भारतीय रेलवे अपने यात्रियों से उगाही का नायाब नमूना पेश कर रहा है। 2022-23 में केवल यात्रियों के टिकट को निरस्त कराने से रेलवे ने 2109 करोड़ रुपये से अधिक की मोटी कमाई कर ली। वित्तीय वर्ष 2023-24 में दिसंबर तक रेलवे को इससे अब तक 1762 करोड़ रुपये की अधिक आमदनी हो चुकी है। रेलवे बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी की मानें, तो इस बार टिकट निरस्तीकरण से होने वाली आमदनी 2300 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है।
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास सीसीएम कार्यालय है। सीसीएम कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस समय टिकट का निरस्तीकरण कराने पर स्लैब में शुल्क लिया जाता है। यह रेलवे की आमदनी का मुख्य जरिया है। रेलवे के टिकट काउंटर पर बैठे सूत्र का कहना है कि स्लीपर (शयन) का वेटिंग (प्रतीक्षा सूची) टिकट कैंसिल करने पर न्यूनतम 60 रूपये की कटौती की जाती है। जिस टिकट पर सीट आवंटित हो जाती है, उसे निरस्त कराने पर प्रति व्यक्ति 120 रुपये का चार्ज लिया जाता है। इसी तरह से एसी-3 के प्रतीक्षा सूची वाले एक व्यक्ति के टिकट का निरस्त करने का चार्ज 65 रुपये है।
टिकट कैंसिलेशन बना रेलवे की कमाई का जरिया
प्रदीप सिंह पेशे से डॉक्टर हैं। परिवार के साथ कोलकाता जाना चाहते थे। आखिरी समय में उनका टिकट कन्फर्म नहीं हुआ और छह लोगों के टिकट को काउंटर से वापस करने के बाद 390 रुपये के करीब कट गए। प्रदीप सिंह कहते हैं कि इसमें उनका गुनाह क्या है? उन्होंने भारतीय रेल से महीना भर पहले टिकट लिया था। टिकट लेते समय उन्होंने पैसे का भुगतान किया। पैसा महीने भर तक रेलवे के अकाउंट में रहा और जब टिकट कन्फर्म नहीं हुआ, तो इसमें उनकी गलती क्या है? आखिरी प्रतीक्षा सूची के टिकट को कैंसिल कराने का इतना चार्ज क्यों ले रही है सरकार।
रेलवे में पूर्व अधिकारी विमल कुमार का कहना है कि कभी यह चार्ज बहुत कम होता था। अब बहुत अधिक हो चुका है। वे कहते हैं कि भारतीय रेलवे के पास पहले से अग्रिम ग्राहक होते हैं। लोग बड़ी संख्या में इस उम्मीद में प्रतीक्षा सूची का टिकट ले लेते हैं, जो बाद में कन्फर्म हो जाएंगे। लेकिन टिकट के कन्फर्म न होने पर उसे वापस करना उनकी मजबूरी है। रेलवे इस मजबूरी का भी फायदा उठा रहा है।
इसी तरह से रेलवे ने देश में कोरोना महामारी के प्रकोप के बाद पैसेंजर ट्रेनों के किराए में तीन गुना तक बढ़ोत्तरी की थी। जहां 10 रुपये के टिकट लगते थे, उन्हें बढ़ाकर 30 रुपये तक कर दिया था। इसे लेकर रेलवे की काफी आलोचना भी हुई। पिछले महीने इस दिशा में कदम उठाते हुए रेलवे ने पैसेंजर ट्रेनों के किराये को कोरोना काल से पहले की दर पर ला दिया, लेकिन ट्रेन यात्रियों को दी जाने वाली अन्य सहूलियतें जैसे वरिष्ठ नागरिकों के किराये में कटौती आदि जैसी सुविधाएं अभी तक नहीं दीं। इस बारे में रेल मंत्रालय का कोई अफसर कुछ बोलने से कतराता है। इसी तरह से ट्रेनों में खान-पान को लेकर भारतीय रेल ने खूब दावे किए। शुल्क भी बढ़ाया, लेकिन खान-पान के स्तर में कोई विशेष सुधार देखने में नहीं आया।
ट्रेन के खान-पान में भी कोई गुणात्मक सुधार नहीं
दिल्ली मुंबई राजधानी जैसी प्रीमियर ट्रेन में भी खान-पान के स्तर में दावे के अनुरुप गुणात्मक परिवर्तन नहीं दिखाई देता। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रत्येक दिन मुंबई-दिल्ली राजधानी में यात्रा करने वाले 40-45 फीसदी तक यात्री टिकट के साथ अपना भोजन, नाश्ता बुक नहीं कराते। दिल्ली मुंबई तेजस राजधानी के पेंट्री मैनेजर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि हम दस साल पहले में राजधानी में जो खान-पान का स्तर बनाए रखते थे, आज भी स्थिति वही है। सूत्र का कहना है कि इस स्थिति में बदलाव के लिए कुछ जरूरी कदम उठाने होंगे, लेकिन इसके लिए काफी ठोस निर्णय लिए जाने की आवश्यकता है।
खाली जा रही है वंदे भारत, आखिर क्यों?
डा. बिनोद बिहारी चौबे कहते हैं कि केंद्र सरकार ने वंदे भारत ट्रेन का इतना प्रचार-प्रसार किया, लेकिन अधिकांश रूट पर ट्रेन खाली जा रही है। जबकि उसी रूट पर दूसरी यात्री ट्रेन में लोगों के टिकट प्रतीक्षा सूची में बने हुए हैं। डा. चौबे कहते हैं कि आप वंदे भारत से सफर करके तुलना में काफी अधिक किराया दे देते हैं। उल्टे आपको बैठकर सफर करना पड़ता है। तीसरा वंदे भारत की समय सारिणी भी इसमें यात्रा करने वाले क्लास के अनुरुप नहीं है। डा. चौबे का कहना है कि वंदे भारत का किराया अधिक होने और तुलना में आराम कम होने के कारण लोग इसमें यात्रा करना कम पसंद करते हैं। रेलवे के ही एक अधिकारी हैं। कहते हैं कि कई वंदे भारत तो ऐसी हैं, जिनमें 40-62 फीसदी यात्री ही यात्रा करते हैं। इनमें बाकी सीटें खाली जाती हैं।