डोकलाम में चीन और भारत के बीच जारी गतिरोध की कूटनीतिक लड़ाई में चीन पिछड़ने लगा है। अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया के खुलकर भारत के पक्ष में आने के बाद जापान ने भी डोकलाम में चीन की यथा स्थिति से छेड़छाड़ की कोशिश को गलत ठहराया है।
चीन के पड़ोसी देश भी डोकलाम में भारतीय सैनिकों की तैनाती के बाद उसकी(चीन) हेकड़ी ढीली होने से राहत महसूस कर रहे हैं। खासकर विएतनाम, फिलीपींस समेत कई देश इस पर लगातार निगाह बनाए हैं। हालांकि रूस ने अपना तटस्थ रवैया बनाए रखा है, लेकिन चीन के ऊपर लगातार डोकलाम में उसकी भूमिका को लेकर वैश्विक दबाव बढ़ता जा रहा है।
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चीन डोकलाम के साथ-साथ दक्षिण चीन सागर में भी लगातार वैश्विक बिरादरी के दबाव में है। अमेरिका ने जहां दक्षिण चीन सागर को लेकर आक्रामक रवैया अपनाया है, वहीं जापान, आस्ट्रेलिया समेत अन्य देशों ने चीन की आलोचना तेज कर दी है।
जापान के साथ आने के बाद भारत ने कहा नहीं हटेगी सेना
जापान के खुलकर साथ आने के बाद भारतीय विदेश मंत्रीलय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने चीन को आईना दिखाया है। चीन ने जहां डोकलाम से भारत की सेना के न हटने पर अगले महीने कार्रवाई की धमकी दी थी, वहीं विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने साफ कहा कि भारत डोकलाम गतिरोध को लेकर चीन से बातचीत जारी रखेगा लेकिन वहां से अपनी सेना पीछे नहीं हटाएगा।
यह पहली बार हुआ जब विदेश मंत्रालय से कहा गया है कि भारत बातचीत और कूटनीतिक प्रयास तो जारी रखेगा लेकिन विवाद के समाधान तक वह डोकलाम से अपनी सेना नहीं हटाएगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के इस बयान को चीन के विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई धमकी का सीधा जवाब माना जा रहा है।
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समझा जा रहा है कि वैश्विक ताकतों के समर्थन तथा कूटनीति के क्षेत्र में रहे सहयोग के कारण भारत ने स्पष्ट तौर पर चीन की धमकी का जवाब दिया है।
अगले महीने ब्रिक्स सम्मेलन में हिस्सा लेने पीएम मोदी जाएंगे चीन
pm modi
दो सितंबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ब्राजील, भारत, चीन, रूस और दक्षिण अफ्रीका देशों के (ब्रिक्स)शिखर सम्मेलन(ब्रिक्स) में हिस्सा लेने का कार्यक्रम है। इस दौरान वहां रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन भी होंगे।
विदेश मंत्रालय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार चीन के श्यामोन शहर में होने वाले इस सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग और राष्ट्रपति पुतिन से प्रधानमंत्री मोदी की द्विपक्षीय चर्चा संभव है। ऐसे में माना जा रहा है कि इस शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चीन जाने से पहले डोकलाम तनाव का हल निकल सकता है।
विएतनाम की घोषणा ने किया परेशान
चीन का पड़ोसी और उससे खराब संबंध रखने वाले विएतनाम ने भारत से ब्रह्मोस सुपर सोनिक मिसाइल का सौदा होने की घोषणा की है। विएतनाम के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ली थी हू हैंग ने इसे अपने देश की आत्मरक्षा से जुड़ा कदम बताया है, जबकि भारतीय रक्षा मंत्रालय अभी इस तरह के किसी सौदे की पुष्टि नहीं कर रहा है।
यह ऐटी शिप सुपरसोनिक क्रूज मिसाइले हैं। अभी तक स्पष्ट नहीं है कि भारत ने कितनी ब्रह्मोस मिसाइल का विएतनाम के साथ सौदा किया है। लेकिन विएतनाम को ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल मिलना चीन के लिए चिंता का सबब है। इसे भी भारत का बड़ा कूटनीतिक हथियार माना जा रहा है।
जापान के समर्थन के मायने
भारत-जापान
- फोटो : ANI
जापान दुनिया में अपनी एक अलग-हैसियत रखता है। अमेरिका और ब्रिटेन के बाद खुलकर जापान के भारत के साथ आने के अपने मायने हैं। जापान और चीन के बीच में गंभीर आर्थिक संबंध है। खाद्य पदार्थों की जापान को आपूर्ति के मामले में भी चीन की बड़ी भूमिका है। इसी तरह से जापान और भारत के भी गहरे रिश्ते हैं।
आर्थिक क्षेत्र में जापान भारत का बड़ा साझीदार देश है। चीन से भी भारत का द्विपक्षीय व्यापार बढ़ा है। इन सबकी परवाह न करते हुए जापान के नई दिल्ली में राजदूत केंजी हीरामत्सू ने भारत के डोकलाम को लेकर जारी प्रयास को सही ठहराया है। राजदूत हीरामत्सू के अनुसार भारत ने भूटान के साथ हुए समझौते के तहत डोकलाम में अपनी सेना भेजने का कदम उठाया है। उन्होंने ताकत के बल पर चीन के यथा स्थिति में बदलाव की कोशिश की निंदा की है।
क्यों किया जापान ने समर्थन
जापान चीन के क्षेत्र विस्तार की नीतियों से चिंतित है। चीन जापान के तटों के निकट तक अपना दावा जताने की कोशिश करता है। 2011-12 में चीन ने इस तरह की कोशिशों को तेज कर दिया था और दक्षिण चीन सागर में अपने दबदबे को बढ़ाने की पहल करते हुए सेंकाकू द्वीप पर यूएवी तथा युद्धपोत भेजे थे।
चीन के इस दबाव से मुक्ति के लिए अपने लड़ाकू विमान भेजने पड़े थे। इतना ही नहीं दक्षिण चीन सागर में यथास्थिति बहाल करने के लिए उसने जनवरी 2012 में भारत से भी सहायता मांगी थी। मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि भारत ने जापान की चिंता को समझते हुए दक्षिम चीन सागर में भयरहित स्वतंत्र नौवहन का पक्ष लिया था। नई दिल्ली दक्षिण चीन सागर को लेकर लगातार इस नीति पर कायम है।