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ईरान की जवाबी कार्रवाई से बढ़ी भारत की उलझन, नागरिकों की सुरक्षा और रोजगार की सता रही चिंता

Thu, 09 Jan 2020 01:20 AM IST
आसिम खान हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली
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ईरान में विरोध प्रदर्शन - फोटो : PTI
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ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और युद्घ जैसी बनती जा रही स्थिति ने भारत की उलझन के साथ-साथ चिंता भी बढ़ा दी है। खासतौर से अपने प्रमुख मेजर जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या के खिलाफ ईरान की ओर से की गई जवाबी कार्रवाई के बाद भारत को स्थिति के और बदतर होने का डर सता रहा है।

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दरअसल हालात नहीं सुधरने की स्थिति में भारत के सामने खाड़ी देशों में काम कर रहे अपने करीब एक करोड़ नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकालने की चुनौती खड़ी होगी। इसके अलावा इसका सीधा असर तेल आयात, व्यापार सहित अन्य क्षेत्रों में पड़ेगा।

कूटनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक भारत की मुश्किल यह है कि उसके ईरान के साथ-साथ अमेरिका से भी बेहतर रिश्ते हैं। ईरान ने भारत को अफगानिस्तान तक सीधी पहुंच देने और खाड़ी देशों से द्विपक्षीय व्यापार के लिए चाबहार बंदरगाह उपलब्ध कराया। हालांकि अमेरिकी प्रतिबंध के बाद जब भारत ने ईरान से तेल आयात बंद किया तो दोनों देशों के रिश्ते में थोड़ी खटास आई। 
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अब स्थिति के और बिगड़ जाने और युद्घ तक की नौबत आ जाने के बाद भारत की उलझन और बढ़ गई है। कूटनीतिक परिस्थिति ऐसी है कि भारत किसी एक पक्ष में खड़ा नहीं हो सकता। जबकि ईरान भारत से बड़ी सहायता का उम्मीद पाले बैठा है।

नागरिकों की सुरक्षा की चिंता
ईरान की जवाबी कार्रवाई ने भारत की चिंता में बढ़ोत्तरी की है। अगर युद्घ की नौबत आई तो खाड़ी के सभी देशों (पश्चिम एशिया) पर इसका प्रतिकूल प्रभाव होगा। ऐसे में भारत की पहली चुनौती इन देशों में कार्यरत अपने एक करोड़ नागरिकों की सुरक्षा और रोजगार की चिंता प्राथमिकता के आधार पर तय करनी होगी। 

चूंकि भारतीय नागरिक सभी खाड़ी देशों में हैं, ऐसे में विकट परिस्थति में इतनी बड़ी संख्या में अपने नागरिकों की सुरक्षा या सकुशल स्वदेश वापसी बड़ी चुनौती बन कर खड़ी हो जाएगी। इन नागरिकों का सीधा जुड़ाव देश की अर्थव्यवस्था पर है। ऐसे में अगर इनके रोजगार गए तो पहले से मुश्किलों की दौर से गुजर रही अर्थव्यवस्था पर और प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

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भारत-ईरान कारोबार भी हो सकता है प्रभावित

पिछले वित्तीय वर्ष के दौरान भारत ने 25000 करोड़ रुपये का निर्यात किया, जबकि ईरान से भारत ने करीब 96,000 करोड़ रुपये सालाना वस्तुओं का आयात किया। इस तनाव का असर बासमती चावल निर्यात करने वाली कंपनियों पर देखने को मिल सकता है।

इसी तरह चाय-कॉफी वाली कंपनियों पर इसका असर देखने को मिल सकता है। भारत में तेल एलएनजी की आपूर्ति भी बाधित हो सकती है। ऐसे में ईरान का संकट खाड़ी देशों में बढ़ा, तो बड़ी मुश्किल होगी और इससे दुनिया की एक बड़ी आबादी प्रभावित होगी।

70 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा आती है हर साल

खाड़ी समेत पश्चिम एशिया में तकरीबन एक करोड़ भारतीय काम करते हैं, जो हर साल करीब 70 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा भेजते हैं। तनाव की स्थिति में जब भारतीय अर्थव्यवस्था मुश्किल दौर से गुजर रही है तो इस आय से वंचित होना भारत के लिए भारी पड़ सकता है।
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अफगानिस्तान समस्या

दूसरी मुश्किल चाबहार बंदरगाह परियोजना पर होगी जो अफगानिस्तान को सीधे भारत से जोड़ने का एकमात्र जरिया है। भारत को आशंका है कि युद्घ जैसी स्थिति में साथ न मिलने पर ईरान चाबहार मामले में अपने हाथ झटक सकता है।

इससे जहां भारत की अफगानिस्तान में सीधी पहुंच का रास्ता बंद होगा, बल्कि खाड़ी देशों से समुद्र के रास्ते द्विपक्षीय व्यापार में भी बाधा आएगी। जाहिर तौर पर ऐसी स्थिति में खाड़ी देशों से तेल आयात के रास्ते में भी अड़चनें आएंगी।
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