“नमस्ते प्रधानमंत्री जी मेरा नाम सत्यम है। मैंने इस साल दिल्ली विश्वविद्यालय में फर्स्ट ईयर में एडमिशन लिया है। हमारे स्कूल के बोर्ड एग्जाम के समय आपने हमसे एग्जाम स्ट्रेस और एजुकेशन की बात की थी। मेरे जैसे स्टूडेंट्स के लिए अब आपका क्या सन्देश है।” वैसे तो जुलाई और अगस्त के महीने किसानों के लिए और सभी नौजवानों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। क्योंकि यही वक्त होता है जब कॉलेज का पीक सीजन होता है। ‘सत्यम’ जैसे लाखों युवा स्कूल से निकल करके कैलेज में जाते हैं। अगर फरवरी और मार्च एग्जाम, पेपर्स, आंसर में जाता है तो अप्रैल और मई छुट्टियों में मौजमस्ती करने के साथ-साथ रिजल्ट्स, जीवन में आगे की दिशाएं तय करने, करियर च्वाइस इसी में खप जाता है।
जुलाई वह महीना है जब युवा अपने जीवन के उस नये चरण में कदम रखते हैं जब फोकस क्वेश्चन से हटकर के कट-ऑफ पर चला जाता है। छात्रों का ध्यान होम से हॉस्टल पर चला जाता है। छात्र पैरेंट्स की छाया से प्रोफेसर्स की छाया में आ जाते हैं। मुझे पूरा यकीन है कि मेरा युवा-मित्र कॉलेज जीवन की शुरुआत को लेकर काफी उत्साही और खुश होंगे। पहली बार घर से बाहर जाना, गांव से बाहर जाना, एक प्रोटेक्टिव एनवायरमेंट से बाहर निकल करके खुद को ही अपना सारथी बनना होता है। इतने सारे युवा पहली बार अपने घरों को छोड़कर, अपने जीवन को एक नयी दिशा देने निकल आते हैं।
कई छात्रों ने अभी तक अपने-अपने कॉलेज ज्वाइन कर लिए होंगे, कुछ ज्वाइन करने वाले होंगे। आप लोगों से मैं यही कहूंगा शांत रहिए, जिंदगी का आनंद उठाइए, जीवन में अन्तर्मन का भरपूर आनंद लें। किताबों के बिना कोई चारा तो नहीं है, स्टडी तो करना पड़ता है, लेकिन नयी-नयी चीजें खोजने की प्रवृति बनी रहनी चाहिए। पुराने दोस्तों का अपना महामूल्य है। बचपन के दोस्त मूल्यवान होते हैं, लेकिन नये दोस्त चुनना, बनाना और बनाए रखना, यह अपने आप में एक बहुत बड़ी समझदारी का काम होता है। कुछ नया सीखें, जैसे नयी-नयी स्किल्स, नयी-नयी भाषाएं सीखें।
जो युवा अपने घर छोड़कर बाहर किसी और जगह पर पढ़ने गए हैं उन जगहों को डिस्कवर करें, वहां के बारे में जानें, वहां के लोगों को, भाषा को, संस्कृति को जानें, वहां के पर्यटन स्थल होंगे– वहां जाएं, उनके बारे में जानें। नयी पारी प्रारम्भ कर रहे हैं सभी नौजवानों को मेरी शुभकामनाएं हैं। अभी जब कॉलेज सीजन की बात हो रही है तो मैं न्यूज में देख रहा था कि कैसे मध्यप्रदेश के एक अत्यंत गरीब परिवार से जुड़े एक छात्र आशाराम चौधरी ने जीवन की मुश्किल चुनौतियों को पार करते हुए सफलता हासिल की है। उन्होंने जोधपुर एम्स की एमबीबीएस की परीक्षा में अपने पहले ही प्रयास में सफलता पायी है। उनके पिता कूड़ा बीनकर अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। मैं उनकी इस सफलता के लिए उन्हें बधाई देता हूं।
ऐसे कितने ही छात्र हैं जो गरीब परिवार से हैं और विपरीत परिस्थियों के बावजूद अपनी मेहनत और लगन से उन्होंने कुछ ऐसा कर दिखाया है, जो हम सबको प्रेरणा देता है। चाहे वो दिल्ली के प्रिंस कुमार हों, जिनके पिता डीटीसी में बस चालक हैं या फिर कोलकाता के अभय गुप्ता जिन्होंने फुटपाथ पर स्ट्रीट लाइट्स के नीचे अपनी पढ़ाई की। अहमदाबाद की बिटिया आफरीन शेख हो, जिनके पिता ऑटो रिक्शा चलाते हैं। नागपुर की बेटी खुशी हो, जिनके पिता भी स्कूल बस में ड्राइवर हैं या हरियाणा के कार्तिक, जिनके पिता चौकीदार हैं या झारखण्ड के रमेश साहू जिनके पिता ईंट-भट्टा में मजदूरी करते हैं। खुद रमेश भी मेले में खिलौना बेचा करते थे या फिर गुडगांव की दिव्यांग बेटी अनुष्का पांडा, जो जन्म से ही स्पायनल मस्कुलर एट्रोफी नामक एक आनुवांशिक बीमारी से पीड़ित है, इन सबने अपने दृढसंकल्प और हौसले से हर बाधा को पार कर– दुनिया देखे ऐसी कामयाबी हासिल की। हम अपने आस-पास देखें तो हमको ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे।
देश के किसी भी कोने में कोई भी अच्छी घटना मेरे मन को ऊर्जा देती है, प्रेरणा देती है और जब इन नौजवानों की कथा आपको कह रहा हूं तो इसके साथ मुझे नीरज जी की भी वो बात याद आती है और जिंदगी का वही तो मकसद होता है। नीरज जी ने कहा है –
‘गीत आकाश को धरती का सुनाना है मुझे,
हर अंधेरे को उजाले में बुलाना है मुझे,
फूल की गंध से तलवार को सर करना है,
और गा-गा के पहाड़ों को जगाना है मुझे’
मेरे प्यारे देशवासियो, कुछ दिन पहले मेरी नजर एक न्यूज पर गई, लिखा था– ‘दो युवाओं ने किया मोदी का सपना साकार’। जब अन्दर पढ़ा तो जाना कि कैसे आज हमारे युवा तकनीक का स्मार्ट और क्रिएटिव यूज करके सामान्य व्यक्ति के जीवन में बदलाव का प्रयास करते हैं। घटना यह थी कि एक बार अमेरिका के सैन जोस शहर, जिसे तकनीकी हब के रूप में जाना जाता है। वहां मैं भारतीय युवाओं के साथ चर्चा कर रहा था। मैंने उनसे अपील की थी। वो भारत के लिए अपने टैलेंट को कैसे यूज कर सकते हैं, ये सोचें और समय निकाल कर के कुछ करें। मैंने ब्रेन ड्रेन को ब्रेन गेन में बदलने की अपील की थी। रायबरेली के दो आईटी प्रोफेशनल्स योगेश साहू जी और रजनीश बाजपेयी जी ने मेरी इस चुनौती को स्वीकार करते हुए एक अभिनव प्रयास किया।
अपने प्रोफेशनल्स स्किल्स का उपयोग करते हुए योगेश जी और रजनीश जी ने मिलकर एक स्मार्ट गांव एप तैयार किया है। ये ऐप न केवल गांव के लोगों को पूरी दुनिया से जोड़ रहा है बल्कि अब वे कोई भी जानकारी और सूचना स्वयं खुद के मोबाइल पर ही प्राप्त कर सकते हैं। रायबरेली के इस गांव तौधकपुर के निवासियों, ग्राम-प्रधान, जिलाधिकारी, सीडीओ, सभी लोगों ने इस ऐप के उपयोग के लिए लोगों को जागरूक किया। यह ऐप गांव में एक तरह से डिजिटल क्रांति लाने का काम कर रहा है। गांव में जो विकास के काम होते हैं, उसे इस ऐप के जरिये रिकॉर्ड करना, ट्रैक करना, मॉनिटर करना आसान हो गया है।
इस ऐप में गांव की फोन डायरेक्टरी, न्यूज सेक्शन, इवेंट्स लिस्ट, हेल्थ सेंटर और इनफोर्मेशन सेंटर मौजूद है। यह ऐप किसानों के लिए भी काफी फायदेमंद है ऐप का ग्राम फीचर, किसानों के बीच फैक्ट रेट, एक तरह से उनके उत्पाद के लिए एक मार्केट प्लेस की तरह काम करता है। इस घटना को यदि आप बारीकी से देखेंगे तो एक बात ध्यान में आएगी वह युवा अमेरिका में, वहां के रहन-सहन, सोच-विचार उसके बीच जीवन जी रहा है। कई सालों पहले भारत छोड़ा होगा लेकिन फिर भी अपने गांव की बारीकियों को जानता है, चुनौतियों को समझता है और गांव से इमोशनली जुड़ा हुआ है। इस कारण, वह शायद गांव को जो चाहिए ठीक उसके अनुरूप कुछ बना पाया।
अपने गांव, अपनी जड़ों से यह जुड़ाव और वतन के लिए कुछ कर दिखाने का भाव हर हिन्दुस्तानी के अन्दर स्वाभाविक रूप से होता है। लेकिन कभी-कभी समय के कारण, कभी दूरियों के कारण, कभी पारिस्थितियों के कारण, उस पर एक हल्की सी राख जम जाती है, लेकिन अगर कोई एक छोटी सी चिंगारी भी, उसका स्पर्श हो जाए तो सारी बातें फिर एक बार उभर करके आ जाती हैं और वो अपने बीते हुए दिनों की तरफ खींच के ले आती हैं। हम भी जरा जांच कर लें कहीं हमारे केस में भी तो ऐसा नहीं हुआ है, स्थितियां, परिस्थिति, दूरियों ने कहीं हमें अलग तो नहीं कर दिया है, कहीं राख तो नहीं जम गई है। जरुर सोचिये।
“आदरणीय प्रधानमंत्री जी नमस्कार, मैं संतोष काकड़े कोल्हापुर, महाराष्ट्र से बात कर रहा हूं। पंढरपुर की वारी ये महाराष्ट्र की पुरानी परंपरा है। हर साल ये बड़े उत्साह और उमंग से मनाया जाता है। लगभग 7-8 लाख वारकरी इसमें शामिल होते हैं। इस अनोखे उपक्रम के बारे में देश की बाकी जनता भी अवगत हो, इसलिए आप वारी के बारे और जानकारी दीजिये।”
संतोष जी आपके फोन कॉल के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। सचमुच में पंढरपुर वारी अपने आप में एक अद्भुत यात्रा है। साथियों आषाढ़ी एकादशी जो इस बार 23 जुलाई, को थी उस दिन को पंढरपुर वारी की भव्य परिणिति के रूप में भी मनाया जाता है। पंढरपुर महाराष्ट्र के सोलापुर जिले का एक पवित्र शहर है। आषाढ़ी एकादशी के लगभग 15-20 दिन पहले से ही वारकरी यानी तीर्थयात्री पालकियों के साथ पंढरपुर की यात्रा के लिए पैदल निकलते हैं। इस यात्रा, जिसे वारी कहते हैं, में लाखों की संख्या में वारकरी शामिल होते हैं। संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम जैसे महान संतों की पादुका, पालकी में रखकर विट्ठल-विट्ठल गाते, नाचते, बजाते पैदल पंढरपुर की ओर चल पड़ते हैं। यह वारी शिक्षा, संस्कार और श्रद्धा की त्रिवेणी है। तीर्थ यात्री भगवान विट्ठल, जिन्हें विठोवा या पांडुरंग भी कहा जाता है उनके दर्शन के लिए वहां पहुंचते हैं।
भगवान विट्ठल गरीबों, वंचितों, पीड़ितों के हितों की रक्षा करते हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा, आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना वहां के लोगों में अपार श्रद्धा है, भक्ति है। पंढरपुर में विठोवा मंदिर जाना और वहां की महिमा, सौन्दर्य, आध्यात्मिक आनंद का अपना एक अलग ही अनुभव है। ‘मन की बात’ के श्रोताओं से मेरा आग्रह है कि अवसर मिले तो एक बार जरूर पंढरपुर वारी का अनुभव लें। ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, रामदास, तुकाराम– अनगिनत संत महाराष्ट्र में आज भी जन-सामान्य को शिक्षित कर रहे हैं। अंधश्रद्धा के खिलाफ लड़ने की ताकत दे रहे हैं और हिंदुस्तान के हर कोने में यह संत परंपरा प्रेरणा देती रही है। चाहे वो उनके भारुड हो या अभंग हो हमें उनसे सदभाव, प्रेम और भाईचारे का महत्वपूर्ण सन्देश मिलता है।
अंधश्रद्धा के खिलाफ श्रद्धा के साथ समाज लड़ सके इसका मंत्र मिलता है। ये वो लोग थे जिन्होंने समय-समय पर समाज को रोका, टोका और आईना भी दिखाया और यह सुनिश्चित किया कि पुरानी कुप्रथाएं हमारे समाज से खत्म हों और लोगों में करुणा, समानता और शुचिता के संस्कार आएं। हमारी यह भारत-भूमि बहुरत्ना वसुंधरा है जैसे संतों की एक महान परंपरा हमारे देश में रही, उसी तरह से सामर्थ्यवान मां-भारती को समर्पित महापुरुषों ने, इस धरती को अपना जीवन आहुत कर दिया, समर्पित कर दिया। एक ऐसे ही महापुरुष हैं लोकमान्य तिलक जिन्होंने अनेक भारतीयों के मन में अपनी गहरी छाप छोड़ी है। हम 23 जुलाई, को तिलक जी की जयंती और 01 अगस्त, को उनकी पुण्यतिथि में उनका पुण्य स्मरण करते हैं। लोकमान्य तिलक साहस और आत्मविश्वास से भरे हुए थे। उनमें ब्रिटिश शासकों को उनकी गलतियों का आईना दिखाने की शक्ति और बुद्धिमत्ता थी।
अंग्रेज लोकमान्य तिलक से इतना अधिक डरे हुए थे कि उन्होंने 20 वर्षों में उन पर तीन बार राजद्रोह लगाने की कोशिश की, और यह कोई छोटी बात नहीं है। मैं, लोकमान्य तिलक और अहमदाबाद में उनकी एक प्रतिमा के साथ जुड़ी हुई एक रोचक घटना आज देशवासियों के सामने रखना चाहता हूं। अक्टूबर, 1916 में लोकमान्य तिलक जी अहमदाबाद जब आए, उस जमाने में, आज से करीब सौ साल पहले 40,000 से अधिक लोगों ने उनका अहमदाबाद में स्वागत किया था और यहीं यात्रा के दौरान सरदार वल्लभ भाई पटेल को उनसे बातचीत करने का अवसर मिला था और सरदार वल्लभ भाई पटेल लोकमान्य तिलक जी से अत्यधिक प्रभावित थे और जब 01 अगस्त, 1920 को लोकमान्य तिलक जी का देहांत हुआ तभी उन्होंने निर्णय कर लिया था कि वे अहमदाबाद में उनका स्मारक बनाएंगे।
सरदार वल्लभ भाई पटेल अहमदाबाद नगर पालिका के मेयर चुने गए और तुरंत ही उन्होंने लोकमान्य तिलक के स्मारक के लिए विक्टोरिया गार्डन को चुना और यह विक्टोरिया गार्डन जो ब्रिटेन की महारानी के नाम पर था। स्वाभाविक रूप से ब्रिटिश इससे अप्रसन्न थे और कलेक्टर इसके लिए अनुमति देने से लगातार मना करता रहा लेकिन सरदार साहब, सरदार साहब थे। वह अटल थे और उन्होंने कहा था कि भले ही उन्हें पद त्यागना पड़े, लेकिन लोकमान्य तिलक जी की प्रतिमा बन कर रहेगी। अंततः प्रतिमा बन कर तैयार हुई और सरदार साहब ने किसी और से नहीं बल्कि 28 फरवरी, 1929– इसका उद्घाटन महात्मा गांधी से कराया और सब से बड़ी मजे की बात है उस उद्घाटन समारोह में, उस भाषण में पूज्य बापू ने कहा कि सरदार पटेल के आने के बाद अहमदाबाद नगर पालिका को न केवल एक व्यक्ति मिला है बल्कि उसे वह हिम्मत भी मिली है जिसके चलते तिलक जी की प्रतिमा का निर्माण संभव हो पाया है। और मेरे प्यारे देशवासियो, इस प्रतिमा की विशिष्टता यह है कि यह तिलक की ऐसी दुर्लभ मूर्ति है जिसमें वह एक कुर्सी पर बैठे हुए हैं, इसमें तिलक के ठीक नीचे लिखा है ‘स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है’ और यह सब अंग्रेजों के इस कालखंड की बात तो सुना रहा हूं।
लोकमान्य तिलक जी के प्रयासों से ही सार्वजनिक गणेश उत्सव की परंपरा शुरू हुई। सार्वजनिक गणेश उत्सव परम्परागत श्रद्धा और उत्सव के साथ-साथ समाज-जागरण, सामूहिकता, लोगों में समरसता और समानता के भाव को आगे बढ़ाने का एक प्रभावी माध्यम बन गया था। वैसे समय वो एक कालखंड था जब जरुरत थी कि देश अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई के लिए एकजुट हो, इन उत्सवों ने जाति और सम्प्रदाय की बाधाओं को तोड़ते हुए सभी को एकजुट करने का काम किया। समय के साथ इन आयोजनों की लोकप्रियता बढ़ती गई। इसी से पता चलता है कि हमारी प्राचीन विरासत और इतिहास के हमारे वीर नायकों के प्रति आज भी हमारी युवा-पीढ़ी में क्रेज है। आज कई शहरों में तो ऐसा होता है कि आपको लगभग हर गली में गणेश-पंडाल देखने को मिलता है। गली के सभी परिवार साथ मिलकर के उसे ऑर्गेनाइज करते हैं। एक टीम के रूप में काम करते हैं। यह हमारे युवाओं के लिए भी एक बेहतरीन अवसर है, जहां वे लीडरशिप और ऑर्गेनाइजेशन जैसे गुण सीख सकते हैं, उन्हें खुद के अन्दर विकसित कर सकते हैं।
मेरे प्यारे देशवासियो। मैंने पिछली बार भी आग्रह किया था और जब लोकमान्य तिलक जी को याद कर रहा हूं तब फिर से एक बार आपसे आग्रह करूंगा कि इस बार भी हम गणेश उत्सव मनाएं, धूमधाम से मनाएं, जी-जान से मनाएं लेकिन इको-फ्रेंडली गणेश उत्सव मनाने का आग्रह रखें। गणेश जी की मूर्ति से लेकर साज-सज्जा का सामान सब कुछ इको-फ्रेंडली हो और मैं तो चाहूंगा हर शहर में इको-फ्रेंडली गणेश उत्सव की अलग स्पर्धाएं हों, उनको इनाम दिए जाएं और मैं तो चाहूंगा कि माईगोव पर भी और नरेंद्र मोदी ऐप पर भी इको-फ्रेंडली गणेश-उत्सव की चीजे व्यापक प्रचार के लिए रखी जाएं। मैं जरूर आपकी बात लोगों तक पहुंचाऊंगा। लोकमान्य तिलक ने देशवासियों में आत्मविश्वास जगाया उन्होंने नारा दिया था– ‘स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम लेकर के रहेंगे’।
आज ये कहने का समय है स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर रहेंगे। हर भारतीय की पहुंच सुशासन और विकास के अच्छे परिणामों तक होनी चाहिए। यही वो बात है जो एक नए भारत का निर्माण करेगी। तिलक के जन्म के 50 वर्षों बाद ठीक उसी दिन यानी 23 जुलाई को भारत-मां के एक और सपूत का जन्म हुआ, जिन्होंने अपना जीवन इसलिए बलिदान कर दिया ताकि देशवासी आजादी की हवा में सांस ले सके। मैं बात कर रहा हूं चंद्रशेखर आजाद की। भारत में कौन-सा ऐसा नौजवान होगा जो इन पंक्तियों को सुनकर के प्रेरित नही होगा –
‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है’
इन पंक्तियों ने अशफाक उल्लाह खान, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे अनेक नौजवानों को प्रेरित किया। चंद्रशेखर आजाद की बहादुरी और स्वतंत्रता के लिए उनका जुनून, इसने कई युवाओं को प्रेरित किया। आजाद ने अपने जीवन को दांव पर लगा दिया, लेकिन विदेशी शासन के सामने वे कभी नहीं झुके। ये मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे मध्यप्रदेश में चन्द्रशेखर आजाद के गांव अलीराजपुर जाने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। इलाहाबाद के चंद्रशेखर आजाद पार्क में भी श्रद्धा-सुमन अर्पित करने का अवसर मिला और चंद्रशेखर आजाद जी वो वीर पुरुष थे जो विदेशियों की गोली से मरना भी नहीं चाहते थे– जियेंगे तो आजादी के लड़ते-लड़ते और मरेंगे तो भी आजाद बने रहकर के मरेंगे यही तो विशेषता थी उनकी। एक बार फिर से भारत माता के दो महान सपूतों – लोकमान्य तिलक जी और चंद्रशेखर आजाद जी को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूं।
अभी कुछ ही दिन पहले फिनलैंड में चल रही जूनियर अंडर-20 विश्व एथेलेटिक्स चैम्पियनशिप में 400 मीटर की दौड़, उस स्पर्धा में भारत की बहादुर बेटी और किसान पुत्री हिमा दास ने गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया है। देश की एक और बेटी एकता भयान ने मेरे पत्र के जवाब में इंडोनेशिया से मुझे email किया अभी वो वहां एशियन गेम्स की तैयारी कर रही हैं। ई-मेल में एकता लिखती हैं – ‘किसी भी एथलीट के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण क्षण वो होता है जब वो तिरंगा पकड़ता है और मुझे गर्व है कि मैंने वो कर दिखाया।’ एकता हम सब को भी आप पर गर्व है। आपने देश का नाम रोशन किया है। ट्यूनिशिया में विश्व पैरा एथलेटिक्स Grand Prix 2018 में एकता ने गोल्ड और ब्रोंज मेडल जीते हैं। उनकी यह उपलब्धि विशेष इसलिए है कि उन्होंने अपनी चुनौती को ही अपनी कामयाबी का माध्यम बना दिया।
बेटी एकता भयान 2003 में, रोड एक्सीडेंट के कारण उसके शरीर का आधा हिस्सा नीचे का हिस्सा नाकाम हो गया, लेकिन इस बेटी ने हिम्मत नही हारी और खुद को मजबूत बनाते हुए ये मुकाम हासिल किया। एक और दिव्यांग योगेश कठुनिया जी ने, उन्होंने बर्लिन में पैरा एथलेटिक्स ग्रैंड प्रिक्स में डिसक्स थ्रो में गोल्ड मेडल जीतकर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है उनके साथ सुंदर सिंह गुर्जर ने भी जैवलीन में गोल्ड मेडल जीता है। मैं एकता भयान जी, योगेश कठुनिया जी और सुंदर सिंह जी आप सभी के हौसले और जज्बे को सलाम करता हूं, बधाई देता हूं। आप और आगे बढ़ें, खेलते रहें, खिलते रहें।
मेरे प्यारे देशवासियो, अगस्त महीना इतिहास की अनेक घटनाएं, उत्सवों की भरमार से भरा रहता है, लेकिन मौसम के कारण कभी-कभी बीमारी भी घर में प्रवेश कर जाती है। मैं आप सब को उत्तम स्वास्थ्य के लिए, देशभक्ति की प्रेरणा जगाने वाले, इस अगस्त महीने के लिए और सदियों से चले आ रहे अनेक-अनेक उत्सवों के लिए, बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। फिर एक बार ‘मन की बात’ के लिए जरूर मिलेंगे। बहुत-बहुत धन्यवाद ।