कर्नाटक विधानसभा के चुनाव तक घूम-घूमकर देश के मुख्य न्यायाधीश को उनके पद से हटाने का बिगुल बजता रहेगा। इसकी एक बानगी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल द्वारा किए गए संवाददाता सम्मेलन में भी दिखी। सिब्बल ने साफ कहा कि उपराष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा को उनके पद से हटाने के लिए दिए गए महाभियोग के नोटिस को खारिज करना असंवैधानिक, अन प्रेसीडेंटेड और तर्कसंगत नहीं है। वह उपराष्ट्रपति के इस निर्णय के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में याचिका दाखिल करेंगे।
हालांकि कपिल सिब्बल ने यह नहीं बताया कि वह यह याचिका कब दायर करेंगे, लेकिन उन्होंने इतना जरूर कहा कि उनकी इस याचिका पर सुनवाई या किसी निर्णय से देश के प्रधान न्यायाधीश बराबर की दूरी बनाए रखें। सिब्बल ने इसके लिए न्याय के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि यह याचिका देश के प्रधान न्यायाधीश को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया से जुड़ी है, इसलिए रूल ऑफ लॉ का पालन करते हुए उन्हें इससे दूर रहना चाहिए।
हम वकील का काम करेंगे, कोर्ट अपना
सिब्बल ने कहा कि वह एक अनुभवी वकील हैं। वह अपना काम करेंगे। उनका काम याचिका को उच्चतम न्यायालय में दायर करना है। कपिल सिब्बल ने एक सवाल के जवाब में अपना यह पक्ष रखा। उनसे पूछा गया था कि यदि अदालत उनकी उपराष्ट्रपति के निर्णय के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दे तो? सिब्बल ने कहा कि वह अदालत के कामकाज के बारे में कैसे बता सकते हैं। याचिका दायर करने के बाद का काम अदालत का है। वह अदालत के काम में कैसे हस्तक्षेप कर सकते हैं। अदालत अपना काम करेगी, लेकिन उन्हें रूल ऑफ लॉ या एथिक्स ऑफ लॉ के आधार पर भरोसा है कि अदालत इस मामले में निष्पक्षता से अपना काम करेगी। प्रधान न्यायाधीश उनकी याचिका पर सुनवाई से खुद को दूर रखेंगे।
उपराष्ट्रपति के फैसले पर उठाई अंगुली
कपिल सिब्बल ने उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति के निर्णय पर गहरी आपत्ति जताई। उन्होंने सभापति के निर्णय को अनप्रेसीडेंटेड, असंवैधानिक, बिना उचित सलाह मशविरा के लिया गया निर्णय बताया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने इसके जरिए सरकार की मंशा पर अंगुली उठाई और कहा कि सरकार किसी भी मामले में जांच नहीं होने देना चाहती, क्योंकि सरकार डर रही है। उन्होंने सभापति के निर्णय को भी इसी का हिस्सा बताते हुए एक तरफा निर्णय करार दिया। हालांकि एक प्रश्न के जवाब में सिब्बल ने कहा कि सभापति को उनके पद से हटाने के लिए महाभियोग लाने का सवाल ही नहीं उठता।
सिब्बल ने कहा कि सभापति ने प्राइमाफेसी के आधार पर इसे खारिज कर दिया। उन्होंने पहले ही जज बनकर फैसला दे दिया। सभापति अपने दायरे से बाहर चले गए। उनका इतना आगे बढ़कर निर्णय लेना अन प्रेसीडेंटेड है। उनका काम केवल महाभियोग के नोटिस की प्रक्रिया को देखना था। वह यह देखते कि नियमानुसार इसके लिए 50 राज्यसभा सदस्यों ने हस्ताक्षर किए हैं या नहीं? यह नोटिस संविधान के प्रावधानों को पूरा करता है या नहीं।
सिब्बल ने सभापति के निर्णय को असंवैधानिक बताने का भी कारण बताया। उन्होंने कहा कि सभापति को नोटिस में लगाए गए आरोप को देखना था। उन्होंने सभी आरोपों को स्वीकार भी लिया और नोटिस को खारिज भी कर दिया। बिना जांच प्रक्रिया के नतीजे पर पहुंच गए। जबकि यह नतीजा तो महाभियोग को स्वीकार किए जाने के बाद तीन सदस्यों की समिति (जिसमें एक उच्चतम न्यायालय के जज, एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों) को सभी आरोपों को केन्द्र में रखकर जांच के बाद करना था। जांच के बाद यह रिपोर्ट संसद में आती और संसद के निर्णय के बाद राष्ट्रपति के पास जाती। हालांकि सिब्बल ने कहा कि सभापति को नोटिस को स्वीकारने और खारिज करने का अधिकार है।