पिछले 26 साल के दौरान सड़क हादसों में विकलांग और मरने वाले लोगों की संख्या में 65 फीसदी बढ़ोतरी हुई है। सरकार की तरफ से एक रिपोर्ट में वर्ष 2016 के सड़क हादसों की तुलना साल 1990 से की गई है।
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इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर), पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएचएफआई) और इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवेल्युएशन की तरफ से तैयार इस रिपोर्ट के अनुसार साल 1990 के बाद से अधिकतर राज्यों में लोगों के बीमार होने का मामलों में सड़क दुर्घटनाओं की हिस्सेदारी बढ़ गई।
रिपोर्ट के अनुसार दुर्घटनाओं में घायल होने की वजह से बीमारी का शिकार होने वालों में सबसे अधिक युवा शामिल हैं। इसे साल 2016 में अस्वस्थता के कारणों में 10वें स्थान पर रखा गया था। अध्ययन में कहा गया कि भारत के लोगों के घायल होने के मामले में सड़क हादसे और आत्महत्या से खुद को नुकसान पहुंचाने के मामलों का बड़ा योगदान है।
साल 2016 में भारत के राज्यों में रोगों के बोझ या विकलांगता से जुड़े जीवन वर्ष (डीएलएवाई) की रेंज सड़क दुर्घटनाओं के मामले में तीन गुना तक बढ़ गई। खुद को नुकसान पहुंचाने के मामले में यह छह गुना हो गई। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2016 में 1990 की तुलना में सड़क दुर्घटनाओं से डीएएलवाई का स्तर 65 फीसदी तक अधिक रहा।
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बीमारियों के बोझ को व्यक्त करता डीएएलवाई
रोग या विकलांगता से जुड़े जीवन वर्ष (डीएलएवाई) एक मानक है जो बीमारी, विकलांगता के कारण या असमय हुई मौत के सालाना आंकडे़ को दर्शाता है। सड़क हादसों में घायल होने संबंधी डीएएलवाई दर जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब में सबसे अधिक है।
इसके बाद राजस्थान और उत्तर प्रदेश का नंबर आता है। सबसे कम डीएएलवाई दर मेघालय की है।