प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के अपने सम्बोधन में बेहद साधे और संतुलित अंदाज में भारत की विकास यात्रा और युद्ध नहीं बुद्ध की बात करके विश्व की उन सभी शक्तियों को आइना दिखा दिया है, जो विश्व के विभिन्न इलाकों में युद्ध की परिस्थितियां पैदा करने की कोशिश में हैं। उन्होंने आम चुनावों में अपनी सरकार को मिले ज्यादा बड़े जनादेश को भारतीय लोकतंत्र में जनता के प्रति जवाबदेही और सरकार की लोक कल्याणकारी नीतियों का परिणाम बताया।
एक कुशल विश्व राजनेता की तरह प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में किसी देश का नाम लिए बिना, उन्होंने अमेरिका-ईरान संकट, पश्चिम एशिया की अशांति, चीन-अमेरिका व्यापार युद्ध समेत टकराव के सभी मुद्दों की जगह विश्व शांति परस्पर सद्भाव सहअस्तित्व के साथ विश्व के विकास और समृद्धि की ओर साथ-साथ बढ़ने का आह्वान विश्व जनमत से किया।
प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवाद को वैश्विक समस्या और चुनौती बताते हुए पूरी दुनिया से इसके खिलाफ खड़े होने और मिलकर इसे खत्म करने की अपील की। उन्होंने पाकिस्तान का नाम न लेकर एक तरह से उसे महत्व न देने का भारत का इरादा भी स्पष्ट किया। उन्होंने आतंकवाद को संयुक्त राष्ट्र के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ बताकर पूरे विश्व को इसके खिलाफ एकजुट होने पर बल दिया और इस मामले में अलग-अलग राय को सही नहीं बताया।
अपने इस बयान से उन्होंने आतंकवाद खासकर भारत में सीमापार से होने वाले आतंकवाद के प्रति नरम और दोहरा रूख रखने वाले चीन और अमेरिका को भी बिना नाम लिए नसीहत दी। कश्मीर का जिक्र न करके प्रधानमंत्री ने दुनिया को जता दिया कि ये पूरी तरह भारत का आंतरिक मामला है। हिंदी में बोलते हुए मोदी ने तीन हजार साल पहले तमिल कवि के कथन को उद्धृत करके भाषा की घरेलू राजनीति को भी साधा है।
स्वामी विवेकानंद से प्रधानमंत्री स्वयं प्रभावित रहे हैं और गांधी जी की 150वीं जयंती का जिक्र करके उन्होंने जीव में शिव देखने की विश्व कल्याण की भारत की अवधारणा को मजबूत किया। कुल मिलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेहद संतुलित तरीके से बेहद गंभीर और सारगर्भिता का संदेश पूरी दुनिया को दिया है।