जम्मू-कश्मीर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। राज्य में आतंकवाद की ताबूत में कील ठोक कर प्रधानमंत्री की इच्छा विकास की बहार लाने की है। पिछले छह साल में जम्मू-कश्मीर को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने कई प्रयोग किए हैं। अनुच्छेद 370 की समाप्ति, राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में तब्दील करना और लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा देना मोदी सरकार-2 का ऐतिहासिक कदम रहा है। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जम्मू-कश्मीर में विकास की बुनियाद रखना चाहते हैं। माना जा रहा है कि उपराज्यपाल गिरीश चंद्र मुर्मू की जगह मनोज सिन्हा को जिम्मेदारी देना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
ब्यूरोक्रेट मुर्मू के स्थान पर क्यों लाए गए टेक्नोक्रेट मनोज सिन्हा
मनोज सिन्हा मोदी-1 सरकार में रेल राज्यमंत्री थे, लेकिन गाजीपुर तक सुहेल देव एक्सप्रेस को ले जाने की कसरत केवल रेलवे बोर्ड के अधिकारी बता सकते हैं। इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव-2019 मनोज सिन्हा हार गए तो चर्चा दिल्ली तक हुई। कारण, अपने क्षेत्र में विकास की गंगा बहाने वाले थे। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र बनारस को लेकर सिन्हा बहुत संवेदनशील रहे हैं। सिन्हा टेक्नोक्रेट के साथ-साथ खांटी राजनीतिज्ञ हैं।
वह भूमिहार समाज से आते हैं। विनम्रता कूट-कूटकर भरी है तो अधिकारियों, ब्यूरोक्रेट से काम कराना बखूबी आता है। वह केवल आवश्यकता की डिजाइन तैयार करने में दिलचस्पी लेते हैं और उसका क्रियान्वयन विभागों से कराने की कला में माहिर हैं। सिन्हा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से राजनीति का गुर सीखे हैं और संभवत: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कुछ ऐसे ही फ्रेम में जम्मू-कश्मीर का उपराज्यपाल चाहिए।
प्रशासनिक कला में दक्ष हैं गिरीश चंद्र मुर्मू
1985 बैच, गुजरात कॉडर के आईएएस अधिकारी गिरीश चंद्र मुर्मू प्रशासनिक कला में दक्ष हैं। जब प्रधानमंत्री गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो मुर्मू उनके प्रमुख सचिव थे। प्रधानमंत्री मुर्मू से से भलीभांति परिचित हैं। इससे पहले प्रवर्तन निदेशालय के निदेशक भी रहे हैं। मुर्मू बर्मिंघम विश्वविद्यालय से एमबीए हैं। प्रबंधन कला भी अच्छी आती है।
पिछले साल जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल सत्यपाल मलिक को गोवा का राज्य बनाने के बाद 31 अक्टूबर को गिरीश चंद्र मुर्मू गोवा के उपराज्यपाल बनाए गए थे। पांच अगस्त को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति, राज्य को केंद्र शासित प्रदेश में बदलने और लद्दाख को इससे अलग करने का कदम उठाया था।
ऐसे में मुर्मू को बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई थी। समझा जा रहा है कि गिरीश चंद्र मुर्मू ने प्रशासनिक क्षमता के साथ अच्छे नतीजे दिए हैं। अब जरूरत राज्य में समय के साथ सामाजिक, प्रशासनिक वातावरण पर भी ध्यान देने की है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री को वहां एक विश्वासपात्र कुशल राजनीति व्यक्तित्व की आवश्यकता थी। समझा जा रहा है मनोज सिन्हा इसके लिए उन्हें उपयुक्त लगे।
मनोज सिन्हा करेंगे राज्य में अमन की बहाली
मनोज सिन्हा उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से आते हैं। वह ऐसे समय में उपराज्यपाल बने हैं जब अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को मिलने वाले विशेष राज्य के दर्जे के प्रावधान नहीं हैं। ऐसे में सिन्हा के सामने तीन बड़ी चुनौतियां हैं। पहली चुनौती जम्मू-कश्मीर के लोगों का विश्वास जीतने की है। राज्य के लोग विकास की मुख्यधारा में शामिल हों। इसके लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक विकास के बड़े कदम उठाने की आवश्यकता है।
दूसरा बड़ी चुनौती राज्य में आंतरिक सुरक्षा तथा राज्य की सीमा से लगती नियंत्रण रेखा, अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सैन्य बलों से तालमेल बनाकर आतंकवाद, सीमा पार की घुसपैठ के खात्मे की है। तीसरी बड़ी चुनौती केंद्रीय योजनाओं को राज्य में प्रभावी तरीके से लागू कराकर पंचायत, नगर निगम, विधानसभा और लोकसभा के चुनाव के लिए जनभागीदारी को बढ़ाना है। प्रधानमंत्री कार्यालय सूत्रों के अनुसार मनोज सिन्हा इस फ्रेम में सबसे उपयुक्त चेहरा हैं।
...इस चर्चा का कोई सिर पैर नहीं
गिरीश चंद्र मुर्मू को हटाने को लेकर प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के बीच बढ़ रही दूरी की अफवाह चल पड़ी है। कहा जा रहा है कि दोनों शीर्ष नेताओं में मतांतर बढ़ रहा है। राजनीतिक गलियारे की चर्चा के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी ने सत्यपाल मलिक और मुर्मू को अमित शाह की पसंद पर जम्मू-कश्मीर की जिम्मेदारी सौंपी थी। इसके पीछे तर्क दिए जा रहे हैं कि शाह जितना जल्दबाजी में काम करते हैं, प्रधानमंत्री का स्वभाव उतना ही गंभीर है। वह रणनीति बनाकर आगे बढ़ते हैं।
चर्चा यह भी है राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भी सत्यपाल मलिक और फिर मुर्मू के पक्ष में नहीं थे। वह किसी आईपीएस को यह जिम्मेदारी देने के पक्ष में थे। लेकिन इस तरह की चर्चा का कोई सिर-पैर नहीं है। सच यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो सोचते हैं, अमित शाह के दिमाग में उसकी डिजाइन तैयार होती रहती है। दोनों में काफी गहरी समझ है। प्रधानमंत्री और शाह को करीब से जानने वालों का मानना है कि देश की केंद्रीय राजनीति में अमित शाह को अपना वीटो लगाकर प्रधानमंत्री ने स्थापित किया है। इतना ही उन्हें केंद्रीय गृहमंत्री की जिम्मेदारी भी प्रधानमंत्री ने अपना वीटो लगाकर दी है।