हमारे यहां गांवों में ज्यादातर औरतों और लड़कियों को सिलाई-कढ़ाई का काम आता है। मैंने भी अपनी दादी से यह काम सीखा। लेकिन हमारा हुनर बस घर पर अपने कपड़े सिलने तक ही सीमित था। मैं राजस्थान में बाड़मेर जिले के रावतसर की रहने वाली हूं। पांच साल की उम्र में ही मैंने अपनी मां को खो दिया।
पिता ने दूसरी शादी कर ली, जिसके बाद मैं अपने ताऊ-ताई के पास आ गई। घर की कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते आठवीं के बाद मेरी पढ़ाई छुड़वा दी गई। फिर 17 साल की उम्र में मेरी शादी हो गई। मेरी ससुराल वाले खेती-बाड़ी पर निर्भर थे, जिससे कोई खास बचत नहीं होती थी।
मैं किसी भी तरह अपने घर के हालात सुधारना चाहती थी। वर्ष 2008 में मेरी पहली संतान के रूप में बेटे का जन्म हुआ। लेकिन खराब तबियत, और ढंग के अस्पताल में इलाज न हो पाने के कारण दो दिन बाद ही वह चल बसा। बेटे के मर जाने का मुझे सदमा लगा। इसके बाद मुझे घर में अकेले खाली बैठने में बहुत घुटन होने लगी। मुझे इस सबसे बाहर निकलना था। इसके लिए मैंने अपने हुनर को ही रोजगार का जरिया बनाया।
मैं चाहती थी कि जिस तरह मैं अपने पैरों पर खड़ी हो रही थी, वैसे ही अन्य महिलाएं भी आत्मनिर्भर बनें। मेरे आस-पड़ोस में औरतें सिलाई-कढ़ाई का काम तो करती थीं, पर उन्हें उनके काम के हिसाब से पैसे नहीं मिलते थे। मैंने फैसला किया कि अपने बनाए हुए सामान की बिक्री की जिम्मेदारी भी खुद उठाऊंगी।
मैंने आस-पड़ोस की लगभग 10 महिलाओं को इकट्ठा कर उनके साथ एक स्वयं-सहायता समूह बनाया। इसके बाद 100-100 रुपये इकट्ठा कर एक सेकंड हैंड सिलाई मशीन खरीद अपने उत्पाद तैयार करना शुरू किया। उत्पाद तो हम बना रहे थे, पर सबसे ज़्यादा जरूरी था बाजार मिलना। इसलिए मैंने दुकानदारों से बात की और जैसे-तैसे उन्हें मनाया कि वे सीधा हमसे ही उत्पाद खरीदें।
काम के सिलसिले में ही 2009 में मैं ग्रामीण विकास एवं चेतना संस्थान जा पहुंची। पता चला कि यह संगठन भी हस्तकला उत्पाद बनवाता है और बाजारों तक पहुंचाता है। मैंने वहां अपने काम के बारे में बताया और उत्पाद बनाने के साथ बाड़मेर के अन्य गांवों से भी महिला कारीगरों को उनके साथ जोड़ने में मदद करने लगी।
हालांकि, यह आसान नहीं था। जब भी मैं और मेरी कुछ साथी महिलाएं गांव के किसी घर में पहुंचती तो कई बार घर के मर्द अंदर नहीं आने देते थे। लेकिन धीरे-धीरे महिलाएं संगठन से जुड़ने लगीं और फिर जब उनकी मेहनत के पैसे मिले, तो गांव के लोग मुझ पर भरोसा करने लगे। जो महिलाएं कभी दो वक्त के खाने का बंदोबस्त नहीं कर पाती थीं, आज वे सात-आठ हजार रुपये महीने की कमाई कर अपना घर चला रही हैं और अपने बच्चों को स्कूल भेज पा रही हैं।
बस, यही देखकर मुझे बहुत सुकून मिलता है और सही मायनों में यही मेरी जीत है। राजस्थान की ये महिलाएं विदेशी फैशन शो में भाग लेकर भी अपनी छाप छोड़ चुकी हैं। कभी 10 महिलाओं से शुरू हुआ यह सफर अब 22,000 महिलाओं तक पहुंच चुका है। मुझे खुशी है कि अब महिलाएं खाली नहीं बैठना चाहतीं। वे अपने हाथ के हुनर को अपनी पहचान बनाकर आत्म-निर्भर बनना चाहती हैं। -विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।