दुनिया के दो बड़े कारोबारी एलन मस्क और मुकेश अंबानी के बीच भारत के सैटेलाइट इंटरनेट बाजार को लेकर चल रही खींचतान के बीच केंद्र सरकार ने अपना रुख साफ कर दिया है। सरकार का कहना है कि भारत में सैटेलाइट संचार सेवाएं देने के लिए सभी कंपनियों का स्वागत है। ग्राहक अपनी जरूरत, कीमत और सेवा की गुणवत्ता के आधार पर तय करेगा कि उसे किस कंपनी की सेवा लेनी है। सरकारी सूत्रों ने कहा, 'ग्राहक ही राजा है।' यह बयान ऐसे समय आया है, जब स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क पहले ही भारत में अपनी कंपनी के रास्ते में रुकावट डालने का आरोप लगाते हुए मुकेश अंबानी पर निशाना साध चुके हैं।
तीन कंपनियों को लाइसेंस, स्टारलिंक सबसे पीछे
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, फिलहाल भारत में तीन कंपनियों को सैटेलाइट संचार सेवाओं के लिए लाइसेंस मिल चुका है। इनमें मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो, सुनील भारती मित्तल समर्थित वनवेब और एलन मस्क की स्टारलिंक शामिल हैं। सूत्रों ने बताया कि इन तीनों कंपनियों में स्टारलिंक ने सबसे आखिर में आवेदन किया और उसे सबसे बाद में लाइसेंस मिला। सरकार ने इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बताया है। साथ ही कहा है कि किसी कंपनी के साथ भेदभाव नहीं किया गया।
स्पेक्ट्रम की नीलामी पर शुरू हुई थी अंबानी-मस्क की जंग
दोनों अरबपतियों के बीच विवाद की बड़ी वजह सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन का तरीका रहा है। अक्तूबर 2024 में यह मामला तब गरमा गया, जब रिलायंस जियो ने भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के सामने सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की नीलामी कराने की मांग रखी। जियो का तर्क था कि सैटेलाइट इंटरनेट कंपनियों और मोबाइल नेटवर्क कंपनियों के बीच बराबरी का मुकाबला होना चाहिए। कंपनी का कहना था कि अगर सैटेलाइट कंपनियों को बिना नीलामी स्पेक्ट्रम मिलता है तो पारंपरिक दूरसंचार कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा में असमानता पैदा हो सकती है।
मस्क ने नीलामी का किया था विरोध
दूसरी तरफ एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक स्पेक्ट्रम के प्रशासनिक आवंटन के पक्ष में थी। मस्क ने एक्स पर एक पोस्ट के जवाब में कहा था कि सैटेलाइट स्पेक्ट्रम को नीलामी के जरिये देना अभूतपूर्व कदम होगा, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीयू) ने लंबे समय से इसे साझा स्पेक्ट्रम के रूप में निर्धारित किया है। उनका तर्क था कि सैटेलाइट स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल साझा तौर पर होता है, इसलिए इसका आवंटन उसी व्यवस्था के तहत होना चाहिए। आखिरकार केंद्र सरकार ने भी नीलामी के बजाय प्रशासनिक तरीके से स्पेक्ट्रम आवंटित करने का रुख अपनाया। इस फैसले को स्टारलिंक के पक्ष में माना गया था।
2025 में दोनों कंपनियों के बीच हुआ था समझौता
दिलचस्प बात यह है कि स्पेक्ट्रम को लेकर तीखी खींचतान के कुछ महीनों बाद मार्च 2025 में रिलायंस जियो और एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने भारत में स्टारलिंक सेवाओं को उपलब्ध कराने के लिए समझौता किया था। इसके तहत जियो के खुदरा स्टोर के जरिये स्टारलिंक के उपकरणों की बिक्री और सेवाओं के वितरण का रास्ता तैयार हुआ। यानी एक तरफ दोनों कंपनियां सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में संभावित प्रतिद्वंद्वी हैं तो दूसरी तरफ उनके बीच कारोबारी साझेदारी की भी गुंजाइश बनी।
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अक्तूबर 2026 में मस्क ने सीधे अंबानी को घेरा
भारत में स्टारलिंक की सेवाएं शुरू होने में हो रही देरी के बीच मस्क ने सात अक्तूबर को एक्स पर एक पोस्ट में आरोप लगाया कि कुछ बड़े कारोबारी समूह भारत में एकाधिकार बनाए रखने के लिए स्टारलिंक का रास्ता रोक रहे हैं। उन्होंने इसे भारतीय लोगों के साथ अन्याय बताया। इसके दो दिन बाद नौ अक्तूबर को मस्क ने सीधे मुकेश अंबानी को निशाने पर लेते हुए उन्हें 'प्रधानमंत्री अंबानी' कहकर संबोधित किया। उन्होंने व्यंग्य करते हुए लिखा कि उन्हें यह समझने में देर हो गई कि भारत का असली बॉस कौन है। मस्क ने अंबानी से सवाल किया कि क्या वह स्टारलिंक को भारत में प्रतिस्पर्धा करने की अनुमति देंगे? इस पोस्ट के जरिये उन्होंने अंबानी पर बाजार में अपना दबदबा बनाए रखने की कोशिश करने का आरोप लगाया।
सरकार ने कहा- सभी को बराबर मौका मिलेगा
मस्क के इन आरोपों के बाद सरकार ने भी साफ किया था कि भारत किसी एक कंपनी का एकाधिकार नहीं चाहता। अब सरकारी सूत्रों ने दोहराया है कि तीनों कंपनियों को समान प्रक्रिया के तहत लाइसेंस दिए गए हैं। सूत्रों के मुताबिक, सुरक्षा से जुड़े जरूरी दस्तावेज जमा करने में वनवेब सबसे आगे रही। इसके बाद जियो और फिर स्टारलिंक ने अपने दस्तावेज सौंपे। तीनों कंपनियों को अपनी तकनीकी क्षमता साबित करने और सुरक्षा संबंधी शर्तें पूरी करनी होंगी।
सेवाएं शुरू होने से पहले दो अहम काम बाकी
भारत में बड़े स्तर पर सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं शुरू होने से पहले अभी दो महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं पूरी होनी हैं। पहली, सैटेलाइट स्पेक्ट्रम के आवंटन और उसकी कीमत को लेकर अंतिम फैसला होना है। दूसरी, तीनों कंपनियों को सुरक्षा संबंधी सभी जरूरी शर्तें पूरी करनी होंगी। सरकारी सूत्रों का कहना है कि इन दोनों प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद कंपनियां बड़े स्तर पर सेवाएं शुरू कर सकेंगी। सरकार का मानना है कि इससे सैटेलाइट संचार के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और ग्राहकों को बेहतर विकल्प मिलेंगे।