देश का सबसे हल्का टैंक जोरावर (Zorawar Tank) भारतीय सेना के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है। उम्मीद जताई जा रही हैं कि अगर इसके सभी परीक्षण सफल हुए तो जोरावर को 2027 तक सेना में शामिल किया जा सकता है। डीआरडीओ का भी कहना है कि इस टैंक को भारतीय सेना का तमाम जरूरतों को देखते हुए डिजाइन किया गया है। डीआरडीओ ने इस हल्के टैंक को हाई एल्टीट्यूड इलाकों में चीन से चल रहे गतिरोध को देखते हुए रिकॉर्ड दो साल में तैयार किया है। वहीं ऊबड़-खाबड़ इलाकों और पहाड़ों पर चलने लायक बनाने के लिए डीआरडीओ ने इसमें कुछ नए खास फीचर शामिल किए हैं।
टैंक में एडवांस रबर ट्रैक सिस्टम
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने हाल ही में जोरावर लाइट वेट टैंक की पहली बार झलक दिखाई, जिसे लार्सन एंड टूब्रो के साथ मिल कर तैयार किया गया है। जोरावर टैंक ने फिलहाल गुजरात के हजीरा में एलएंडटी के हैवी इंजीनियरिंग प्लांट में शुरुआती ट्रायल्स सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं। सूत्रों ने बताया कि 25 टन के वजन वाले जोरावर टैंक में एक खास ट्रैक सिस्टम लगाया गया है। जोरावर टैंक में एडवांस रबर ट्रैक सिस्टम (कम्पोजिट रबर ट्रैक्स) लगाया है। अभी तक टैंकों में स्टील ट्रैक लगाए जाते थे, जो उन्हें न केवल वजनी बनाता है, बल्कि रफ्तार पर भी असर पड़ता था। इससे पहले मेन बैटल टैंक अर्जुन Mk1A भी ट्रायल के तौर पर डिटैचेबल रबर पैड लगाए गए थे।
ठंडे इलाकों में रबड़ कारगर
सूत्रों के मुताबिक जोरावर टैंक को खास हाई एल्टीट्यूड वाले इलाकों में ऑपरेशंस के लिए डिजाइन किया गया है। विशेष रूप से खड़ी पहाड़ियों पर चढ़ने और आसानी से नदी पार करने लिए हल्के टैंक की जरूरत थी, जो चीन के ZTQ टी-15 लाइट टैंक का मुकाबला कर सके। जिसे चीन ने अपने कब्जे वाले तिब्बत से सटे पूर्वी लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश बॉर्डर पर तैनात किया है। वहीं, लद्दाख में जोरावर टैंक की तैनाती बेहद अहम है, क्योंकि इस इलाके को ठंडे रेगिस्तान के नाम से भी जाना जाता है। वहीं, टैंक में लगाया गया खास रबर ट्रैक सिस्टम इस इलाके की ठंडी कठोर जमीन के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है।
रबड़ ट्रैक से वजन हुआ कम
वहीं टैंक में स्टील ट्रैक की जगह रबर ट्रैक सिस्टम का लगाने का एक फायदा यह होगा कि इससे उसकी ईंधन खपत करने की क्षमता में सुधार होगा, जो कम ईंधन खपत करेगा। इसके अलावा स्टील ट्रैक के मुकाबले रबर ट्रैक से बर्फ, गंदगी या कीचड़ बड़ी आसानी से साफ हो जाती है। जबकि स्टील ट्रैक में उसे साफ करने में दिक्कत होती थी। लद्दाख जैसे चुनौतीपूर्ण इलाकों में यह बड़ी समस्या है। इसके अलावा, रबर ट्रैक सिस्टम स्टील ट्रैक की तुलना में काफी हल्का है। स्टील ट्रैक की बजाय रबर ट्रैक इस्तेमाल करने से वजन लगग 50 फीसदी तक कम हुआ है। वहीं, वजन में कमी से न केवल टैंक की परफॉरमेंस बढ़ती है, बल्कि इसकी ऑपरेशनल रेंज और ट्रांसपोर्टेशन में भी सुधार होता है।
शोर और वाइब्रेशन में आएगी कमी
सूत्रों ने बताया कि रबर ट्रैक का एक बड़ा फायदा यह भी है कि यह स्टील ट्रैक के मुकाबले कम शोर करता है। शोर में लगभग 13 डेसिबल तक की कमी आती है, जिससे मूवमेंट के दौरान दुश्मन को टैंक से होने वाले शोर का पता नहीं चलता। वहीं अंदर बैठा हुए चालक दल के सदस्यों को भी शोर में 6 डेसिबल की कमी आती है, जिससे उन्हें काम करने में आसानी होती और शोर से उत्पन्न होने वाला तनाव कम होता है। इसके अलावा रबर होने से टैंक में वाइब्रेशन भी कम होता है। वाइब्रेशन में 60-70 फीसदी की कमी का मतलब है कि चालक दल बिना थके लंबे समय तक टैंक ऑपरेट कर सकता है। यह एक बड़ा सुधार है, क्योंकि इससे लंबे मिशनों में ऑपरेशन के दौरान चालक दल की सहनशीलता बढ़ती है।
वहीं, जोरावर टैंक 20 डिग्री के झुकाव को आसानी से पार कर सकता है। इस टैंक को 30 डिग्री से ज्यादा के झुकाव को संभालने के लिए डिजाइन किया गया है। वहीं, अगले चरण में भारतीय सेना के साथ मिल कर इसका कठोर रेगिस्तानी ट्रायल किए जाएंगे। जिसके बाद चुनौतीपूर्ण इलाकों और अत्यधिक बर्फीली जगहों जैसे लद्दाख के उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ट्रायल किए जाएंगे। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे संघर्ष से सीख लेते हुए जोरावर टैंक में मानवरहित सतह वाहन (यूएसवी) लगाए गए हैं, जो उड़ान भरने वाले हथियारों से लैस हैं।
बनाई जाएंगी छह रेजिमेंट
शुरुआत में भारतीय सेना को 59 जोरावर टैंक दिए जाएंगे। बाद में 295 अतिरिक्त टैंक खरीदे जाएंगे। जोरावर में 105-मिमी राइफल गन और मल्टी-रेंजिंग सेंसर (MRS) से लैस है। इसमें एक बेल रिमोट वेपन स्टेशन (RWS) और सफरन पासेओ ऑप्टिक्स के साथ-साथ दो एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) भी शामिल हैं। टैंक में एक नई लाइट वेट राइफल (LWR), एक एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम (APS) और एड-ऑन मॉड्यूलर आर्मर ब्लॉक भी है। इसमें कैमरे भी लगाए गए हैं। जोरावर टैंक को सेना के प्रोजेक्ट जोरावर के तहत डेवलप किया गया है। सेना ने चरणों में लगभग 350 हल्के टैंक हासिल करने की योजना बनाई है, जिससे इसकी माउंटेन वारफेयर क्षमताओं को बढ़ाने के लिए इसकी लगभग छह रेजिमेंट बनाई जा सकेंगी।
जर्मन की बजाय अमेरिकी इंजन लगाया
लद्दाख में चीन के साथ गतिरोध के दौरान, सेना ने पैदल सेना के लड़ाकू वाहनों के साथ अपने भारी टी-90 और टी-72 टैंकों को तैनात किया था। रूसी मूल के इन टैंकों का वजन 40 से 50 टन के बीच है, जबकि लेटेस्ट अर्जुन टैंक का वजन 68.5 टन है। हालांकि, यह भारी टैंक पहाड़ी इलाकों के लिए उपयुक्त नहीं हैं। खास बात यह है कि जोरावर में अमेरिकी इंजन लगा है। शुरुआत में, इसे MTU जर्मनी से जर्मन इंजन का उपयोग करने के लिए तैयार किया गया था, लेकिन जर्मन सरकार ने निर्यात लाइसेंस वापस ले लिया, जिसके कारण इस परियोजना में लगभग एक साल की देरी हुई। जिसके बाद DRDO ने प्रोटोटाइप स्टेज के लिए अमेरिकी कमिंस 750 hp इंजन को चुना विकल्प चुना। हालांकि बाद में जर्मनी ने मंजूरी दे दी, लेकिन फिर भी भविष्य में निर्यात प्रतिबंधों की चुनौतियों को देखते हुए अमेरिकी कमिंस इंजन के साथ जाने का फैसला किया गया। इससे पहले, भारत के अर्जुन मार्क 1A टैंक प्रोजेक्ट में भी जर्मनी ने इंजन देने में देरी की थी।