सूत्रों के मुताबिक अगस्त में गठित जलवायु परिवर्तन पर अंतर मंत्रालयी समूह में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय और आर्थिक मामलों के विभाग सहित सभी संबंधित मंत्रालयों और विभागों के सदस्य शामिल हैं।
वैश्विक जलवायु के प्रति भारत कितना सजग है कि इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत ने वैश्विक जलवायु कार्यों में तेजी लाने के लिए अंतर मंत्रालयी समूह का गठन किया है। समूह पांच मुद्दों शमन, अनुकूलन, हानि और क्षति, जलवायु वित्त और पेरिस समझौते पर चर्चा करेगा। विस्तृत चर्चा करने के लिए प्रत्येक विषय के लिए एक-एक पांच उप-समूह बनाए गए हैं। सूत्रों ने मुताबिक, प्रत्येक उप-समूह में संयुक्त सचिव स्तर के पांच से छह अधिकारी हैं।
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सूत्रों के मुताबिक अगस्त में गठित जलवायु परिवर्तन पर अंतर मंत्रालयी समूह में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय और आर्थिक मामलों के विभाग सहित सभी संबंधित मंत्रालयों और विभागों के सदस्य शामिल हैं। दिसंबर में दुबई में वार्षिक संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ता (COP28) में देश इस बात पर आम सहमति बनाने का प्रयास करेंगे कि किसे योगदान देना चाहिए और हानि और क्षति निधि के लाभ प्राप्त करने के लिए पात्र होना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) की एक प्रस्तुति में भारत ने कहा कि फंड तक पहुंच के लिए पात्रता मानदंड स्थापित करने के लिए अत्यधिक उत्सर्जन करने वाले देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी को स्वीकार करना चाहिए और उन देशों को उचित मुआवजा प्रदान करें जो अभी भी उनके उचित हिस्से के भीतर हैं। वित्त के संबंध में सूत्रों ने कहा कि अंतर-मंत्रालयी समूह वित्त पर स्थायी समिति (एससीएफ) से संबंधित मामलों पर विचार-विमर्श कर रहा है। भारत जलवायु वित्त की परिभाषा में स्पष्टता की मांग करने और इस तरह के वित्त के वितरण में पैमाने, दायरे और गति के महत्व पर जोर देने में अग्रणी रहा है।