भारत को खासतौर पर संयुक्त राष्ट्र में मलयेशिया का रुख बेहद नागवार गुजरा है।
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कश्मीर मामले में पाकिस्तान का साथ देने वाले देशों मलयेशिया, तुर्की और ईरान को झटका देने के लिए भारत बड़ी कूटनीतिक तैयारी कर रहा है। भारत ने खाद्य तेल आयात पर मलयेशिया की जगह इंडोनेशिया को ज्यादा महत्व देने तो तुर्की के खिलाफ अमेरिकी मुहिम को परोक्ष रूप से समर्थ करने का फैसला किया है। वहीं, ईरान के मामले में दोनों देशों के बीच बैकडोर कूटनीतिक चैनल से लगातार बातचीत हो रही है।
भारत को खासतौर पर संयुक्त राष्ट्र में मलयेशिया का रुख बेहद नागवार गुजरा है। सूत्रों का कहना है कि मलयेशिया के इस रुख से दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में तल्खी आ गई है। अब भारत मलयेशिया से आयात कम करने और उसकी जगह इंडोनेशिया को महत्व देने की रणनीति पर काम कर रहा है। गौरतलब है कि भारत मलयेशिया से खाद्य तेल का सबसे बड़ा आयातक है। वर्तमान में भारत प्रति माह 4.33 लाख टन खाद्य तेल का आयात करता है। भारत की रणनीति इस आयात को साल के अंत तक धीरे धीरे न्यूनतम स्तर पर लाने और इसी बीच इंडोनेशिया से नया करार करने की है। तुर्की मामले में भी भारत सख्त रुख अपनाते हुए अमेरिका का परोक्ष साथ देने पर विमर्श कर रहा है।
उलझी है ईरान की गुत्थी
कूटनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि कश्मीर के बहाने ईरान भारत पर अमेरिकी प्रतिबंध मामले में दबाव बनाना चाहता है। यही कारण है कि पाक पीएम के साथ संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने सीधे कश्मीर पर टिप्पणी नहीं की। हालांकि इमरान ने इसी प्रेस कांफ्रेंस में कश्मीर मामले में समर्थन मिलने का दावा किया। दरअसल अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत ने ईरान से तेल आयात करना बंद कर दिया है। इससे ईरान भारत से नाराज है। बहरहाल दोनों देशों के बीच कूटनीतिक चैनल के जरिये लगातार बातचीत हो रही है।