मतदान के अधिकार का इस्तेमाल कर के जनता शासन-व्यवस्था में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करती है। लोकतान्त्रिक प्रणाली में मतदान को एक पर्व माना जाता है जिससे देश की बागड़ोर काबिल हाथों में जनता सौंपती है। लेकिन संविधान की इसी व्यवस्था से अगर देश की जनता का विश्वास हिल जाये तो लोग अपने अधिकार के तरफ उदासीन हो जाते हैं। कुछ दशक पहले कम मतदान की समस्या आम थी और इस वजह से सुदृढ़ सरकार भी चुन कर नहीं आ पाती थी। लेकिन 2014 से 2018 तक के आंकड़े एक बेहतर तस्वीर पेश कर रहे हैं जिसके मुताबिक देश में मतदाताओं की संख्या में काफी इजाफा हुआ है।
साल 2014 में हुए आम चुनाव से लेकर 2018 तक में हुए राज्य के विधानसभा चुनाव में निर्वाचन आयोग ने मतदाताओं के पंजीकरण में काफी बढ़ोत्तरी दर्ज की है। इन चार सालों में पुरूष मतदाता में 7.05% की वद्धि और महिला मतदाता में 8.61% की वृद्धि दर्ज की गई है। इस हिसाब से पुरूष और महिला मतदाता को मिला कर औसतन 7.79% की बढ़ोत्तरी हुई है जो एक बड़ा सकारात्मक नतीजा है। जिस देश में जितने ही अधिक नागरिकों को मताधिकार है उस देश को उतना ही अधिक जनतांत्रिक समझा जाता है। इस प्रकार हमारा देश संसार के जनतांत्रिक देशों में सबसे बड़ा है क्योंकि हमारे यहाँ मताधिकार प्राप्त नागरिकों की संख्या विश्व में सबसे बड़ी है।
2014 में पुरूषों की जनसंख्या 42.66% थी और महिलाओं की जनसंख्या 38.77% थी जिसकी कुल संख्या 81.44% थी। 2015 में महिलाओं की संख्या बेहतर हुई और 38.77% से 40.50 % हो गई जबकि पुरूषों की संख्या में भी हल्का सुधार हुआ और आंकड़ा 44.43% तक पहुंचा । 2015 में मतदाताओं की कुल संख्या 84.93% से 2016 में 85.58% हो गई जिसमें पुरूष 44.69% और महिला 40.89% के आंकड़े को छूने लगे।
2017 और 2018 में ज्यादा से ज्यादा लोगों मतदाता सूची में शामिल करने के लिए कई विशेष कार्यक्रम चलाये गये जिसकी वजह से कुल जनसंख्या में एक साल में 1.10 % का इजाफा हुआ। 2017 में कुल मतदाता सूची की कुल जनसंख्या 86.69% थी जो 2018 में 87.79% हो गई। पुरूषों की संख्या 2017 में 45.20% से बढ़कर 2018 में 45.67% तक पहुंच गई जबकि महिलाओं में काफी ज्यादा 41.49% से बढ़ कर 42.11% तक हो गई।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद (आर्टिकल) 325 व 326 के अनुसार प्रत्येक वयस्क् नागरिक को, जो पागल या अपराधी न हो, मताधिकार प्राप्त है। लेकिन उदासीनता की वजह से कई लोग अपना पंजीकरण नही कराते थे इसके अलावा सूची में गड़बड़ियों की वजह से भी लोग वोटर कार्ड से वंचित रह चाते थे। निर्वाचन आयोग ने कई करह की जागरूकता अभियान और कार्यक्रम चला कर मतदान पहचान पत्र बनाने के लिए लोगों को प्रेरित किया जिसकी वजह से आंकड़ें इतने बेहतर हुए हैं।