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कर्नाटक चुनाव तक घूम-घूमकर बजता रहेगा चीफ जस्टिस के महाभियोग का बिगुल

Tue, 24 Apr 2018 05:33 AM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट
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कर्नाटक विधानसभा के चुनाव तक घूम-घूमकर देश के मुख्य न्यायाधीश को उनके पद से हटाने का बिगुल बजता रहेगा। इसकी एक बानगी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल द्वारा किए गए संवाददाता सम्मेलन में भी दिखी। सिब्बल ने साफ कहा कि उपराष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा को उनके पद से हटाने के लिए दिए गए महाभियोग के नोटिस को खारिज करना असंवैधानिक, अन प्रेसीडेंटेड और तर्कसंगत नहीं है। वह उपराष्ट्रपति के इस निर्णय के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल करेंगे। 
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हालांकि कपिल सिब्बल ने यह नहीं बताया कि वह यह याचिका कब दायर करेंगे, लेकिन उन्होंने इतना जरूर कहा कि उनकी इस याचिका पर सुनवाई या किसी निर्णय से देश के प्रधान न्यायाधीश बराबर की दूरी बनाए रखें। सिब्बल ने इसके लिए न्याय के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि यह याचिका देश के प्रधान न्यायाधीश को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया से जुड़ी है, इसलिए रूल ऑफ लॉ का पालन करते हुए उन्हें इससे दूर रहना चाहिए। 

हम वकील का काम करेंगे, कोर्ट अपना

सिब्बल ने कहा कि वह एक अनुभवी वकील हैं। वह अपना काम करेंगे। उनका काम याचिका को उच्चतम न्यायालय में दायर करना है। कपिल सिब्बल ने एक सवाल के जवाब में अपना यह पक्ष रखा। उनसे पूछा गया था कि यदि अदालत उनकी उपराष्ट्रपति के निर्णय के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दे तो? सिब्बल ने कहा कि वह अदालत के कामकाज के बारे में कैसे बता सकते हैं। याचिका दायर करने के बाद का काम अदालत का है। वह अदालत के काम में कैसे हस्तक्षेप कर सकते हैं। अदालत अपना काम करेगी, लेकिन उन्हें रूल ऑफ लॉ या एथिक्स ऑफ लॉ के आधार पर भरोसा है कि अदालत इस मामले में निष्पक्षता से अपना काम करेगी। प्रधान न्यायाधीश उनकी याचिका पर सुनवाई से खुद को दूर रखेंगे। 
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उपराष्ट्रपति के फैसले पर उठाई अंगुली

कपिल सिब्बल ने उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति के निर्णय पर गहरी आपत्ति जताई। उन्होंने सभापति के निर्णय को अनप्रेसीडेंटेड, असंवैधानिक, बिना उचित सलाह मशविरा के लिया गया निर्णय बताया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने इसके जरिए सरकार की मंशा पर अंगुली उठाई और कहा कि सरकार किसी भी मामले में जांच नहीं होने देना चाहती, क्योंकि सरकार डर रही है। उन्होंने सभापति के निर्णय को भी इसी का हिस्सा बताते हुए एक तरफा निर्णय करार दिया। हालांकि एक प्रश्न के जवाब में सिब्बल ने कहा कि सभापति को उनके पद से हटाने के लिए महाभियोग लाने का सवाल ही नहीं उठता। 

सिब्बल ने कहा कि सभापति ने प्राइमाफेसी के आधार पर इसे खारिज कर दिया। उन्होंने पहले ही जज बनकर फैसला दे दिया। सभापति अपने दायरे से बाहर चले गए। उनका इतना आगे बढ़कर निर्णय लेना अन प्रेसीडेंटेड है। उनका काम केवल महाभियोग के नोटिस की प्रक्रिया को देखना था। वह यह देखते कि नियमानुसार इसके लिए 50 राज्यसभा सदस्यों ने हस्ताक्षर किए हैं या नहीं? यह नोटिस संविधान के प्रावधानों को पूरा करता है या नहीं। 

सिब्बल ने सभापति के निर्णय को असंवैधानिक बताने का भी कारण बताया। उन्होंने कहा कि सभापति को नोटिस में लगाए गए आरोप को देखना था। उन्होंने सभी आरोपों को स्वीकार भी लिया और नोटिस को खारिज भी कर दिया। बिना जांच प्रक्रिया के नतीजे पर पहुंच गए। जबकि यह नतीजा तो महाभियोग को स्वीकार किए जाने के बाद तीन सदस्यों की समिति (जिसमें एक उच्चतम न्यायालय के जज, एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों) को सभी आरोपों को केन्द्र में रखकर जांच के बाद करना था। जांच के बाद यह रिपोर्ट संसद में आती और संसद के निर्णय के बाद राष्ट्रपति के पास जाती। हालांकि सिब्बल ने कहा कि सभापति को नोटिस को स्वीकारने और खारिज करने का अधिकार है। 
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पार्टी के जो सदस्य न समझे वे अनाड़ी हैं

कपिल सिब्बल - फोटो : amar ujala
सरकार पर निशाना

केन्द्र की सरकार किसी मामले में जांच नहीं चाहती। कांग्रेस के नेता का यह सबसे बड़ा आरोप है। यह आरोप बड़ा इसलिए भी है, क्योंकि संयोगवश 23 अप्रैल को ही कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में दलितों के उत्पीडऩ को केन्द्र में रखकर संविधान बचाओ कार्यक्रम का आयोजन किया है। काफी पहले से पार्टी केन्द्र सरकार पर सभी संवैधानिक संस्थाओं को लगातार कमजोर करते जाने का भी आरोप लगा रही है। कपिल सिब्बल ने सभापति पर महाभियोग के नोटिस मामले में जल्दबाजी करने का आरोप लगाते उनके निर्णय को इससे जोड़ा। दरअसल यह कांग्रेस पार्टी के एजेंडे से भी मेल खाता है। कांग्रेस पार्टी भी लगातार मोदी सरकार को इसी आरोप से घेर रही है।

पार्टी के जो सदस्य न समझे वे अनाड़ी हैं

कपिल सिब्बल ने बिना नाम लिए सलमान खुर्शीद समेत पार्टी के कई नेताओं पर कटाक्ष किया है। उन्होंने कहा कि पार्टी के जो नेता प्रधान न्यायाधीश को उनके पद से हटाने के लिए महाभियोग का नोटिस दिए जाने के खिलाफ हैं, वे नहीं समझ पा रहे हैं तो अनाड़ी हैं। उन्होंने कहा कि महाभियोग के नोटिस पर दस्तखत करने वाले 71 सांसदों का निजी फैसला है। इनमें से सात सदस्य रिटायर हो गए हैं। यह कोई कांग्रेस पार्टी का निर्णय नहीं है। उन्होंने कांग्रेस पार्टी के कुछ सदस्यों से चर्चा न किए जाने के सवाल पर कहा कि जो किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं, उनसे क्या चर्चा करना।

क्या है पटाक्षेप 

कांग्रेस पार्टी के राज्यसभा में नेता गुलाम नबी आजाद के नेतृत्व में महाभियोग का नोटिस देने के बाद पार्टी के भीतर हलचल तेज हो गई थी। भाजपा के वरिष्ठ नेता और केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने इस प्रयास को राजनीतिक बदला और न्यायपालिका को डराना करार दिया था। उच्चतम न्यायालय ने भी इस पर चिंता जताई थी। इतना ही नहीं पूर्व कानून मंत्री और कांग्रेस पार्टी के नेता सलमान खुर्शीद ने इस फैसले की आलोचना भी की थी। सलमान खुर्शीद के करीबी बताते हैं कि इसके बाद खुर्शीद के पास उनसे स्टैंड बदलने के लिए कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं के फोन जाने लगे थे।

माना यह जा रहा है कि इसके बाद पार्टी के भीतर दो राय की स्थिति बनने लगी थी, लेकिन उपराष्ट्रपति के महाभियोग के नोटिस को खारिज किए जाने के बाद यह मुद्दा फिर से जिंदा हो गया। भाजपा जहां इस पर कांग्रेस को घेरने में लगी है, वहीं कपिल सिब्बल इसे राज्यसभा सांसदों को निजी नोटिस बताकर अदालत में याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं। अदालत में याचिका दायर होने से लेकर अगली हर सुनवाई तक मुद्दा जिंदा रहेगा। माना जा रहा है कि प्रधान न्यायाधीश को पद से हटाने के महाभियोग का मुद्दा कर्नाटक चुनाव तक बिगुल बजाता रहेगा।
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