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Omicron Variant: ब्रिटेन में कम्युनिटी स्प्रेड जैसी स्थिति के बीच जानिए Genome Sequencing होती क्या है, इसका क्या फायदा है

प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Tue, 07 Dec 2021 01:42 PM IST

सार

विशेषज्ञों के अनुसार, कोरोनावायरस में रूप बदलने की प्रवृत्ति होती है, जो हानिकारक हो सकता या लाभकारी, या हो सकता है इसका कोई प्रभाव ही नहीं पड़े। इसलिए वायरस की जांच के लिए जीनोम सीक्वेंस का ट्रैक रखना महत्वपूर्ण है। जीनोम डेटा हेल्प ट्रैक कम्युनिटी स्प्रेड को रोकने में मददगार है। 
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ओमिक्रॉन वैरिएंट से अब तक कहीं भी मौत का मामला सामने नहीं आया है। - फोटो : अमर उजाला
आईआईटी के वैज्ञानिकों का दावा है कि ओमिक्रॉन वैरिएंट की वजह से भारत में कोरोना की तीसरी लहर फरवरी में आ सकती है। हालांकि अनुमान है कि यह दूसरी लहर के मुकाबले कमजोर रह सकता है। आईआईटी के डाटा वैज्ञानिक दल की ओर से किए गए अध्ययन के अनुसार तीसरी लहर में एक से डेढ़ लाख तक अधिकतम मामले प्रतिदिन आ सकते हैं। अध्ययन दल में शामिल डाटा वैज्ञानिक मनिंद्र अग्रवाल ने बताया कि इस बड़े आंकड़े के पीछे ओमिक्रॉन ही हो सकता है।

हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे पहले नौ नवंबर को कोरोना के इस घातक वैरिएंट के संक्रमण के बारे में पता चला था, तब से अबतक यह कई देशों को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। इतना ही नहीं अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में यह कम्युनिटी स्प्रेड जैसी स्थिति का कारण बन चुका है। यूके के स्वास्थ्य मंत्री साजिद जाविद ने संसद में बताया कि देश में कोरोना के नए वेरिएंट के 336 केस सामने आ चुके हैं. इंग्लैंड में इसका कम्युनिटी स्प्रेड हो रहा है। भारत की बात करें तो पिछले तीन दिनों में यहां भी तेजी से मामलों में इजाफा देखने को मिला है। यहां अब तक 23 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं।


सरकार का जीनोम सीक्वेंसिंग पर जोर
भारत में अब तक ओमिक्रॉन के कई मामले आ चुके हैं। केंद्र सरकार ने राज्यों से यूरोप, अमेरिका, रूस और कई अन्य अंतरराष्ट्रीय देशों से उड़ान भरने वाले यात्रियों की जीनोम सीक्वेंस रिपोर्ट लेने सहित कई सख्त उपाय करने को कहा है। बाहर से आने वाले यात्रियों के सैंपल को जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए भारत के अलग-अलग प्रयोगशालाओं में भेजा जाता है। देश भर में सीक्वेंसिंग के लिए 288 जगहों की पहचान की गई। 
 
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ओमिक्रॉन वैरिएंट से अब तक कहीं भी मौत का मामला सामने नहीं आया है। - फोटो : अमर उजाला
आईआईटी के वैज्ञानिकों का दावा है कि ओमिक्रॉन वैरिएंट की वजह से भारत में कोरोना की तीसरी लहर फरवरी में आ सकती है। हालांकि अनुमान है कि यह दूसरी लहर के मुकाबले कमजोर रह सकता है। आईआईटी के डाटा वैज्ञानिक दल की ओर से किए गए अध्ययन के अनुसार तीसरी लहर में एक से डेढ़ लाख तक अधिकतम मामले प्रतिदिन आ सकते हैं। अध्ययन दल में शामिल डाटा वैज्ञानिक मनिंद्र अग्रवाल ने बताया कि इस बड़े आंकड़े के पीछे ओमिक्रॉन ही हो सकता है।

हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक सबसे पहले नौ नवंबर को कोरोना के इस घातक वैरिएंट के संक्रमण के बारे में पता चला था, तब से अबतक यह कई देशों को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। इतना ही नहीं अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में यह कम्युनिटी स्प्रेड जैसी स्थिति का कारण बन चुका है। यूके के स्वास्थ्य मंत्री साजिद जाविद ने संसद में बताया कि देश में कोरोना के नए वेरिएंट के 336 केस सामने आ चुके हैं. इंग्लैंड में इसका कम्युनिटी स्प्रेड हो रहा है। भारत की बात करें तो पिछले तीन दिनों में यहां भी तेजी से मामलों में इजाफा देखने को मिला है। यहां अब तक 23 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं।

सरकार का जीनोम सीक्वेंसिंग पर जोर
भारत में अब तक ओमिक्रॉन के कई मामले आ चुके हैं। केंद्र सरकार ने राज्यों से यूरोप, अमेरिका, रूस और कई अन्य अंतरराष्ट्रीय देशों से उड़ान भरने वाले यात्रियों की जीनोम सीक्वेंस रिपोर्ट लेने सहित कई सख्त उपाय करने को कहा है। बाहर से आने वाले यात्रियों के सैंपल को जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए भारत के अलग-अलग प्रयोगशालाओं में भेजा जाता है। देश भर में सीक्वेंसिंग के लिए 288 जगहों की पहचान की गई। 
 

ओमिक्रॉन का खतरा - फोटो : अमर उजाला
क्यों जरूरी है जीनोम सीक्वेंसिंग
कोरोना वायरस के स्पॉट का पता लगाने के प्रयास में जीनोम सीक्वेंस तेजी से एक आवश्यक साधन के रूप में उभरा है, क्योंकि दुनिया भर की सरकारें वायरस के निरंतर रूप बदलने से परेशान हैं। सामान्य जांच के जरिए किसी भी तरह के संक्रमण की पहचान हो सकती है लेकिन ओमिक्रॉन जैसे वायरस के किसी भी स्वरूप को जानने के लिए जीनोम सीक्वेंसिंग जरूरी है।

क्या होती है जीनोम सीक्वेंसिंग
रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्रों के अनुसार, जीनोम सीक्वेंस से वैज्ञानिकों को कोरोना वायरस की पहचान करने और इस बात की निगरानी करने में आसानी होती है कि यह वायरस समय के साथ कैसे नए रूप बदल लेता है। जीनोम सीक्वेंस से यह पता चलता है कि वायरस कैसा है, किस तरह दिखता है। वायरस के विशाल समूह को ही जीनोम कहा जाता है और वायरस के बारे में जानने की विधि को जीनोम सीक्वेंसिंग कहते हैं। इससे ही कोरोना के नए स्ट्रेन के बारे में भी पता चलता है।

मानव कोशिकाओं के भीतर आनुवंशिक पदार्थ होता है जिसे डीएनए, आरएनए कहा जाता है। इन सभी पदार्थों को सामूहिक रूप से जीनोम कहा जाता है। संक्षेप में, जीनोम सीक्वेंस वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य अधिकारियों को कोरोनावायरस समूहों को मैप करने की अनुमति देता है। कोरोना वायरस के मामले के जीनोम सीक्वेंस के नतीजों से वैज्ञानिकों को वायरस के स्रोत को ट्रैक करने में मदद मिल सकती है।

ओमिक्रॉन वेरिएंट(सांकेतिक) - फोटो : Pixabay
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लयूएचओ) के अनुसार, जीनोम सीक्वेंस ने दुनिया को कोरोना वायरस के नए रूप की तेजी से पहचान करने और दुनिया को इसके प्रकोप से बचाने के लिए उपाय विकसित करने में मदद मिली है। लगातार जीनोम सीक्वेसिंग से रोग के प्रसार का कारण समझने और वायरस के विकास की निगरानी में मदद मिली। 

वायरस के प्रसार श्रृंखला को तोड़ती है जीनोम सीक्वेंसिंग 
भारत में जीनोम सीक्वेंसिंग की ज्यादा सुविधा नहीं है। पिछले साल गुजरात के बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस के पूरे जीनम सीक्वेंस को खोजा था। अमेरिका और ब्रिटेन ने लोगों को कोरोना वायरस से बचाने के लिए एक तरफ जहां टीकाकरण कवरेज को बहुत अधिक महत्व दिया वहीं दूसरी तरफ जीनोम सीक्वेंसिंग को भी बहुत बढ़ाया था। क्योंकि इसकी मदद से एक संक्रमित व्यक्ति की तेजी से और कुशलता से पहचान होती है। इसके बाद उन सभी की पहचान की जाती है जो हाल ही में उस व्यक्ति के निकट संपर्क में आया हो। ताकि वायरस के फैलने की श्रृंखला को तोड़ा जा सके। 
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