफ्ट से बाहर कर दिया गया है। इससे भारतीय के निर्यातकों के सामने भुगतान की समस्या खड़ी हो गई है।
लिहाजा दूसरे देश के साथ लेनदेन, स्विफ्ट प्रणाली के तहत होता है। रूस के बैंक जब स्विफ्ट से बाहर हो गए हैं तो वहां लेनदेन नहीं हो सकता। बतौर कमलेश सिंह, चाय उत्पादन में करीब 20 लाख से ज्यादा परिवार शामिल हैं। लगभग सवा करोड़ लोगों की रोटी चाय बागान पर चलती है। उन्होंने सरकार को अपनी चिंता बताई है। रुपया-रूबल व्यापार व्यवस्था शुरू करने का आग्रह किया है। इससे रूस के आयातकों को रूबल में भुगतान की अनुमति दे दी जाएगी। दूसरी, ओर भारतीय निर्यातक भी रुपये में भुगतान कर सकेंगे। भारत ने रूस-यूक्रेन मामले में तटस्थता की नीति अपनाई है। भारत सरकार, किस तरह के और कितने आधिकारिक प्रतिबंधों को मानेगी, ये देखने वाली बात है।