लगभग 200 सालों के अपने राज में अंग्रेजों ने भारत को बेहिसाब दर्द दिए, जो देश कभी सोने की चिड़िया कहलाता था उसे ऐसी स्थिति पर लाकर खड़ा कर दिया कि अब यहां की अर्थव्यवस्था को ठीक-ठीक बनाए रखने के लिए भी कर्ज लेने की नौबत आ जाती है। अंग्रेज भारत से 45 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 3,19,29,75,00,00,00,000.50 रुपये) की संपत्ती लूटकर ले गए, ये 1765 से 1938 के बीच हुई घटनाओं के आधार पर डेटा है। आजादी के शुरुआती दौर में जिस देश को बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए तरसना पड़ता था, आज वह मेडिकल टूरिज्म के तौर पर उभरा है। तमाम देशों से लोग इलाज कराने के लिए भारत आ रहे हैं। भारत का मेडिकल टूरिज्म कारोबर वैश्विक बाजार का 18 प्रतिशत है।
जब लोग अपनी चिकित्सा या उपचार के लिए किसी अन्य देश की ओर जाते हैं तो यह चिकित्सा पर्यटन या मेडिकल टूरिज्म कहलाता है। कुछ दशकों पहले अविकसित और निम्न विकसित देश के बाशिंदें उच्च विकसित देश जाते थे, लेकिन हाल ही के वर्षों में तो उच्च विकसित देशों के नागरिक सस्ते, लेकिन गुणवत्तापूर्ण इलाज के लिए तीसरी दुनिया के देशों की यात्रा करने लगे हैं। एशियाई देशों में भारत लोगों का पसंदीदा देश माना जाता है। भारत में इलाज सस्ता और आधुनिकतम है। यहां चिकित्सा तकनीकों और उपकरणों की उपलब्धता के साथ ही विदेशियों को भाषा की समस्या नहीं होती है। यहां आमतौर पर अंग्रेजी समसझने वाले लोग मिल जाते हैं या अन्य भाषाओं के लोगों की सेवाएं भी यहां आसानी से उपलब्ध हैं। अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और म्यांमार के अलावा यूरोप के कई देशों और अमेरिका से भी मरीज यहां आते हैं। कई देशों के लिए वीजा ऑन अराइवल की सुविधा है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन
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आजादी के समय देश में चिकित्सा सुविधाओं की हालत दयनीय थी। प्लेग, चेचक, मलेरिया, कॉलेरा जैसी बीमारियां, महामारी बनकर हजारों जिंदगियां लील जाती थी। 1947 में हालत यह थी कि लोगों की औसत संभावित उम्र सिर्फ 32 वर्ष ही थी, जो 60 के दशक तक 42 हुई और आज बढ़कर 70 हो चुकी है। वर्ल्डोमीटर की माने तो 69.2 साल जीते हैं तो महिलाओं की औसत उम्र 71.8 साल है।
मातृ मृत्यु अनुपात दर में 7.4 प्रतिशत की गिरावट, शिशु मृत्यु दर के आंकडें भी सुधरे
जुलाई 2020 में पेश किए गए स्वास्थय मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2015-17 में मातृ मृत्यु अनुपात दर 122 थी जो 2016-18 में घटकर 113 हो गयी यानी इसमें 7.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। देश में 2011-13 से मातृ मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी देखी गई है। उस अवधि में यह दर 167 थी जो 2014-2016 में कम होकर 130, 2015-17 में 122 और 2016-18 में 113 हो गई।
एनएचएम के तहत जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम और जननी सुरक्षा जैसी योजनाएं और प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान और लक्ष्य जैसी नई पहलों का इस सफलता के पीछे बड़ा हाथ है। भारत सरकार ने प्रसव बाद और पूर्व की देखभाल के लिए मिडवाइफ की व्यवस्था करने के साथ ही सुमन कार्यक्रम को लागू करने की भी योजना बनाई है ताकि प्रसूताओं और नवजात शिशुओं के लिए मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण सेवाओं की व्यापक पहुंच हो सके, इसमें ऐसी सेवाओं की अनुपलब्धता पूरी तरह से खत्म करने के साथ ही सम्मानजनक मातृत्व देखभाल सुनिश्चित किया जाना शामिल है।
साल 2019 के वैश्विक स्वास्थ्य सूचकांक की बात करें तो कुल 195 देशों में भारत का स्थान 57वें नंबर पर है। इस सूची में केवल 13 देश है जो शीर्ष पर हैं। वैश्विक स्वास्थ्य सूचकांक के मुताबिक स्वास्थ्य सुविधाओं में पहले नंबर पर अमेरिका आता है। ये सूचकांक स्वास्थ्य स्थितियों को रोकने और उनका निराकरण करने के लिए हर देश की क्षमता का आंकलन करता है।
- 2018 मेडिकल जर्नल लैंसेट के एक अध्ययन के मुताबिक, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता के मामले में भारत विश्व के 195 देशों में 145वें पायदान पर है।
- इस शोध का सबसे चौंकाने वाला पक्ष यह है कि भारत 195 देशों की सूची में अपने पड़ोसी देश चीन, बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान से भी पीछे है।
- भारत की ओर से स्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी का 1.15 फीसदी हिस्सा ही खर्च किया जाता है जबकि वैश्विक स्तर इसे छह फीसदी माना गया है।
- नई स्वास्थ्य नीति में सरकार ने साल 2020-21 के बजट में सरकार ने स्वास्थ्य के लिए 69,000 करोड़ रुपये रखा।
- ब्रिटेन ने साल 2020-21 के लिए अपना स्वास्थ्य बजट 129 बिलियन यूरो यानि कि 11,362 करोड़ से ज्यादा रखा है।
- चीन ने साल 2019-20 में स्वास्थ्य बजट के लिए 1.46 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया था।
- ब्राजील स्वास्थ्य सेवाओं पर 46 फीसदी, चीन 56 फीसदी, इंडोनेशिया 39 फीसदी, अमेरिका 48 फीसदी और ब्रिटेन 83 फीसदी खर्च करते हैं।
- ध्यान देने की बात यह है कि इन देशों में प्रति व्यक्ति आय दर भी भारत के मुकाबले कहीं ज्यादा है।