पीएम मोदी और इंदिरा गांधी
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को राजस्थान के सीकर में एक जनसभा को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने विपक्षी गठबंधन पर जमकर निशाना साधा। विपक्षी गठबंधन के नए नाम 'INDIA' पर भी प्रधानमंत्री बरसे। उन्होंने दशकों पुराने नारे 'इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया' का जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि नए गठबंधन का हश्र भी इस नारे जैसा ही होगा।
आखिर 'इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया' का नारा कब दिया गया था? पहली बार इसका जिक्र किसने किया था? क्या नारा देने के पीछे कोई वजह थी? नारे का असर क्या हुआ? आइये जानते हैं...
पीएम मोदी
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'इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया' की चर्चा अभी क्यों?
हाल में विपक्ष ने अपने नए गठबंधन को इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस (INDIA) नाम दिया है। विपक्ष के नामकरण के बाद से ही यह नाम भाजपा के निशाने पर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर भाजपा से सभी बड़े नेता इस नाम की लगातार आलोचना कर रहे हैं। इसी कड़ी में बुधवार को सीकर में प्रधानमंत्री ने कहा कि इन लोगों में अहंकार कूट-कूट कर भरा है। एक बार इन्होंने नारा दिया था इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया। तब देश की जनता ने इनका हिसाब चुकता किया था, इन्हें उखाड़ फेंका था। अब फिर इन लोगों ने वही पाप दोहराया है। ये कह रहे हैं UPA इज इंडिया, इंडिया इज UPA, इनका जनता फिर से वही हाल करेगी जो पहले किया था।
इंदिरा गांधी के साथ डीके बरुआ
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'इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया' का नारा कब दिया गया था?
पीएम मोदी ने आज जिस 'इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया' नारे का जिक्र किया है वो लगभग पांच दशक पुराना है। इसे 1975 में लगे आपातकाल से पहले कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने यह नारा दिया था।।
बरुआ असम से आते थे। वह 1971 से 1973 तक बिहार के राज्यपाल भी रहे थे। बरुआ अपने 'इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया' के नारे के लिए जाने जाते हैं। हालांकि, उनके विरोधियों द्वारा इसे इन्दिरा गांधी की चापलूसी भरी तारीफ के रूप में देखा जाता है।
इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि
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कैसे आया 'इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया' का नारा?
दरअसल, 'इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया' नारे के पीछे भी एक कहानी है। कहानी 1971 से शुरू होती है। ये चुनावी साल था। देश में लोकसभा चुनाव हुए। पाकिस्तान के साथ युद्ध में जीत की पृष्ठभूमि में हुए इन चुनावों में कांग्रेस फिर से जीतकर सत्ता में आई। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने प्रतिद्वंदी राजनारायण को रायबरेली सीट पर शिकस्त दी। इंदिरा को 1,83,309 (66.35%) वोट हासिल हुए, जबकि राजनारायण को 71,499 (25.88%) वोट मिले। यानी, इंदिरा 1,11,810 मतों से चुनाव जीत गईं।
अपनी हार को राज नारायण ने स्वीकार नहीं किया और उन्होंने नतीजों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी। 12 जून, 1975 को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया। राजनारायण की दलील थी कि इन्दिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया, तय सीमा से अधिक पैसा खर्च किया और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया था।
सुप्रीम कोर्ट
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हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं इंदिरा
इंदिरा ने भी यहां हार नहीं मानी और इलाहाबाद हाईकोर्ट के खिलाफ वह सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गईं। 23 जून को सुप्रीम कोर्ट में उनकी याचिका पर सुनवाई शुरू हुई। अगले दिन जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर सशर्त रोक लगा दी। अदालत ने कहा कि इंदिरा गांधी संसद में उपस्थित हो सकती हैं लेकिन जब तक उनकी याचिका पर फैसला नहीं हो जाता, वह संसद में होने वाले मतदान में हिस्सा नहीं ले सकतीं। तब कहा गया कि प्रधानमंत्री को व्यक्तिगत हित में और देश के हित में इस्तीफा दे देना चाहिए।
अब तक कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेता भी सोचने लगे थे कि इंदिरा गांधी का इस्तीफा जरूरी है। अगर वह संसद में मतदान ही नहीं कर सकतीं तो वह प्रभावशाली ढंग से सरकार का नेतृत्व कैसे करेंगी? उन्हें सलाह दी गई कि जब तक सुप्रीम कोर्ट उन्हें आरोपमुक्त नहीं कर देता, तब तक वे तात्कालिक तौर पर इस्तीफा देकर अपने किसी मंत्री को प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंप दें। रामचंद्र गुहा की किताब इंडिया आफ्टर नेहरू में बताया गया है कि प्रधानमंत्री पद के लिए स्वर्ण सिंह का नाम सुझाया गया था, जो एक गैर-विवादास्पद नेता थे। कहा जाता है कि उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद इंदिरा गांधी को सौंपकर खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते थे।
इंदिरा, संजय
बरुआ के सुझाव के खिलाफ थे संजय गांधी और सिद्धार्थ सशंकर रे जैसे नेता
उधर, इंदिरा के कई नजदीकी उन्हें सलाह दे रहे थे कि प्रधानमंत्री को इस्तीफा नहीं देना चाहिए। यह सलाह देने वालों में से उनके बेटे संजय गांधी, हरियाणा के मुख्यमंत्री, बंसीलाल और बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे का नाम अहम था। इंदिरा ने इन नेताओं की सलाह मान ली। 25 जून को सिद्धार्थ शंकर रे ने मुल्क में 'आंतरिक आपातकाल लगाने के लिए एक अध्यादेश का मसौदा तैयार किया। अध्यादेश को राष्ट्रपति के सामने पेश किया गया और आनन-फानन में इस पर दस्तखत करवा लिए गए। 25-26 जून की आधी रात को देश में आपातकाल लागू हो गया। आपातकाल लगने के इसी दौर में देवकांत बरुआ ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ नारा दिया। पूरे आपातकाल के दौरान यह नारा बुलंद रहा। कई लोग कहते हैं कि बरुआ ने यह नारा अपने सुझाव की वजह से हुए नुकसान के डैमेज कंट्रोल के लिए दिया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
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प्रधानमंत्री ने नारे में हश्र का जिक्र किया, वो क्या था?
देश में करीब पौने दो साल तक आपातकाल लगा रहा। इसके बाद चुनावों का एलान हुआ। इस चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह हार मिली। देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी। लोगों ने इंडिया इज इंदिरा… नारे को पूरी तरह से खारिज कर दिया।