सच्चा वीर वही है जो अनदेखे खतरों में भी निःस्वार्थ सेवा करता है। यह बात सिक्किम के चट्टेन में आए भयानक भूस्खलन में जान गंवाने वाले सिपाही साइनुद्दीन पीके के कमांडिग ऑफिसर ने कही। भारतीय सेना ने लगातार आठ दिन तक तलाशी अभियान चलाया, जिसके बाद उनका पार्थिव शरीर रविवार को बरामद किया गया।
साइनुद्दीन पीके का पार्थिव शरीर।
- फोटो : अमर उजाला
शुरू हुई 2500 किलोमीटर की यात्रा
भारतीय रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल महेंद्र सिंह रावत ने गुवाहाटी में बताया कि उनकी अंतिम यात्रा उत्तर सिक्किम के चट्टेन से 2,500 किलोमीटर दूर लक्षद्वीप के अंद्रोत द्वीप तक, एक गंभीर, गरिमामयी और राष्ट्र को समर्पित सैनिक की यात्रा रही। यह यात्रा भारतीय सेना, वायु सेना और नौसेना के आपसी तालमेल से संभव हो सकी, जिसमें स्थानीय प्रशासन ने भी पूरा सहयोग दिया। इसमें आर्मी एविएशन हेलिकॉप्टर और भारतीय वायु सेना के सी-295 जैसे विमान लगाए गए, जिन्होंने हर चरण पर पार्थिव शरीर को समयबद्ध और सम्मानजनक रूप से स्थानांतरित किया।
साइनुद्दीन पीके
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सैन्य सम्मान के साथ शुरू हुई यात्रा
रावत ने बताया कि आठ जून यानि रविवार को बेंगडुबी मिलिट्री स्टेशन पर सैन्य सम्मान के साथ श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया गया। अंद्रोत पहुंचने पर भारतीय नौसेना ने गार्ड ऑफ ऑनर देकर उनके बलिदान को श्रद्धांजलि दी।
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साइनुद्दीन पीके का पार्थिव शरीर
- फोटो : अमर उजाला
मौन परिश्रम, अटूट ईमानदारी और अतुलनीय समर्पण
जवान की शहादत पर उनके कमांडिंग ऑफिसर ने कहा, सिपाही साइनुद्दीन पीके मौन परिश्रम, अटूट ईमानदारी और अतुलनीय समर्पण जैसी सेना की सर्वोत्तम परंपराओं के प्रतीक थे। चाहे सियाचिन हो या सिक्किम, उन्होंने हर परिस्थिति में ऐसा साहस दिखाया जो हर सैनिक के लिए प्रेरणा है। उनका बलिदान हमें याद दिलाता है कि सच्चा वीर वही है जो अनदेखे खतरों में भी निःस्वार्थ सेवा करता है। हम एक सिपाही, एक साथी और भारत मां के सपूत को सलाम करते हैं। यह सिर्फ एक पार्थिव शरीर की वापसी नहीं थी, बल्कि यह राष्ट्र को नमन था, सेवा के प्रति समर्पण के आदर्श का पुन:पुष्टि थी। यह दिखाता है कि सैनिक, मिट्टी और मातृभूमि के बीच अमिट संबंध होता है।
साइनुद्दीन पीके का पार्थिव शरीर
- फोटो : अमर उजाला
2012 से शुरू की थी देश सेवा
जानकारी के मुताबिक, 20 दिसंबर 1991 को लक्षद्वीप के अंद्रोत द्वीप में जन्मे सिपाही साइनुद्दीन ने 24 मार्च 2012 को भारतीय सेना में सेवा शुरू की थी। पिछले 13 वर्षों में उन्होंने सियाचिन ग्लेशियर जैसे कठिन इलाकों में भी अद्भुत साहस और निष्ठा से देश की सेवा की। अपने अनुशासन, कर्तव्यपरायणता और पेशेवर रवैये के लिए वह अपने साथियों और वरिष्ठों के बीच समान रूप से सम्मानित थे।