सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि भारत अब केवल अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्रों की बराबरी करने की कोशिश नहीं कर रहा, बल्कि वह इसे एक नए रूप में गढ़ने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत तेजी से बदलते और बहुध्रुवीय वैश्विक कानूनी व्यवस्था में मध्यस्थता और सुलह की प्रक्रियाओं को फिर से परिभाषित कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि भारत अब केवल स्थापित मध्यस्थता केंद्रों की बराबरी करने की कोशिश नहीं कर रहा, बल्कि यह सोचने और गढ़ने में जुटा है कि एक बहुध्रुवीय और गतिशील वैश्विक कानूनी व्यवस्था में मध्यस्थता और सुलह कैसी होनी चाहिए। स्वीडन के गोथेनबर्ग में 10 जुलाई को हुए एक राउंडटेबल कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि भारत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में अब सिर्फ भागीदार नहीं, बल्कि एक 'थॉट लीडर' बनकर उभर रहा है।
'देश में बन रहा मजबूत और भरोसेमंद मध्यस्थता तंत्र'
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि भारत में अब मध्यस्थता को वैकल्पिक नहीं, बल्कि मुख्य विवाद समाधान प्रणाली के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने बताया कि कानूनी सुधारों, संस्थागत मजबूती और न्यायपालिका के सक्रिय सहयोग से देश में एक मजबूत और भरोसेमंद मध्यस्थता तंत्र बन रहा है।
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उन्होंने यह भी कहा कि भारत को अभी कुछ बड़ी चुनौतियों का सामना करना है, खासकर मध्यस्थता के निर्णयों को लागू करने की प्रक्रिया में आने वाली अड़चनों को दूर करना जरूरी है। इसके अलावा, संस्थानों को और मजबूत करने और कानूनी पेशेवरों को प्रशिक्षित करने के लिए दीर्घकालिक निवेश की आवश्यकता है।
'संस्थागत विकास के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी जरूरी'
इस दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) को संस्थागत विकास के लिए जरूरी बताया और कहा कि 'मेक इन इंडिया' व 'इनवेस्ट इंडिया' जैसी पहलें भी इस दिशा में भारत की स्थिति मजबूत कर सकती हैं। जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी कहा कि अब समय आ गया है कि मध्यस्थता और सुलह को वैकल्पिक न मानकर स्वतंत्र न्यायिक रास्तों के रूप में देखा जाए।